गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

जगे भाग्य की रेख

नित अभिनव की प्यास रहे, नूतन नित उल्लास
नवीन वर्ष में सोच नई हो , हो मन मे विश्वास

जग में होते पंथ कई, ईश्वर फिर भी एक
नये वर्ष में नई उमंगे, जगे भाग्य की रेख

जब तक न संतोष रहा, जीवन होता शाप
नवीन वर्ष में हटे अंधेरा , कट जायेगे पाप

मन्दिर बजते शंख रहे, घंटी सजते थाल
होता सच्चा कोष वहाँ , जो मन से खुशहाल

चित में तो सन्यास नही , चिन्तन में न राम
फिर भी भगवा वेश धरा, इच्छा रही तमाम




गीता ज्ञान प्रचुर

गीता में श्री कृष्ण रहे
गीता ज्ञान प्रचुर
गीता ने कल्याण किया
 गीता गोरखपुर

गीता ने है शोक हरा
गीता सूर और तान
गीता से नत मुख हुआ
आधुनिक विज्ञान

गीता में सब श्लोक कहे 
धरती पर सब लोक
शुध्द कर्म परमार्थ करो
  पाप कर्म पर रोक

गीता में है गीत रहे 
रहे अनुष्टुप छन्द
गीता का हर सूक्त रहा
जीवन का मकरन्द

शनिवार, 26 दिसंबर 2020

ऐसा जो भी शख्स रहा


खुल करके सबसे बात करे 
खुल कर के सत्कार
ऐसा जो भी शख्स रहा 
 उसका सद व्यवहार

न ही उसके दोस्त बने
 जाने न हम तुम
जितना वह मासूम रहा 
उतना ही गुमसुम

उखड़ी उनकी साँस रही 
 उखड़ा उनका दम
फिर भी वह सिगरेट पिये,
खांसी और बलगम

कोरोना का ग्रास बना 
 ऐसा एक इंसान
सुबह न तो सैर करे
 व्यसन करे तमाम


गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

पिता हरदम मौन खड़े वे पर्वत उपमा

जिसका निश्छल प्रेम रहा, वह प्यारी है माँ
पिता हरदम मौन खड़े, वे पर्वत उपमा

कितने कितने घाव सहे , फिर भी रहते चुप
पिता का सामर्थ्य रहा, सूरज की ज्यो धूप

पिता होते शुध्द हवा, प्राणों का आधार
पिता जी है पूज्य रहे, कर इनका सत्कार

कानो में है गूँज रही , पिता की आवाज
पिता जी गुमसुम रहे, पिता जी नाराज

पिता जी है गुजर गये , गुजरा मन का बल
पिता के बिन विश्व लगा, जंगल और दलदल

चेहरा तेरा बाँच रहे, पिता जी है आज
उनसे गम भी छुपे नही , छुपे नही है राज

पिता हिमवत जमे नही, वे बरसे बादल
पिता होते पूर्ण सहज , वे गिरी विंध्याचल

माता कुछ है सोच रही , गाती मीठे गीत
भृकुटी पिता तान रहे , दृष्टि में कुछ हित

माता तो एक राग रही पितृवत है छन्द
मुठ्ठी जिनकी खुली नही , होती वह सौगंध

पिता से संसार मिला , पिता से घर बार 
पिता जी के चरणों मे , वंदन बारम्बार

पितृवत है ज्ञान रहा, पितृवत अनुभव
पिता जी से सीख मिली , जीवन है सम्भव

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

अदरक और लहसुन

बहरे होकर मौन हुए, रहे स्वार्थ के भाव
गहराई की और चले , गहरा हो स्वभाव

ठण्डी होती छाँव रही , देती धूप सकून
मीठी अच्छी चाय लगी, अदरक औ लहसुन

मक्का रोटी साग रही, मैथी पालक ज्वार
इनसे तू क्यो भाग रहा, ये पौष्टिक आहार

धनिया चटनी भूल गये,  खरड़ रही नही याद
भरमा बैगन की सब्जी का , कितना प्यारा स्वाद

चूल्हे चौके कहाँ गये, बुझते गये चिराग
बाती में न तेल रहा, कहा कंडे की आग


सोमवार, 21 दिसंबर 2020

लिफ्ट हुये अरमान

ऊँचे शॉपिंग माल रहे, ऊँची रही दुकान
ऊंचाई में शिफ्ट हुये ,लिफ्ट हुए अरमान

रिश्ते थे जो बिके नही, हे मेरे सरकार
दिल से दिल तक जुड़े रहे, अंतर्मन के तार

बहरे होकर मौन हुए, रहे स्वार्थ के भाव
गहराई की और चलो, गहरा हो स्वभाव


शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

रोता एक किसान

घायल दोनों पैर हुये, घायल होते भाव
फसलों को वो सींच रहा, सर्दी में एक गांव

बारिश में है भींग रहा, थक के चकनाचूर
किस्मत उनको ले गई, सुख से कितना दूर

पलको में न नीर रहा , ऐसा भी एक मर्द
हल्का होता भार नही , कर्जा है सिरदर्द

चलते उनके पैर रहे,फिर भी नही थकान
आँखों मे भी नींद नही, रोता एक किसान