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वे क्या जाने ?

जिनमे नहीं विश्वास है  और निष्ठा का नहीं अता पता है वे क्या जाने ? मावठे का मौसम क्या है ?  या सावन की घटा है  सिखा नहीं जीवन में  जिन्होंने सब कुछ रटा है दिखाई नहीं देगा उन्हें  वर्तमान में क्या क्या घटा है ? आबरू गरीब की चली गई दे नहीं पाया कोई  बेटी का पता है बस  सवालों की चुभन है    बाजार सारा  सवालों  से पटा है आसान नहीं होता ईमान से  जी लेना  ईमानदार  आदमी ईमान  पर  सदा मर मिटा है  अकेले दीप  का भी जलना   क्या जलना है ? अंधियारे के भीतर प्रकाश पुंज है  अन्धियारा प्रकाशित हुआ है    तम हटा है  है ऊँची ईमारते चापलूसों  और बेईमानो  की उनकी हवेली से ही  घर ईमानदारी का सटा है

गठरी मन की किसने खोली

मन के मृदु भावो से आती ,यह प्यार भरी मीठी बोली गम गीतों से होता मुखरित , गठरी मन  की किसने खोली  प्रीती की होती मूक भाषा प्रियतम में रहती अभिलाषा  भावो का पंछी रह प्यासा . हुई खुशियों की ओझल टोली  जीवन में जंगल है ,दंगल ,जंगल ही देता है संबल धनबल के हाथो है  मंगल ,धनहीन को मिलती है गोली    आँखों में भावो का है जल  ,राहो पर बिखरा है मरुथल   नभ में  आशा का उदयाचल ,उषा के हाथो में रोली  निर्धन के  आंसू में आहे ,सत-जन को मिलती कब चाहे  जुल्मो की होती घटनाए  , जलती आस्था की  है होली 

कल

कल में बसता हल है  ,कल को लेकर चल  जो कल के न साथ चला मिले है अश्रु जल  कल की जिसको चाह  नही  वो क्या जाने फल  हर पल सुधरा आज तो  सुधरे  कल हर पल 

माता मे ईश्वर, की सत्ता

माता से  है अनुपम रिश्ता,ममता मे रमता है ईश ममता मे करूणा है रहती,करूणा मे रहती है टीस माता की छाया मे जन्नत,बेटा तो है माँ की मन्नत माता के चरणो मे रहकर ,भगवन का मिलता आशीष माता के छलके जब आंसू  भावो की हो गई बारिश माता मे ईश्वर, की सत्ता ,माता के है शक्ति-पीठ माँ का प्यार न जिसने पाया,पाकर जीवन वह पछताया माता का कर लो अभिनंदन,वंदन से हर्षित जगदीश माता हो तो पोंछे आँसू, बिन माँ के रोई ख्वाईश धरती होती सबकी माता,माताये होती दस-दिश तन-मन जिस पर है इतराता ,सबसे प्यारी भारत माता माता को है अर्पण जीवन ,माता को अर्पित है शीश

सुख शांति कहा मिल पाती है

  होठो ने  ओढ़ी ख़ामोशी ,दृष्टि प्रीती को पाती है  प्रीती  की सूरत है भोली पर ,मंद मंद मुस्काती है                                          -  राह थकन ही देती है ,मुश्किल से मंजिल आती है  जीवन है कांटो में पलता चाहत कुचली ही जाती है                                                               -  सपनो में खिलती है  उषा , निशा में जलती  बाती है  है ध्येय बड़ा और तिमिर खड़ा  आशा पलती ही जाती है                                             -  कही कृष्ण कन्हैया की बंशी गोपी के घर तक जाती है  जीवन में आपा धापी है ,सुख शांति कहा मिल पाती है                                                               - संध्या  में काली निशा है ,उषा निशा से आती है   उषा में जीवन की आशा ,भाषा अब नव गीत गाती है                                             -  ऋतुये आती है जाती है , खुशबू फूलो में लाती है तरु बेलो  पे कपोल कपल,फल पत्तो को बिखराती है                                             - सत्ता के मद मे हो पागल मद मस्त हो रहा हाथी है दुर्बल जनता की चींखे,तम चीर-चीर कर आती है   

गीत गजल में प्रीत रहे ,करे भजन प्रभु लीन

गीत गजल में प्रीत रहे ,करे भजन प्रभु लीन गजल नयन को सजल करे ,गजल करे गमगीन  भजन सृजन मनोभाव  है, भज ले ईश प्रतिदिन  सूरदास रैदास  हुए  ,मीरा  पद प्राचीन  जीवन संध्या रात है ,बाल्यकाल प्रभात  प्रतिदिन  बीता जात  रहा ,समय दे रहा मात  सभी बलो में है उत्तम , आत्म का ही बल  आत्मा बल के बिना हुआ , धन बल भी  निर्बल