सोमवार, 29 अगस्त 2011

अहसास


(1)
मेरा मन क्यों
उड़ान भरता है ?
बीते हुए लम्हों को
क्यों याद करता है ?
हुई उदास आजकल
सुबह शाम है
तेरा अहसास
सदा मेरे आस-पास रहता है
(2)
वक्त कि टहनी से,
ये कैसे फूल झरे है
दिल मे दर्द अौर
अाॅखो मे अासू भरे है
बडी मुश्किलो से
राहत थी, पायी हमने
सितम इस कदर हुअा कि ,
जख्म हुये हरे है

बुधवार, 10 अगस्त 2011

preet

अदाए मदमस्त तेरी मेरी यादो में सजती
दिन तो गुजर जाते है रात में तन्हाई डसती
तेरी चाहत से मैंने जो राहत पाई है
तेरे हाथो में थमा दी है मैंने प्यार की कश्ती

दिल के भीतर मैने सूरत तेरी बसाीीयी है
मेरे दोसत तेरे प्यार मे सागर जैसी गहरायी है
बदन की खुशबु जो घुल गयी है मेरी साँसो मे
वो मेरे प्यार कि थोड़ी सी कमाीीयी है

मौसम का तीखा मिजाज है
चाहत के नये अन्दाज है
आप कही भी रहो सनम
रहते हो हर पल मेरे पास है

तेरे आने कि खुशी ने जगा दी है आस
और जाने के ही गम से हो गये उदास
रहते हो हर पल मेरे आस-पास
हो जाती दूर उलझने मिलता जीने का साहस


बारिश का सुहाना मौसम कितना अनूठा है
तनाव भरी व्यस्तता में आनंद जीवन का रूठा है
प्रकृति की शरण में रहे घुमे फिरे भ्रमण करे
स्वास्थ्य का महामंत्र सच्चा है बाकि सब झूठा है

















भाग्य के प्राची क्षितिज पर ,उग सूर्य आया है
चाँद सा चेहरा तेरा ,जब खिलखिलाया है

महकते मोगरे चम्पा चमेली, बाग़ उपवन में
मधुरता घुल गई है ,तेरी बोली से मेरे मन में
तुम्हारे रुप के कारण, हर पल मुस्कराया है
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,चाँद सा चेहरा तेरा ,जब खिलखिलाया है
भाग्य के प्राची क्षितिज पर ,उग सूर्य आया है


मेरी यादो के भीतर ,सदा तेरा अहसास रहता है
तेरी ऑखो मे डूबकर ,मेरा तन मन पिघलता है
तुम्हारे नेह की गागर मे, सागर भी समाया है
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,चाँद सा चेहरा तेरा ,जब खिलखिलाया है

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

हो गए गोल मटोल

योग धर्म का ज्ञान नहीं पहना भगवा वेश
अब संतन की जात में धूर्तो की घुसपैठ ||1||
आचरण बिन व्यर्थ रहे ,भाषण और उपदेश
अब कोरे आश्वासन से ,पलता है परिवेश ||2||
आयु का प्रतिबन्ध नहीं उमर भले हो साठ
सतत पठन से खुल सकेगी तेरे मन की गाँठ ||3||
बेरोजगार युवा पीढ़ी ,जनसँख्या विस्फोट
क्षमताये विकलांग हुई ,व्यवस्था में खोट ||4||
आर्थिक परतंत्रता देश हित को चोट
नए गेट प्रस्ताव से होगी लूट खसोट ||5||
निष्ठाए तो नित्य बिकी मूल्य हुए नीलाम
चारित्रिक दुर्बलता से देश हुआ बदनाम||6||
सुविधाए अनमोल हुई, प्रतिभाये बेमोल
नेताजी निरक्षर थे ,हो गए गोल मटोल||7||

मिलेगे मीठे फल

सूरज सागर धरा पवन ,जीवन के है मूल
चारो की करो साधना ,आचरण अनुकूल
सत्य शपथ इस पर्व पर ,लेना होगी आज
स्वच्छ धरा विशुद्द पवन से , कल न हो मोहताज
धन ही न संचित करो ,करो रखो सुरक्षित जल
नैस्रागिक अनुराग से, मिलेगे मीठे फल

भूली यादो के सिरहाने सपने है आते

दिवस के प्रहर लम्बे खीचते जाते
एकांतो के घेरो में हम खुद को पाते

खिसकती कच्ची दिवाले
लग चुके द्वारो पे ताले
जुगुनुओ के अंधेरो से गहरे है नाते
चमगादड़ के स्वर सन्नाटो को है भाते

कमरों के कोने है काले
मकड़ियो ने जकडे जाले
मधुमक्खियो के वृहद् छत्ते
ऊँची सी छत को सम्हाले
भूली यादो के सिरहाने सपने है आते