रविवार, 13 जुलाई 2025

कुण्डलिनी बंध खोले


 

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सौन्दर्य नहीं था जीवन में

उनके वो आंसु पोंछ रहा जिनकी पीडा मे पानी था  जो दर्द बसा था सीने  वो दुख की ही राजधानी था  खाली खाली सा लगता था  वो हरियाली सा दिखता था  सौं...