शनिवार, 30 जून 2012

बहती नदी है

लिए जल शिखर से बहती नदी है
हुई बाढ़ लीला
घटी
त्रासदी है

खारा
हुआ जल  ,खारी हुई लहरे
समन्दर के भीतर  छुपे राज गहरे
बिंदु से सिन्धु में
बदलती
नदी है 

पर्वत की रानी ने पहने है कुंडल
 हिम के शिखर है जल के कमंडल
फल फूलो से मेवो से घाटी लदी है 

मान सरोवर है मन का सरोवर
कैलाश के पास शिव की धरोहर
गंगा का
संगम अब हुगली नदी है 

मधुर जल
है नभ पर नहीं जल है भू पर
मृदु जल है निर्झर मलिन जल समन्दर
जल
यात्रा में बीती ही जाती सदी है

गुरुवार, 28 जून 2012

नीव के पत्थर थे नीव में रहे

गुनाह सदा अंधेरो को ढूढते है
ख्वाब अधुरे हम उन्हे बुनते है

काली घटाए छा गई गगन पर
बारिश के बादल जोरो झूमते है 

नीव के पत्थर थे नीव में रहे
कंगूरे इमारतों  के नभ को चूमते है 

ख्वाईशे दिल की लौटा दे कोई
अरमान उनके सपनो में घुमते है 

हो गई जीवन में दुश्वारिया बहुत
रही चुनौतिया तो
मंजिले
चुनते है

आजादी सदा अनमोल होती है  
स्वातंत्र्य के नवीन मन्त्र को सुनते है   

कर्म ही आराधना है

कर्म तेरी साधना है,कर्म ही आराधना है
कर्म मे निहीत रही है ,देवत्व की अवधारणा है

कर्म राम कर्म श्याम कर्म होते चार धाम
कर्म बिन होती नही है,मोक्ष की उपधारणा है

 कर्म धर्म का है पूरक ,कर्महीन जड़मति मूरख
कर्महीन जो भी रहा है,मिलती रही प्रताडना है

कर्म मे कर्तव्य रहता ,कर्तव्य ही मंतव्य कहता
मंतव्य से गंतव्य तक की ,चिर प्रतिक्षित धारणा है


जो कर्म रथ लेकर चले है  सूर्य से हुए उजले  है
कृष्ण से हनुमान तक की मिलती रही शुभकामना है

कर्म का स्वामी रवि है,कर्मरत रहता कवि है
कर्मयोगी है निरोगी,योगीश शिव की साधना है

कर्म में ही  धर्म रहता  ,धर्म ही तो कर्म कहता
कर्म से मत कर पलायन ,गीता का दामन थामना है
 

बुधवार, 27 जून 2012

नयन से दिखी कहा ईश्वरीय मीनारे है

देख लिए जिन्होंने दिन में तारे है
रास्ते अन्धेर्रो ने उनके सवारे है 

खो गई अचानक यूँ दिल की ख़ुशी
लुट गई
दिल की दौलत वे गए मारे है 

लौटा दे जो जिंदगी की सरगम
 

आंसू की नदीया है और वे किनारे है 

ले गए वे दिल दिलवर जाते जाते
उनकी यादो में रोये है पल गुजारे है 

आसमान और जमीन कहा मिलते है ?
क्षितिज में होते रहे मिलन के नज़ारे है 

मन की रोशनी
से ही दिखाई देता है
बहुत  
दिखती नहीं नयन से  ईश्वरीय मीनारे है

सोमवार, 25 जून 2012

मिटटी देती स्नेह

धीरज धर सुखी रहे ,दुःख पाये अधीर
जो दुःख में सुखी रहे ,कहलाता रणधीर

नीरज का अज नीर है ,बनी दूध से खीर
धन के हाथो नहीं बिका ,सत जिसकी जागीर

राज्य बिना अवधूत रहे ,
सूर
मीरा  कबीर
मुक्ति भक्ति के साथ रहे, टूटी भव जंजीर 

मिटटी की यह देह रही ,मिटटी की है गेह
मिटटी पर जो मर मिटे ,मिटटी देती स्नेह

शुक्रवार, 22 जून 2012

ह्रदय व्यथा का पता बता दो

हुई दिवानी प्यास पुरानी,साँसों मे क्रन्दन पलता है
ढली जवानी बनी कहानी,दिवाने का दिल छलता है

नीला नीला भरा समन्दर,छुप गये आंसू मन के अन्दर
बही हवाये हालातो की ,विपदाओं के उठे बवंडर
ह्रदय व्यथा का पता बता दो,पीडा से हल कब मिलता है

सूरत का भोलापन ही तो ,भावो का दर्पन न होता
भोलेपन से ही ठग कर तो ,प्यार से हारा दिल है रोता
विरह गरल के प्याले को पी,जीवन मे प्रतिपल चलता है

आशा  ,भाषा,प्रेम पिपासा,मिले नही अब कही दिलासा
दिल वाले को दिल बोली मिल नही पाया प्यार जरा सा
बाल्यकाल से जरा ,जवानी,तन दुर्बल होकर गलता है

जीवन मे है आना -जाना,खुशियो का है कहा खजाना
रिश्तो का है ताना- बाना,हर रिश्ते मे मिला बहाना
भ्रम के बल पर मानव मन है,भ्रमण से न मन खिलता है





ठहरे जल पर चित्र तराशा

मन की आशा टूट गई है ,अब नहीं देता है कोई दिलासा 
गगरी नाजुक फूट गई है ,जल बिन जीवन रहता प्यासा  

म्रगत्रष्णा सी रही जिन्दगी,मन मृग होकर खोजे पानी
पडी जेठ की भीषण गर्मी, भीषण मौसम मुंह की खानी
बूंद बूंद  सुख की जुट जाये, तो मरूथल मे जीवन आशा

कर्म-धर्म का चला है फेरा ,सत्य धर्म का कहा सवेरा
तेरा-मेरा अब न कहना ,काल चक्र अब कहा है ठहरा
ठहरा जल है नही है लहरे ,ठहरे जल पर चित्र तराशा

नियति होती नही है दानी,अनसुलझी बातेसुलझानी
प्रश्न चिन्ह लिखे चेहरो पर,भीड मे चेहरे भीड अन्जानी
समय चिठ्ठीया बाँट रहा है,काले धन का हुआ खुलासा

कल तक खुद को बेच रहा था ,आज सत्य को बेच रहाहै
सत्य राह का राही जो भी,घर पर उसके क्लेश रहा है
भ्रष्ट व्यवस्था सुधरे तब ही ,आयेगा सुख-चैन जरा सा

जीवन मे अब क्या है पाना ,मिल जाये बस केवल दाना
सिंसक रही दुखियारी जनता,महंगाई अब गाये गाना
निर्वाचन से चुन लो नेता ,आम आदमी ठगा-ठगा सा

कलमकार बैचेन हो गया ,नींद उडी और चैन खो गया
रक्षक भक्षक यहा बन रहे ,बीज ईर्ष्या के कौन बो गया
पद कुर्सी का अहम भुला दो ,नही दिखता रूप भला सा

सजे हुये पाखंडी चेहरे ,मूल्यवान नैतिक कब ठहरे
फली फुली है नौकरशाही ,राज धर्म पर लगे है पहरे
कौन उन्हे समझाता यहाँ ,जन सत्ता का रूप उजला सा

हर अपराधी गढे कहानी,हुई अपराधी अब राजधानी
नौटंकी है लौकतंत्र की ,नटवर नेता गिर गये ज्ञानी
अब पोषीत है कारावासित ,शोषित जन है डरा डरा सा

शनिवार, 9 जून 2012

जहरीले हुए साए

हालात के दंश तो तन मन को डसते है
भगवान् तो इंसान के भावो में बसते है
लाचारिया जीवन को जीने कहा देती है
बरसते नहीं जो बादल जोरो से गरजते है

अपने हो पराये हो ,अपनों पर हसते है
सम्वाद की भाषा में लोग ताने ही कसते है
भींगी हुई पलकें है ,आंसू भी छलके है
पलको में आजकल ,गम क्यों सिमटते है 

ऊँची सी दीवारे है रिश्तो की मीनारे है
संवाद के सेतु अब टूट कर बिखरते है
खामोशिया चारो तरफ बिखरी हुई पसरी हुई
जहरीले हुए साए आस्तीन से लिपटते है
 

शुक्रवार, 8 जून 2012

कब आओगी बरखा रानी

पतझड़ पतझड़ हुई जवानी 
अल्हड आशा कुल्हड़ पानी 

भावो की बदरी है बरसे ,
घावो की पीड़ा है तरसे 
आ  भी जाओ बरखा रानी 

भीगी क्यों नहीं प्यारी चुनरिया 
आये क्यों नहीं मेरे सावरिया
रीत ऋतूअन की होती सुहानी 

काली प्यारी कोयल बोले
मयूरा छलिया नाचे डोले
छाए मेघा बरसे पानी 

पतझड़ से हरियाता है वन

फूट गई कोपल आया सावन  
परिवर्तन क्यों ?दे हैरानी ​​​​​​​