मंगलवार, 13 नवंबर 2018

हलछठ

आत्मीय संसर्ग हुआ अंतर मन की प्रीत
जीवन मे आ जाओ न बन जाओ संगीत

आँचल तो आकाश हुआ जब आई हल छठ
सूरज से इस रोज मिले खिल गए है पनघट

इतना प्यारा सच्चा है सूरज तेरा प्यार
किरणों से तो रोज मिला जीवन को उपचार

निर्मल जल सी सांझ रहे बांझ रहे न कोय
दिनकर संग जो जाग रहा भाग्य उसी का सोय

पटना की है परम्परा नदियों के है तट
डूबते को भी प्यार मिला सूरज की हल छठ

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

भैय्या दूज

बहना का भाई रहा भैय्या की है दूज
संघर्षो से जीत मिली बहना की सूझ बूझ

जीवन में कई बार मिले सुख दुख के संजोग
बहना से मिलता रहा भैया को सहयोग

उसका निश्छल प्रेम रहा  निर्मल है अनुराग
बहना जग की रीत रही होती घर का भाग

मिट जाते सब दुख यहाँ कट जाते सब रो
बहना के आ जाने से समृध्दि के योग

बुधवार, 7 नवंबर 2018

सज्जनता एक धन

भीतर ही अंधियार रहा  भीतर में आलोक
जीवन पथ उद्दीप्त हुआ  बजे मंत्र और श्लोक

अनगिन तारे ताक रहे अंतहीन आकाश
चम चम चमके दीप यहाँ सुरभित मन विश्वास

हृदय में न प्यास रहे आस रहे हर नैन
दीप्त रहे मनोकामना समृध्दि और चैन

एक ज्योति सी बांध रही  मेरा अंतर्मन
किरणों से है दीप्त धरा  विकसित है चिंतन

मन भावो से दीप्त रहे तृप्त रहे हर जन
दीवाली पर दीप कहे सज्जनता एक धन

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है

यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है 

अनुभव से सब कुछ पाया है

अनुभूति जितनी गहरी हो 

ठहरी उतनी ही काया है

 

जब घना अँधेरा छाता है

 चिंतन गहरा हो जाता है

मन यादो की कस्तूरी से

 खुशबू लेकर कुछ गाता है

खुशबू से नज्मे भरी हुई 

यहाँ दर्द हुआ हम साया है 

 

जहाँ ह्रदय मिला कोई घाव नहीं 

वहा शब्द रहे पर भाव नहीं

  जो मस्त रहा है हर पल पल 

जीवन रहते अभाव नहीं  

मस्ती में झूम झूम कर हरदम

नव गीत अनोखा पाया है 

 

जहा रही वेदना मर्म रहा

रचना का अपना धर्म रहा

कोई धन्य हुआ अनुभूति से

तिल तिल देकर आहुति से

वह मानवता का वंदन कर

जीवन को समझा पाया है 

 

रविवार, 5 अगस्त 2018

पथिक रहा अजेय है

लहर लहर संवारता हिलोर पे है वारता

चैतन्यता सदैव है चैतन्यता सदैव है

 

 दया निधि पयोनिधि रत्नभरा अतुल निधि

दिखा समुद्र देव है दिखा समुद्र देव है

 

 रहा समुद्र देवता वारि बादल से भेजता

नैया को माँझी खेवता पथिक रहा अजेय है

 

 बने नवीन द्वीप है मोती बने है सीप है

अमरता का संचरण विविध बनाता जैव है

रविवार, 24 जून 2018

सामने दिखती ढलान

हौसलो से घोसले है 

पंख भरते है उड़ान

जिंदगी बिकने को आई 

बनने लगे है जब मकान

रोटियों के वास्ते ही

 है बिछुड़ता हर शहर

पंथ के लंबे सफर पर 

लगने लगी है अब थकान

 

घाटियों पर है चढ़ाई 

लाद कर ढोते समान

चोटियों जिसने भी पाई 

दिल की दुनिया है वीरान

अब रही न महफिले है 

अब कही न फूल खिले है

गीत और संगीत रोता 

काव्य भी लेता विराम

 

हर तरफ तकरार आई 

जख्म के होते निशान

धूर्तता ने घेर ली है 

सादगी की अब दुकान

स्वार्थ से वह घेरता है 

अब नजर वह फेरता है

छल कपट का है अंधेरा 

सामने दिखती ढलान

 

 

रविवार, 1 अप्रैल 2018

दादी और नानी ने जोड़ी पाई पाई है

हिमालय की बुलंदी है आसमान की ऊंचाई है

साहस और सामर्थ्य की गहराई तूने पाई है

 

यथार्थ का सामना है महकी हुई कामना है

नारी ही प्रसूता है ममतामयी दाई है

 

चेहरा एक प्यारा है बहती हुई धारा है

पत्नी बन नारी ने दुनिया सजाई है 

 

आँखों का सपना है संचित ही रखना है

बाबुल के आगन में बिटिया नई आई है

 

भ्राता का बल है करुणा निश्छल है

प्यारी सी बहना का छोटा एक भाई है 

 

छाया है माया है अपनापन पाया है

भावो में वत्सलता उसकी कमाई है 

 

दोस्ती है वादा है प्रियतम में राधा है

मीरा की भक्ति भी कितनी सुखदायी है

 

किरणों का ओज है बेटी नहीं बोझ है

आशाए संजोई है अभिलाषाएं पाई है

 

प्राची की अरुणा है समग्रता संपूर्णा है

दादी और नानी ने जोड़ी पाई पाई है