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हे भगवन लौटा दे, वापस मुस्कान

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भींगी हुई  दोपहर ,भींगी  हुई शाम  भींगा  हुआ हर पल ,बह गये  धाम  तीर्थो में  भर  गये  है , सारे  ही  कुंड  क्षत -विक्षत  लाशें  है, बिखरे नर  मुंड  बहुतेरे  मिल  गये है, ढेरो  गुमनाम  बदला है बारिश  ने ,कितना  भूगोल  पैरो  में छाले है, बम  हर हर तू बोल  हे भगवन  लौटा  दे, वापस  मुस्कान 

बद्री और केदार

प्रकृति में शक्ति है शक्ति में समाहित शिव है  शक्ति के बिना शरीर ही नहीं शिव भी निर्जीव है  शिव  की पूजा में आस्था है अभिषेक है आचमन   है शक्ति पूजा में भक्ति है प्रार्थना है शुध्द चित्त और मन है  रहे प्रकृति सुरक्षित और रहे निर्मल पर्यावरण है  शिव पूजा में हमारी होती आस्थाए कम है  मनो मस्तिष्क में पले  कई भ्रम है  शिव शक्ति की संयुक्त पूजा में प्रकृति का  संरक्षण है  पुरुषार्थ है बल है और परिश्रम है  फिर क्यों हुई विनाश लीला दिलो में गम और आँखे नम है  येन केन प्रकारेण  हमने प्रकृति को सताया है  प्रकृति को सता कर शिव शम्भू और केदार को किसने पाया है  इसलिए शिव और शक्ति की पूजा के नवीन मानदंड अपनाओ  प्राकृतिक संसाधनों को बचाओ  शिव और शक्ति को तन मन में बसाओ  प्रकृति में समाहित बद्री और केदार है  ईश्वर  उञ्चाइयो में ही नहीं गहराईयों में भी है  नैया की पतवार है  परम सत्ता के बल पर टिका हुआ यह संसार है 

मिथ्या ही विज्ञापन ,नहीं दीखता उल्लास

 रहती है जीवन में ,मरुथल की प्यास  इच्छित न मिल पाता ,नित दिन उपवास  उड़  गई निंदिया भी, अलसाए नैन  तकते है तारो को, मिलता न चैन  मिल जायेगी चितवन ,मन का विश्वास  बारिश की बूंदों से ,होती रिम झिम  रह गई दिल में ही ,चाहे अनगिन  चाहत की राहो पर, मिलता उपहास  गाँवों में अंधियारा ,दीपक टिम -टिम  जर्जर छत स्कूल की ,मिलती  तालीम  मिथ्या ही विज्ञापन ,नहीं दीखता उल्लास 

सुबह जग -मगाई है

नीले नीले आसमा पर, लालिमा छाई है  सूरज की मेहनत ने, अरुणिमा पाई है  पौरुष से किस्मत है, बजती शहनाई है  संध्या ने सूरज की, तृष्णा  बुझाई  है  अस्त हुये दिनकर ने ,शीतलता पाई है  निशा के आँचल में ,निंदिया गहराई है  खग -दल भी गुम सुम है, पवन सुखदायी है  उग आई उषा  है ,सुबह जग -मगाई है  प्रियतम की आँखों में, दिखती सच्चाई है  प्यारा सा जीवन जल, मृदुलता पाई है  भावनाये बहकी है ,मेहंदी रंग लाई  है  प्रीती से जीवन है ,हुई ईर्ष्या पराई है  भर आई आँखे है, गम की गहराई है  गागर में सागर है ,सरिता तट आई है  भावो के आँगन में ,पाया  है  अपनापन  सपनो में अपनों की ,झलकिया पाई है 

झलकी व्यथाए

थम जाती है आँधियाँ  और तूफानी काली घटाए  सोच लेता निश्छल मन तो, सुगम बन जाती है राहे  कंटको  से क्या डरे हम ? हो गया विदीर्ण ये मन  ठोकरे लगती  गई है ,टूट गई  संवेदनाये  वेदना किसको बताये ,विरह की लम्बी कथाये  काल और कंकाल पर ,नृत्य करती कामनाये  प्रीती ने विश्वास  तोड़ा ,नियति ने उदास छोड़ा  सत्य की कश्ती डूबी तो, सृजन में झलकी व्यथाए 

कैक्टस और बबूल

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कैक्टस की तरह रूखे कांटो से भरे  बिना उगाये ही उग आये व्यवहारिक धरातल पर विद्वेष के वृक्ष  क्योकि मै  नहीं कर पाया  शूल को फूल कहने की भूल  मुझमे उस साहस का है अभाव जो कहला देता है  अँधेरे को उजाला और सफ़ेद को काला  मिटा देता है सत्य और असत्य के बीच का अंतर  तब भ्रमित पथिक वैभव के अन्धकार में लिपट कर  दिशाहीन ध्येय विहीन जीवन पथ की और हो जाता है अग्रसर  मै  नहीं बनना चाहता दिशाहीन ध्येय विहीन भ्रमित पथिक  इसलिए मुझे साँसे लेना ही होगी  उस जहरीले वातावरण में जहाँ  उगते है  कैक्टस और बबूल  

थोड़ी सी पीर

मौसम की गर्मी से ,मिली नहीं ऊष्मा है  पसीने से लथ पथ है, टूटा हुआ चश्मा है  हाथो में हंसिया है, महँगी हुई खुशिया है  मिली नहीं हल धर को ,सपनों की सुषमा है  तन मन में पीड़ा है ,नयनो में नीर  फसलो के पकने पर जगती तकदीर बो देना खेतो में ,थोड़ी सी पीर  जल होगा मरुथल में, होगा तू वीर   भींगी हुई आँखों  में , बहुत दर्द बाकी है  प्यासी हुई नजरे है, नहीं कही साकी है  सूरज की गर्मी है ,कर्मी ही धर्मी है  किस्मत ने पौरुष की, कीमत कहा आंकी है