बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

तुम सरिता बनकर मिल लेना


ओ चंद्रमुखी चंचल नयना ,
अब और अधिक हमे मत छलना
अंखिया सखिया जब हमसे मिले ,
  हृदय प्रिया कही मत तकना

छवि अंकित थी हृदय मे सदा
,हर एक अदा पर हम थे फिदा
थे प्रणयातुर तेरे नयना,
अब मिलते नही क्यो यदा कदा ?
लिये बाली उमर मटकाये कमर ,
चलो प्रेम डगर तुम सम्हलना।। १।।

सुमधुर मधुर तेरी बाते ,
थे उजले दिन महकी राते
तेरी पायलिया की छम छम ,
सुन दिल तेरे पग पर बिछ जाते
चंपा कि कलि आजा  मेरी गली ,
  औरौ की गली तुम मत चलना ।।२।।

सपनो का धरातल कब होता ,
जीवन तो हकीकत को ढोता
मन पंछी बन नभ मे उडता,
सागर मे लगाता है गोता
सागर मे सरिता बह आई ,
तुम सरिता बनकर मिल लेना ।।३।।

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

होली उत्सव से मिल पायी

जब होठ सत्य न बोल सके तो ,तन बोले सत की भाषा है 
तन से तन की दूरी हो कितनी,मन बसती तव अभिलाषा है 

जब शब्द भाव न कह पाया हो ,टूटी फूटी कृश काया हो
निस्तब्ध पीर की छाया हो ,मुख कुछ भी न कह पाया हो 
भक्ति भाव प्रियतम प्रीती की , गुप चुप सी होती भाषा है  

चहु घनी घनी सी छाया हो नीम बरगद भी इतराया हो
होली खेले टेसू  पलाश, मौसम ने नव गीत गाया हो
होली उत्सव से मिल पायी ,अदभुत रिश्तो की परिभाषा है

पतझड़  सम झड़ती है चिंता ,जीवन में चिंतन पाया हो 
झरते है शूल ,खिरते बबूल ,न गर्मी से चुभती काया हो 
धड़कन तडकन में रहती ,जीने की उत्कट अभिलाषा है

जब सन्नाटो से घिरी  हुई  हो ,और अंधियारे की माया हो 
सन्नाटो के बीच  रह रह कर ,ध्येय  तिमिर में पाया हो 
तब गहन निशाचर  की सृष्टि में ,पायी नव दृष्टि नव आशा है

रहे  झूल झूल लता पे फुल ,शीतल पीपल की छाया हो 
बगिया में आम फल हो तमाम ,मधुबन में मधुफल आया हो 
नियति  के पलने झूल रही ,जीने की ललक  पिपासा है


शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

मरीचिका में मृग बन छले जा रहे है

उठती लहरों पर नाविक चले आ रहे है 
आसमाँ पर बादल घने छा रहे है 
ले के पतवार नैया ,खै चल खैवैय्या 
हौसले जिंदगी में  हमें आ  रहे है 

घौसले परिंदों के बुने जा रहे है 
चुनते चुनते ही तिनके रखे जा रहे है
 राहे आसान कभी भी होती नहीं है 
 फलसफे जिंदगी के हमें भा रहे है 

चक्रवातो में दरिया भी इतरा रहे है 
भंवर लहरों पर गहरे हुए जा रहे है ,
हर चुनौती से होगा यहाँ सामना 
कामना के किनारे अब मिले जा रहे है 

समाधान की कश्ती हम लिए जा रहे है
 जहर जुल्मो सितम के पिए जा रहे है 
कभी नाविक की साँसे भी रुकती नहीं है
 मरीचिका में मृग बन छले जा रहे है

माता पिता

पिता विश्वास का आकाश है 
माता धरती सा आभास है
पिता झरने का जल है जीवन की अरुणा है
माता मिट्टी है वात्सल्य है एवम करुणा है
माता देती काया है,पिता देते छत्र छाया है
माता का गुण ईश्वर ने भी गाया है
पिता से कुछ भी नही छुप पाया है
इसलिये पिता से कुछ भी मत छुपाओ 
कभी भी माता पिता को मत सताओ 

माता ममता की भाषा है,प्रेम की पिपासा है, 
पिता ज्ञान है विवेक है जिज्ञासा है नई आशा है
पिता मे हिमालय की ऊचाई है और सिंधु से गहराई है
माता के ममता भरे मीठे नीर से हमने उर्जा पाई है
पिता शिव है माता शक्ति है 
इसलिये माता पिता का अपमान ईश्वरीय अपमान है
उनको अपमानित करने वालो को कभी नही मिला सम्मान है

पिता शुन्य मे सृष्टि है माता सृष्टि मे समष्टि है
माता क्षमा की मूर्ति है,पिता जीवन की प्रतिपूर्ति है
माता छन्द है पद्य है पिता ललित निबंध है गद्य है
पिता मे समाहित जीवन का सारा कोष है
हटा दे मन से घृणा ,और सारे दोष है
पिता को देकर यौवन महान हुआ नचिकेता है
परब्रह्म परमात्मा परम पिता विश्व का प्रणेता है

माता जीवन की प्रथम शिक्षा है 
पिता व्यवहारिक जगत की समीक्षा है
माता रागिनिया राग है पिता सूर है साज है
माता गागर मे सागर है
पिता के व्यक्तित्व मे समाया सागर है
माता भावनाओं की महकी सुगंध है 
पिता रिश्तो का अनुबंध है
पिता ज्ञान है माता बुद्धि हैं 
पिता आचरण है माता आत्म शुद्धि है
माता रुपी धरती का आँचल लहलहाती फसल है
पिता रुपी सिंधु का वसन लहराता उच्छर्खंल जल है
इसलिये माता रुपी सृष्टि  को शुचिता से निहारो
पिता रुपी सदगुणो को निज आचरण मे उतारो

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

तपती रही सुबह दोपहर

जिंदगी  ईश्वर ने दी है ,जो आत्मा की नाव है
पतवार खै कर बढ़ मुसाफिर ,उस तरफ एक गाँव है

 खो रहा विश्वास प्यारा ,दंश है और घाव है
 जल राह पर गहराए भंवर,भटकाव ही भटकाव है

 जिंदगी शतरंज बनती ,चलते शकुनी  दांव है
तपती रही सुबह दोपहर ,दिखती नहीं कही छाँव है

मधु प्रेम का मिलता नहीं है ,टकराव ही टकराव है
स्नेह नाव को ले चल मुसाफिर ,लगाव का न भाव है

रहा आसान नहीं ये सफ़र ,ठहराव नहीं बिखराव है
चारो तरफ रही आंधिया है ,डग-मग रही यह नाव है

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

उस तरफ एक गाँव है

पतवार खैकर बढ मुसाफिर ,उस तरफ एक गाँव  है
जिन्दगी ईश्वर ने दी है जो  निज आत्मा की नाव है

लहरों पर लहरे उठेगी  ,आँधिया कभी  न थमेगी
संकल्प का दीपक जला ले ,नैया तेरी न डुबेगी
तूफानों मे कर सृजन तू, यहाँ भावो का अभाव है

प्राण व्याकुल हो,विकल हो ,भावना तेरी शीतल हो
लक्ष्य की तू प्यास धर ले,ह्रदय मे उल्लास भर ले
धीरज मे नीरज रहा है, नीरज निर्मल भाव है

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

भाव सरिता दीवानी है

आंसू  आंसू नही रहे है रहा भाव का पानी है
लफ्जो से न कही गई
है आंसू भरी कहानी है

रही भावना मन के भीतर आशा चिड़िया रानी है
नभ के तारो को छूने की अब तो हमने ठानी है 

विरह की गोदी में पल पल बही व्यथाये कल कल छल छल
समय प्रमेय न सुलझा पाये,विपदाये अब सुलझानी है 

पल पल बीता रूठ गई सीता प्यारा हारा मन न जीता
गीत गजल गायी कविता  भाव सरिता दीवानी है

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

हरी भरी वादिया है दृश्य विहंगम

दर्द की घाटी मे गीतो का उदगम
हरी भरी वादिया है दृश्य विहंगम

अश्रु सम भर आई ,बरसाती नदिया
               खंडहरनुमा हुई ,बीती हुई सदिया
झरता है गिरता है झरनो सा हर गम

घमंडी पगडंडी ,पड गये छाले
सडके हुई ठंडी ,कुचले घरवाले
खो गई जीवन मे खुशियो की सरगम

बन गये मरघट है ,सुख गये पनघट
तिर्थो पर पन्डो के ,रह गये जमघट
गंगा और यमुना का प्रदूषित संगम

बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

आंसू

आंसू सिर्फ आंसू नही ,भावो का पानी है
भावना के पानी मे दर्द की कहानी
कहानिया दर्द कि नई है पुरानी है
आंसुओ से झर गई ,अनकही कहानी है
आंसू  सिर्फ आंसू नही विचलित विश्वास कि
घटनाये पुरानी है
विश्वास की डोर किसने थामी है,
रह गई यादे जानी पहचानी है
आत्मियता कि कथाये रह गई अंजानी है
आंसुओ से रिक्त व्यक्ति सदा रहा अभिमानी है
आंसू  सिर्फ आंसू नही आत्मियता कि निशानी है
आत्मियता कि भावना किसने पहचानी है
समय की जीवन मे चलती रही मनमानी है
चुपचाप जो रहा,आंसुओ ने सब कुछ कहा
आंसुओ  से भरी हुई ,गीत गजल सुहानी है

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

चाँद मेरा क्यों हो गया उदास है

सोचता हूँ चाँद मेरा क्यों हो गया उदास है
पूर्णिमा की यामिनी में  खो गया उल्लास है

भावना विह्वल  हुई  ठिठुरता हर दर्द है
हिम हुई कल्पनाये ,दुबका हुआ सौहार्द है
छा रहा घनघोर कोहरा बढ़ गई क्यों प्यास है

रास्ते भी है कंटीले ,हर तरफ है विष बेले 
फूलो के भीतर छुपे है नाग है जो जहरीले
लुप्त होती जा रही विश्वास पर टिकी आस है

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

ईश्वरीय मुस्कान

अब हो गई है आत्मा की निज ईष्ट से पहचान है
हे !नन्हे शिशु तेरी हँसी मे ईश्वरीय मुस्कान है

स्थिर मन पुलकित नयन म्रदु होठ पर है हँसी ठहरी
वह हँसी अनुपम अलौकिक , भावनाए बहुत गहरी
हो गया तन-मन सिंचित मन कर रहा रस-पान है

हे !नन्हे शिशु तेरी हँसी मे ईश्वरीय मुस्कान है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

मेरे भगवन है अनादि,उनका नहीं कोई छोर है 
जान पाया हूँ अभी तक,ऋतुराज है चित चोर है 
ढूँढ पाया नही अब तक, विज्ञान से ईन्सान है

हे !नन्हे शिशु तेरी हँसी मे ईश्वरीय मुस्कान है,,,,,,,

रूप से मन मोहिनी है ,सारे सूर उनमे समाये
कला
के वे सिन्धु है दीनबंधु बन हर और छाये
वे लोक के कल्याण हेतु करते सदा
विष पान है
हे !नन्हे शिशु तेरी हँसी मे ईश्वरीय मुस्कान है,,,,,,,