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chahat

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आस जगे तो मिले जिंदगी टूट गई चाहत है मिली नहीं राहत है दिल में तमन्ना है तो मन में उमंगें होगी डस रही है भावना को कटी -कटी सी जिंदगी नियति की यह क्रूर हंसी वेदना के ज्वार जगाये टूट गया है मेरा तन मन मन को को भाए मिल न पाए निराशा भी जगती क्यों है आस जगे तो मिले जिंदगी

आदमी

परिधानों में लिपट लिपट कर नग्न हुआ है आदमी नई सभ्यता से बहका है सौम्य सरल वह आदमी रही नहीं है अब वह नरमी शेष नहीं आँखों में पानी आत्म मुग्धता के दर्पण में खो जाता है आदमी डूबा वासना में तो प्यार टूट गए है दिल के तार क्या होगा रे भावी कल में नहीं ये सब कुछ लाजमी

प्रीत ने किया था वादा

थम जाती है आंधिया और तूफानी काली घटाए , सोच लेता निश्चल मन तो सुगम बन जाती है राहे कंटको से क्या डरे हम हो गया विदीर्ण ये मन ठोकरे लगाती गई है ,टूट गई संवेदनाये ह्रदय में समाये बवंडर आंधी किस्मत ने कैसी इमारत बांधी दोस्ती के तेवर थे दुश्मन सरीखे भोले विश्वास की उसने लुटी थी चाँदी मीत ने किया था वादा जिंदगी का गीत होगी टूट भले ही साँस जाये वह अनूठी प्रीत होगी रास्ते पर हम बढे सामने जो थी हकीकत टूट गए सारे वादे यातना हमने है भोगी भावो की सीता का मंदिर बनाओ गीतों की गीता को होठों पर सजाओ ऊसर की अगन को स्वयम में समाकर फिर दहकती धरा की पीडा को बताओ

सार्थक जीवन ही तब कहलाया

बोगेनवेलिया की गंधहीन बेलो में सौन्दर्य फूलो का इतराया तो महक उठा गुलाब फ़ूल भी लावण्य संग सौरभ को लाया फिर चहक उठी इतने में ही गुलमोहर की शीतल छाया सौदर्य गंध है अर्थहीन ही राही को जब तक न सुख पहुचाया पेड़ पुष्प बेल संवाद सुन कर दूब के त्रण का स्वर लहराया उसका कहना था की मित्रो सार्थक जीवन ही तब कहलाया जब छांव संग सौन्दर्य संग ही वनचर की भूख जो हर पाया

roopvati

गोरा तेरा रंग है गदराया हर अंग रूपवती के रूप पर है ब्रहम्मा जी दंग  ईर्ष्या नफरत से तपे मेरे मन के पाव ऐसे में ये प्रीत बनी ठंडी - ठंडी छांव  नर्म - नर्म कलाईया ,नाजुक गोरे हाथ  धवल चन्द्रमा चाँदनी ,तेरे रूप के साथ