गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

सपनों का संसार


सपना अपना रह नहीं पाया
व्यथा ह्रदय की कह नहीं पाया

कुछ यादे सपनों में बसती
आशाओं की बहती कश्ती
मन की आशाओं का पंछी
केवल सपनों में उड़ पाया

सपनो का अपना आकर्षण
निज इच्छा का होता दर्पण
दर्पण के भीतर रह -रह कर
सपनो का साया मुस्काया

निर्धन का सुख सपनों में है
ह्रदय का सुख अपनों में है
अपनों से अपनापन पाकर
जीवन का सारा सुख पाया

सपनो का श्रृंगार करे हम
हर सपना घावो मलहम
सपनों का संसार सजाकर ,
यह मन पीड़ा को हर पाया

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