मंगलवार, 13 सितंबर 2016

निद्रा

निद्रा क्या है
निद्रा एक स्वप्न है 
स्वप्न जो नेत्र खुलते ही  ध्वस्त हो जाता है 
निद्रा जब तक रहती है 
स्वप्न हँसाता है रुलाता है 
अप्राप्त वस्तुओ की प्राप्ति का अनुभव कराता है 
निद्रा दीर्घ कालीन नहीं 
अल्पकालीन होती है 
अनुभूतियों खट्टी मीठी अत्यंत शालींन होती है 
निद्रा में आलस्य है प्रमाद है थकान है
गहराई हुई रातो में यह मन लेता
 सपनो में ऊँची उड़ान है
स्वप्न अर्ध चेतना का प्रतिरूप है 
कल्पना चेतना सृजनशीलता है 
कर्म का होता स्वरूप है 
विशुध्द और निर्विकार मन 
निद्रा नहीं योग निद्रा ध्यान करता है 
नित्य नयी ऊर्जा पाकर
 आनंद का अनुभव  रसपान करता है 
इसलिए हे मन निद्रा नहीं 
योग निद्रा और ध्यान करो 
परम चैतन्य परमात्मा की स्तुति 
 उसका ही गुणगान करो


बुधवार, 6 जुलाई 2016

बह चली हर धार है

कह रही कुछ पंक्तिया है 
होते अंकित भाव है 
बीज होते अंकुरित है
 और मिलती छाँव है
महकती हर क्यारिया है 
फल रही हर नस्ल है 
बादलों में जल भरण है
 मार्ग के भटकाव है

बारिशो में बूँद छम छम
 तृप्त धरती नेह है 
लौट आई आज चिड़िया 
घोसले में गेह है 
बह चली चंचल नदिया
 बह चली हर धार है 
हो गया पुलकित यौवन 
और दमकी देह है

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

अनुभव पुरातन पास है

ढला शिल्प में जब सोच है निर्मित हुआ कुछ ख़ास है 
चित्रित हुई हर कल्पना  दिखा रंग और उल्लास है

हुई बाग़ में तुलसी घनी हुआ पुष्ट मन विश्वास  है 
हुई वेदना से दिल्लगी विष्णु प्रिया निज पास है 

नभ छूने को आतुर हुई चढ़ी  पेड़  पर यह बेल है 
तब शून्य से सृष्टि बनी  हुई व्यष्टि विकसित खेल है 

बरसो निखरती जिन्दगी पल में मिला वनवास है 
रही स्मृतियाँ अनकही रहा मन के भीतर वास है 

मन हर पुराने गम रहे रहा तिमिर फिर भी आस है 
मिली हमें है नूतन जिंदगी अनुभव पुरातन पास है

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

कब मिलेगी छाँव है

भंवर फूलो पर रहे है झील रहती नाव है
ताप देती गर्मिया है तप रहे सिर पाँव है
हो कहा पर प्रिय मेरे बोलती है आज टहनी
खो गई जग से शीतलता खोई खोई छाँव है 

जल में होती है शीतलता जल निर्मल भाव है
तृप्ति को वन वन भटके सूखते कूप गाँव है
हो कहा पर वत्स मेरे बोलती है आज मिटटी
कट गए है वृक्ष सारे और बिकती छाँव है 

हो गए अपकृत्य सारे लुप्त जल की आंव हैै
पक्षीगण बून्द बून्द तरसे रोज मिलते घाव है
गई कहा चंचल चिड़िया चहचहाती क्यों नही
गगन सेे अब आग बरसे कब मिलेगी छाँव है

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

दीक्षित नहीं यह पौध है

आंधिया उठते बवंडर मार्ग पर अवरोध है 
दर्द से गमगीन चेहरे ,युध्दरत हर बोध है 

द्वेष की परछाईयाँ है मन में पलते द्व्न्द्व है 
बारूदी होती है खुशिया हो रही हुड़दंग है 
आस्था घायल हुई है दीखता प्रतिशोध है 

माटी से होती बगावत कौनसा प्रतिकार है 
राष्ट्र भक्ति क्षय हुई है उन्हें जय से इनकार है 
सत्य से भटके विचारक लक्ष्य विचलित शोध है 

भ्रम है फैला मन विभञ्जित क्लांत सी तरुणाई है 
वृक्ष पर फल है विषैले विष फसले पाई है 
शिक्षा से होते न शिक्षित दीक्षित नहीं यह पौध है

शनिवार, 19 मार्च 2016

क्रोध को आक्रोश मत बनने दो


आक्रोश एक
उबलता हुआ क्रोध है
जज्बात है
जो बाहर आना चाहते है
पर मजबूर है
कसमसा कर मुठ्ठियाँ भींचे हुए
क्रोध जब अभिव्यक्त नहीं हो पाया
तो वह आक्रोश बना
आक्रोश एक लावा है
जो बरसो सीने में दफ़न रहा
आक्रोश को
अभिव्यक्ति के अवसर की तलाश है
बहुत दिनों से वह अभिव्यक्त नहीं हो पाया है वह
आक्रोश असमानता
शोषण और अन्याय की उपज है
अभाव जिसका भाई
गरीबी और अशिक्षा जिसकी बहन है
आक्रोश कभी अकारण नहीं होता
सकारण होता है
अकारण तो आतंक होता है
क्रोध आक्रोश बन जाए
उससे पहले भावनाओ के माध्यम से
बहने दो
क्रोध को क्रोध ही रहने दो
हताशा और आक्रोश मत बनने दो 

सोमवार, 7 मार्च 2016

सेवा का हो दान

घट घट में शिव व्याप्त हुए ,माता तेरे तट 
रेवा जल से मुक्त हुए ,पाखंडी और शठ 

माँ रेवा की आरती , रेवा तट  पर स्नान 
माँ पुत्रो के कष्ट हरे  ,देती सुख सम्मान 

निर्मल कोमल नीर भरा, ,है नैसर्गिक तट
कलयुग में भी स्वच्छ रहे।,तेरे तट पनघट 

मेरे मन की पीर हरो, करता हुँ जब स्नान
 तन मन को तृप्त करो, सेवा का हो दान