रविवार, 19 जनवरी 2025

ब्रह्मा विष्णु महेश

जिसका कुछ मंतव्य रहा
उसका है गंतव्य
वो पाए अधिकार यहां 
जिसके कुछ कर्तव्य

प्राणों पर है बोझ रहा
जो कुछ कर तत्काल
जिसका होता कोई नहीं
उसके तो महाकाल

जीवन जिसका शेष नहीं 
उसका यह परिवेश
उसका होता प्रिय सखा
ब्रह्मा विष्णु महेश

गंगा यमुना यही बही
रहता यही प्रयाग
तीर्थों से उसे पुण्य मिला
हृदय जो निष्पाप 


1 टिप्पणी:

  1. ह्रदय की शुद्धता ही उसे महाकाल का प्रिय बनाती है, सुंदर भाव

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