रविवार, 2 अगस्त 2020

माँ

माँ कंचन सी रूप रही ,माता उजली धूप
माँ आंसू को पोंछ रही, दुख सहती चुप चुप

माता सुख की छांव रही ,हर लेती सब दुख
माँ करती उपवास रही ,ली बेटे की भूख

माँ तो हरदम साथ रहे ,माँ देती सम्बल 
माँ नदिया बन नीर बहे ,माँ यमुना चम्बल

माता होती रात रही ,होती गहरी नींद
दूब को देती ओंस नई ,जल को दे अरविंद
 
माँ बेटे को प्यार करे ,होकर के वत्सल 
गौमाता भी चाट रही, बछड़े को पल पल

 माँ पत्ते और पेड़ रही ,माँ होती फल फूल 
माँ टहनी पर नीड़ रही ,चिड़ियों का स्कूल 

माँ का सपना टूट गया ,उठ गया विश्वास 
जब बेटे के हाथ पीटी ,झेली है भूख प्यास

राम उसी के होय

राम राम तो सब कहे राम रहे न कोय
जो बन कर के राम रहे राम उसी के होय

राम नाम सत शब्द रहा राम रहे सत्कर्म 
राम रहे निज आचरण राम रहे है धर्म

बसे राम हनुमान हृदय राम बसे हर जीव 
निकट राम लक्ष्मण रहे राम सखा सुग्रीव

राम सत्य संकल्प रहे राम रहे हर आस
रामायण जी यह कहे राम रहे विश्वास

जहा राम वहां स्नेह रहा प्यारा सा है गेह
बारिश से है भींग रही राम कृपा से देह

राम प्रखर पुरुषार्थ रहे राम रहे आराध्य 
साधक जीवन सुखी रहा पाया जो भी साध्य 

जिनके भीतर अहम नही उनके भीतर राम सहज सरल और तरल नयन मर्यादा के धाम


गुरुवार, 23 जुलाई 2020

तेरी परछाई है

भींगे हुए सपनो ने 
ओढ़ी रजाई है
बीती हुई यादों की 
तस्वीर सजाई है
सोई हुई रातो ने 
निदिया लगाई है
गीतों की ये धुन है 
जुगनू की रुन झुन है
सीने में धड़कन है 
तेरी परछाई है

उगता हुआ सूरज है 
डूबता हुआ तारा है 
सींचा गया उपवन 
अब कांटो से हारा है
खुशियों की लालिमा 
किसने चुराई है 
लूटी हुई बस्ती है 
बिखरा अंधियारा है

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

शीश पर नील गगन

शिव से रति है काँप रही ,काँपे देव अनंग
जप तप और पुरुषार्थ कर, शिव का कर ले संग

शिव के चरणों भू मण्डल शीश पर नील गगन
बादल से है गरज रही शिव जी की गर्जन

शिव के शिखर गंग बही ,धरते हर दम ध्यान
शुध्द बने प्रबुध्द बने , योगी और हनुमान

शिव शम्भु को जपा करो बोलो हरदम ओम
पुलकित होती देह रही झंकृत है हर रोम

मन शिव का अनुरक्त हुआ शिव व्यापे इस देह 
शिव जी हर दम बांट रहे निर्मल निश्छल स्नेह


शिव सेवक भी पूज्य रहे , पूजित है परिवार
पल प्रतिपल है पूज्य रहा श्रध्दा का सोमवार




रविवार, 19 जुलाई 2020

काँपे दुष्ट अधम

शिव के हाथों नाद रहा डमरू की डम डम
भूत भावी कल नाच रहे काँपे दुष्ट अधम

शिव ओघड़ के रूप रहे ,लम्बोदर के अज
रूप तो क्षण भंगुर रहा रूप के मद को तज

उनके हाथों काल रहा होता तीक्ष्ण त्रिशूल
सब ग्रंथो का सार यही शिव ही सबके मूल

कालो में महाकाल रहे भोलो के है नाथ
दुष्टों को न क्षम्य करे कमजोरों के साथ

शिव जी पर है बिल्व चढ़े पाये धतुरा भांग
पा लेते  जल दूध दही सादा अनुष्ठान

शिव शम्भू की थाह नही ,वे मानस के हंस
उनसे ही तू प्रीत लगा कट जायेगे दंश

शिव अनुभव के नेत्र रहे अनहद के वे ज्ञान
सच्चाई की ताकत से होगी कब पहचान

जिनका होता कोई नही उनके तो भगवान
शिव निर्धन के मित्र रहे सज्जन के सम्मान


हृदय में न बैर रहे रख कर्मो में आग
शिव के मस्तक नीर बहा गर्दन में है नाग

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

कौड़ी की भी देह नही

ज्यो ज्यो जलती ज्योत रही महका है परिवेश
पावन सुरभित पवन बही अनुभूति होती विशेष

अनुभव से तू जान रहा कर अनुभव का मान 
अनुभवी से सूत्र मिले , बन जाते हर काम

हर दर्पण में झांक रहा ताक रहा है रूप
मद यौवन का गया नही पद कुर्सी की भूख

खुद ही पर है जोर रहा खुद को कर बलवान
खुद में ही जो दोष दिखे उनकी कर पहचान

तुझमे तेरे देव रहे खुद पर कर विश्वास
कौड़ी की भी देह नही बन जाती जब लाश

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

लिपटे देह भभूत

जैसा जिसका भाव रहा वैसे है भगवान
शिव ज्योतिर्मय रूप रहे ज्योति का आव्हान

 सोमवार हर वार रहे मन से हटे विकार 
शिव जी के इस मास में सत्य वचन स्वीकार

शिव जी तो अवधूत रहे उनके भैरव भूत
नागों के वे नाथ रहे लिपटे देह भभूत

जीने का आधार रहा शिव जी का परिवार
वे बंधु है मात पिता सबके तारण हार

शिव जी सबके पूज्य रहे क्या दानव क्या देव
भस्मासुर वर मांग गया रावण के महादेव

शिव जी से संतोष मिला पाया है प्रसाद
संकेतो से बात करे शब्द परे सम्वाद

शिव संजीवन बाँट रहे ,करते रोग निदान
मृत्युंजय महामंत्र रहा,जीवन का वरदान

शिव का सत्संकल्प रहा हो सबका कल्याण
सज्जनता के साथ रहे,बीज ,नींव से निर्माण