बुधवार, 21 नवंबर 2012

स्नेह


स्नेह जब ममत्व का रूप धारण करता है
तो ममता कहलाता है
स्नेह जब दया अौर अार्द्रता सौहार्द्रता का रूप धारण करता है
तो करूणा कहलाता है
स्नेह को जब पित्रत्व का अाकाश मिलता है
तो अाश्रयदाता बन जाता है
स्नेह को जब सम्वेदना का अाभास मिलता है
तो गीत गजल साहित्यिक अाचार कालजयी विचार बन जाता है
स्नेह किसी अजनबी से हो जाता है तो प्रीत प्यार बन जाता है
ऐेसे प्रेम से व्यक्तित्व का निखार पा जाता है
राधा से श्रीक्रष्ण से स्नेह अध्यात्मिक ऊॅचाईया पा जाता है
माता के स्नेहिल स्पर्श पाकर शिशु अाहार दुलार पा जाता है
पिता का स्नेहाशीष पाकर पुत्र सारा संसार पा जाता है
बुजुर्गो की स्नेहिल स्पर्श की हौसलो को उडान प्रदान करता है
इसलिये स्नेह के अलग -अलग भाव है
स्नेह सिर्फ स्नेह नही अात्मा का अात्मा से लगाव है
स्नेह शून्य जीवन मे अभाव ही अभाव है
जहाॅ स्नेह है वहा समभाव है
स्नेह विहीन समबन्धो रहता नही सदभाव है
स्नेह के कई रूप है स्नेह की कही छाॅव है तो कही धूप है
स्नेह कही बोलता है तो कानो मे मिश्री घोलता है
स्नेह कही चुप -चुप रहता है
संकेतो अौर अनुभूतियो अाॅखो से साॅसो से बोलता है
मौन स्नेह के की भाषा अनोखी है
स्नेहिल स्पन्दन की सरिता क्यो सूखी है







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