बुधवार, 25 अप्रैल 2012

क्षितिज के उस पार है

खिलखिलाई  सुबह होगी, झिलमिलाती शाम होगी
तज थकन तू बढ मुसाफिर ,जिन्दगी वरदान होगी

पत्थरों सा जो पड़ा है ,वह शिखर पर कब चढ़ा है 
जो चेतना रसपान करता ,तारे सा नभ में जड़ा है 
छोडकर मन की उदासी,मुस्कान न मेहमान होगी
 
उम्मीदो के आशियाने ,क्षितिज के उस पार है
घोर तम में कर परिश्रम तू जीत का हकदार है 
ठोकरे जो भी मिलेगी ,तेरी ही गुलाम होगी


प्रश्न कितने तेरे मन मे ,है चुनौतिया जीवन मे 
लोहे से कुन्दन बन जा, चिंगारिया है तन-मन  मे
चढ गिरी की घाटीयों पर,चिर विजय तेरे नाम होगी

रोने से फल क्या मिला है,चलने से मिलता किला है
दे हौसलो को तू बुलन्दी,मरुथल मे मृदुजल मिला है
काया को कर तू निरोगी,माया से पहचान होगी

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