शनिवार, 8 सितंबर 2012

आकलन भी गलत ठहरे

आँखों में भरे आंसू ,बिखरे हुए सपने है
परायापन छाया है ,कौन यहाँ अपने है
आशाओं का आँचल ,बिछड़ गई छाया है
फिर हमें चलना है ,स्वाद कई चखने है

समय की कसौटी पर खरा कौन उतरा है
स्वार्थ से भरे रिश्तो ,रिश्तो पे खतरा है
इतना सब सहना है फिर भी यहाँ रहना है
पैतरे पर पैतरा है जीवन हुआ कतरा है

शब्द तो वही रहे, उनके कई आशय  है
भावो के कई रूप ,दुराशय सदाशय है
बिगडी हुई दशाये है,बहकी हुई दिशाये है
आकलन भी गलत ठहरे उखड़े महाशय है

बदरिया बारिश की कैसी यहाँ बहकी है
मनोरम हुआ  मौसम ,बगिया भी महकी है
झरते हुये झरने है,सरोवर जो भरने है
शीतलता छाई है,निर्मलता चहकी है

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