रविवार, 18 मार्च 2012

वीरो की भूमि चित्तौड़गढ़

चित्तौड़गढ़ वीरो की भूमि है
वीरो ने पराक्रम की पराकाष्ठाए चूमी है
पराक्रम की पराकाष्ठाए महाराणा के इर्द -गिर्द घूमी है

चित्तौड़गढ़ राणा प्रताप का भाला है 
अडिग रही आस्थाये दुर्बल निष्ठाओ का मुंह काला है 
लौटा है शक्ति सिंह फिर अपना घर सम्हाला है 
चेतक सा अश्व है
 जानवर ने भी देशभक्ति का धर्म पाला है

चित्तौड़गढ़ गढ़ो का गढ़ है
कायरो के गाल पर वीरता का थप्पड़ है
 कट गया मस्तक पर लड़ता रहा धड़ है
राष्ट्रीयता का गान है स्वदेशी की जड़ है

चित्तौड़गढ़ पद्मिनियो का जौहर है
सतीत्व की है राजधानी है 
पराजय में भी विजय की अद्भुत कहानी है  
किले की दीवारों में लिखी हुई देशप्रेम की इबारत पुरानी है 
गौमुख  की धारा से निकलती  ऐतिहासिक परम्पराए सुहानी है

चित्तौड़गढ़ गोरा बादल है 
स्वाभिमान की रक्षा हेतु लड़ता पत्ता जयमल है 
वीरता का परपंरा पुरुष बप्पा रावल है 
झेल  कर अस्सी घाव लड़े राणा सदल -बल है
चित्तौड़गढ़ गद्दारों के बीच विश्वास का पौषक ,शक्ति पूजा का कमल है 
हर प्रकार की गुलामी के मध्य आजादी की हल -चल है

चित्तौड़गढ़  राणा प्रताप की सौगंध है 
 माटी से किया गया लाडले बेटो का अनुबंध है 
विजय स्तम्भ पर लिखी गई मेवाड़ की विजय  कहानी है 
राजस्थान राज्य की पराक्रम राजधानी है 
यह महाराणा उदय सिंग का उदय है 
पन्ना धाय का पुत्र बलिदान राष्ट्र भक्ति काल जय है 

चित्तौड़गढ़ मीरा की भक्ति है 
मीरा की भक्ति में कान्हा की आसक्ति है 
कान्हा की आसक्ति में आत्मा की मुक्ति है   
किले की उंचाइयो से नदी ही नहीं पूरी सदी दिखती है 
रक्त भरी कथाये ऐतिहासिक यादो से कहा मिट सकती है


इसलिए चित्तौड़गढ़  हर अर्थ में आज भी सार्थक है 
जैसे वीरता के बिना बल तथा 
चरित्र के बिना रूप होता निरर्थक है  
देशभक्ति के बिना धनवान को धिक्कार  है 
 दानवीर भामाशाह सर्वस्व न्यौछावर  हेतु आज भी तैयार है 


1 टिप्पणी:

  1. जय हो चित्तोड़ की माटी की
    हल्दी घाटी के टीला सू शिव पार्वती रण देखरिया मेवाड़ीवीरा री ताक़त अपनी नजरिया मैं तोल रिया बोल्या शिव जी सुन पार्वती मेवाड़ भोमरी बलिहारी जो आछा कर्म करे जग मैं वो अठे जन्म ले नर नारी . भारत भूमि मेवाड़ भूमि की जय हो धन्य हो.

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