शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

नन्हे- नन्हे दीप

सज- धज कर आई है गौरी,घर आँगन को लीप
टिम-टिम करते अंधकार मे ,नन्हे- नन्हे दीप

चमक उठा घर का हर कौना,रिश्तो मे आई है प्रीत
आंसू पोछो रोना छोडो,खुशियो का बिखरा संगीत
तेरा -मेरा पर जग ठहरा , आ -जाओ समीप

अपनी -अपनी आशाये है ,सपनो का अपना गणित
आसमान मे बिखरे तारे ,सीखलाते आपस की प्रीत
मन मन्दिर मे जग-मग होते ,आस्थाओ के दीप

गहन अमावस की रतिया मे, महका हर निमीष
बरस रहा है आसमानसे ,देवों का आशीष
गहरे सिन्धु मे उगते है मोती ,मूंगा ,सीप

प्राणो मे होता स्पंदन , झरता है नवनीत
लक्ष्मी माता का हो वन्दन खर्चे हो सीमीत
परम्पराओं से पाये है, नूतन पथ के दीप

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें