बुधवार, 19 जनवरी 2011

प्रेम का मूल है अनादि अंतहीन विस्तार है




प्यार व्यापार नहीं है नीतिगत व्यवहार है ,
मन के भीतर तक समाया स्नेह का संस्कार है
प्रीती कामासक्ति नहीं सत्य की आराधना है
कामनावश जो करे तो शुध्द व्याभिचार है ,

दृष्टी से दृष्टी मिले तो प्रेम अंगीकार है
सृष्टी ने मानव को दिया है प्यार का उपहार है
सुंदरी के आगमन की प्रेमी करता है प्रतीक्षा
मन से मन का हो मिलन तो प्रेम का उपचार है 

रूपसी का रूप भी तो प्रेम पुरुस्कार है
मोरनी सी चाल में ही नृत्य का अवतार है
कामिनी काया को लेकर जब चली नवयौवना
होठो पर बिखरे हंसी तो प्यार का इजहार है

प्रेमवश जो भी मिला तो हार्दिक सत्कार है
मधुर वाणी से हुआ व्यक्तित्व का विस्तार है
है जरुरत आदमी से आदमी से प्यार की
अहंकारी आदमी तो जिंदगी पर भार है 

प्रेम चिर पावन सनातन बंधुत्व का भण्डार है
श्रीकृषण सुदामा की भाति मित्रवत व्यवहार है
प्रीती कई बुझ गई ज्योति मित्रता परिभाषा खोती
स्नेह्शुन्य मित्रता में स्वार्थ की झंकार है 

माता की ममता लुटाती बच्चो पर दुलार है
बहन भाई में परस्पर प्रेम का संचार है
प्रेम है यशोदा मैया गोपिया गोकुल कन्हैया
प्रेम की सर्वोच्च सत्ता पूर्ण निर्विकार है

प्रेम पथ प्राचीनतम अध्यात्म का आधार है
आत्मा का हो समर्पण परमात्म यह संसार है
प्रेम व्रत है प्रेम पूजा प्रेम व्यक्ति है ऊर्जा
प्रेम का मूल है अनादि अंतहीन विस्तार है

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न बिकती हर चीज

लज्जा का आभूषण करुणा  के बीज कौशल्या सी नारी तिथियों मे तीज  ह्रदय मे वत्सलता  गुणीयों का रत्न   नियति भी लिखती है  न बिकती हर चीज