बुधवार, 27 अप्रैल 2016

अनुभव पुरातन पास है

ढला शिल्प में जब सोच है निर्मित हुआ कुछ ख़ास है 
चित्रित हुई हर कल्पना  दिखा रंग और उल्लास है

हुई बाग़ में तुलसी घनी हुआ पुष्ट मन विश्वास  है 
हुई वेदना से दिल्लगी विष्णु प्रिया निज पास है 

नभ छूने को आतुर हुई चढ़ी  पेड़  पर यह बेल है 
तब शून्य से सृष्टि बनी  हुई व्यष्टि विकसित खेल है 

बरसो निखरती जिन्दगी पल में मिला वनवास है 
रही स्मृतियाँ अनकही रहा मन के भीतर वास है 

मन हर पुराने गम रहे रहा तिमिर फिर भी आस है 
मिली हमें है नूतन जिंदगी अनुभव पुरातन पास है

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

कब मिलेगी छाँव है

भंवर फूलो पर रहे है झील रहती नाव है
ताप देती गर्मिया है तप रहे सिर पाँव है
हो कहा पर प्रिय मेरे बोलती है आज टहनी
खो गई जग से शीतलता खोई खोई छाँव है 

जल में होती है शीतलता जल निर्मल भाव है
तृप्ति को वन वन भटके सूखते कूप गाँव है
हो कहा पर वत्स मेरे बोलती है आज मिटटी
कट गए है वृक्ष सारे और बिकती छाँव है 

हो गए अपकृत्य सारे लुप्त जल की आंव हैै
पक्षीगण बून्द बून्द तरसे रोज मिलते घाव है
गई कहा चंचल चिड़िया चहचहाती क्यों नही
गगन सेे अब आग बरसे कब मिलेगी छाँव है

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

दीक्षित नहीं यह पौध है

आंधिया उठते बवंडर मार्ग पर अवरोध है 
दर्द से गमगीन चेहरे ,युध्दरत हर बोध है 

द्वेष की परछाईयाँ है मन में पलते द्व्न्द्व है 
बारूदी होती है खुशिया हो रही हुड़दंग है 
आस्था घायल हुई है दीखता प्रतिशोध है 

माटी से होती बगावत कौनसा प्रतिकार है 
राष्ट्र भक्ति क्षय हुई है उन्हें जय से इनकार है 
सत्य से भटके विचारक लक्ष्य विचलित शोध है 

भ्रम है फैला मन विभञ्जित क्लांत सी तरुणाई है 
वृक्ष पर फल है विषैले विष फसले पाई है 
शिक्षा से होते न शिक्षित दीक्षित नहीं यह पौध है