रविवार, 4 अगस्त 2013

कौन नहीं चाहता

संसार  में कौन नहीं चाहता की उसके शत्रु नहीं हो ?
यह धरा सभी और मित्रो और हितैषियो सी घिरी हुई हो
कौन नहीं चाहता की वह सभी प्रकार की आशंकाओं और भय से मुक्त हो ?
सभी प्रकार से सुरक्षित हो जीवन आनंद और उल्लास से युक्त हो
कौन चाहता वह योध्द्दा अपराजेय हो ?
वैभव और ऐश्वर्य से हो युक्त होती रहे चहु और उसकी जय जय हो
संसार में कौन नहीं चाहता वह गुणवान और विद्वान हो ?
महकती रहे यामिनी बिखरी  तारो सी  मुस्कान हो
कौन चाहता वह सूर्य सा तेजस्वी हो ?
व्यक्तित्व में हो शीतलता व्यक्तित्व ओजस्वी हो
पर इतना सब कुछ  चाहने से क्या होता है
पल्लवित परिवेश में वही  होता है 
 जैसा हमारे कर्म का बीज होता है

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