बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

kismat ab to unhi karo me

कड़े सुरक्षा के घेरो में रहे निरंतर जो पहरों में
छुपी हुई है निष्ठुरता तो कुर्सी के कुत्सित चेहरों में

जटिल प्रक्रियाओं में घिर कर मिटी योजनाओं की स्याही
संवेदना का का स्वांग रच रही शोषणकारी नौकर शाही
कैद हो गई है जनता की किस्मत अब तो उन्ही करो में !!1!!

धसे हुए है प्रगति पहिये बिकी हुई सम्पूर्ण व्यवस्था
थकी हुयी बेहाल जिंदगी ढूंढ रही खुशहाल अवस्था
समाधान के सूत्र खोजती बीत गई आयु शहरों में !!2!!

यश वैभव की ऊँची मीनारे कलमकारों को ललचाये
चाटुकारिता के हाथो में राज्य नियंत्रण रह जाए
सिमट गए सुख के उजियारे चमचो के आँगन कमरों में !!3!!

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