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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

गर्मी पर गीत


सूरज का चढ़ता है पारा 
नभ में रहता चांद सितारा

गर्मी का यह खेल  रहा है
यह जग मौसम झेल रहा है
किस्मत रूठती एक बेचारा 
बहा पसीना खारा खारा

जीवन का हर ताप सहा है 
मीठा जल अब यहां कहा है
ढूंढ लिया है पनघट सारा
मिली कही न जल की धारा

तपती धरती कहा बिछौना
तपता है घर का हर कौना
कही दुखो की लिखी ईबारत 
खुशियों का कही लगता नारा

गर्मी का जब मौसम आता 
पतझड़ भी है तब इतराता
पौरुष की लगती जयकारा
मानव में फिर साहस पधारा


रविवार, 24 जुलाई 2022

पेड़ पर और कौन ठहरा

पेड़  पर रहते  है पंछी 
पेड़  पर और  कौन  ठहरा  

चाहे  जैसा  घर  बना  लो 
पेड़ पर  कुटिया  बना  लो  
खिलखिलाये  जिंदगी  भी 
य़ह  धरातल  हो  हरा 

पेड़  की  हम  गोद  खेले 
पेड़  से  सब  कुछ  संजो  ले 
पेड़  की  छाया  में  निंदिया 
लथ पथ  पसीने  से  भरा 

पत्तियाँ  भी  सरसराती 
चिड़िया  रानी  बुदबुदाती 
पेड़  की  भाषायें  बोले 
प्रेम की  हो  य़ह  धरा

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

खुशियो की शहनाईयां

गहरी गहरी खाईया 
 झीलों की गहराइयां 
  नभ से निकली उतर रही
  कैसी है परछाईया

सुंदरता आनंद
  उड़ती हुई पतंग 
  सबने बाँची नभ में नाची
ठहरी कही  उमंग  
बच्चो  की होती किलकारी
खुशियो की शहनाईयां

कब तक होगी भ्रान्ति  
जीवन हो संक्रांति  
मिल मिल कर के बिछुड़ रही  
जीवन से सुख शांति
  अपनापन था गुजर गया 
  न होगी भरपाईया

कहा गए वो छंद 
जीवन का  मकरन्द 
महकी महकी गंध 
सुरभित से सम्बन्ध 
थर थर काया काँप रही 
खोई कही रजाईयां

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है

यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है 

अनुभव से सब कुछ पाया है

अनुभूति जितनी गहरी हो 

ठहरी उतनी ही काया है

 

जब घना अँधेरा छाता है

 चिंतन गहरा हो जाता है

मन यादो की कस्तूरी से

 खुशबू लेकर कुछ गाता है

खुशबू से नज्मे भरी हुई 

यहाँ दर्द हुआ हम साया है 

 

जहाँ ह्रदय मिला कोई घाव नहीं 

वहा शब्द रहे पर भाव नहीं

  जो मस्त रहा है हर पल पल 

जीवन रहते अभाव नहीं  

मस्ती में झूम झूम कर हरदम

नव गीत अनोखा पाया है 

 

जहा रही वेदना मर्म रहा

रचना का अपना धर्म रहा

कोई धन्य हुआ अनुभूति से

तिल तिल देकर आहुति से

वह मानवता का वंदन कर

जीवन को समझा पाया है 

 

रविवार, 11 मार्च 2018

भरता रहूँ उड़ान

तू प्रीती का गीत रही भीतर की मुस्कान

तुझसे जीवन पाऊ मै भरता रहूँ उड़ान 

 

इस जग में जहाँ प्यार रहा सुख है अपरम्पार

गहनों में हो पायल तुम जीवन की रफ़्तार

तुम धड़कन और सांस रही अमृत का रसपान 

 

तुझपे वारा ये तन मन जो भी कुछ है शेष

तू मौसम मधुमास भरी तू विचार विशेष

मरते दम तक साथ रहे निकले संग ही प्राण

 

सारा जीवन प्यार मिले प्राणों का आधार

सजनी तेरे साजन पर रख लेना ऐतबार

एक नेक हूँ साथ सदा यही सत्य ही जान


तुझसे सच्चा प्यार मिला जीवन को आकार 

जीवित मेरा स्वप्न रहा तू नदिया की धार

 तू ही मन की मीत रही  जीवन का सम्मान

गुरुवार, 16 मार्च 2017

प्यार की कमाई

अदाए मदमस्त तेरी मेरी यादो में सजती
दिन तो गुजर जाते है रात में तन्हाई डसती
तेरी चाहत से मैंने जो राहत पाई है
तेरे हाथो में थमा दी है मैंने प्यार की कश्ती

दिल के भीतर मैने सूरत तेरी बसाई है
मेरे दोसत तेरे प्यार मे सागर सी गहरायी है
बदन की खुशबु जो घुल गयी है मेरी साँसो मे
वो मेरे प्यार कि थोड़ी सी कमाई है

मौसम का तीखा मिजाज है
चाहत के नये अन्दाज है
आप कही भी रहो सनम
रहते हो हर पल मेरे पास है

तेरे आने कि खुशी ने जगा दी है आस
और जाने के ही गम से हो गये उदास
रहते हो हर पल मेरे आस-पास
हो जाती दूर उलझने मिलता जीने का साहस

बारिश का सुहाना मौसम कितना अनूठा है
तनाव भरी व्यस्तता में आनंद जीवन का रूठा है
प्रकृति की शरण में रहे घुमे फिरे भ्रमण करे
स्वास्थ्य का महामंत्र सच्चा है बाकि सब झूठा है















भाग्य के प्राची क्षितिज पर ,उग सूर्य आया है
चाँद सा चेहरा तेरा ,जब खिलखिलाया है

महकते मोगरे चम्पा चमेली, बाग़ उपवन में
मधुरता घुल गई है ,तेरी बोली से मेरे मन में
तुम्हारे रुप के कारण, हर पल मुस्कराया है
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,चाँद सा चेहरा तेरा ,जब खिलखिलाया है
भाग्य के प्राची क्षितिज पर ,उग सूर्य आया है

मेरी यादो के भीतर ,सदा तेरा अहसास रहता है
तेरी ऑखो मे डूबकर ,मेरा तन मन पिघलता है
तुम्हारे नेह की गागर मे, सागर भी समाया है
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,चाँद सा चेहरा तेरा ,जब खिलखिलाया है

सोमवार, 13 मार्च 2017

यहाँ रंग कही गहराया है

जीवन की आपा धापी में
                   अब वक्त कहा मिल पाता है 
फागुन की मस्ती छाती है
                  मन मन ही मन कुछ गाता है 

है सहज सरल से तरल नयन 
                   मौसम में रंगत आई है 
बच्चो की शक्ले  निखर रही 
                    बस्ती ने रौनक पाई है 
संसार सगो का मैला है 
                   इंसान अकेला ही जाता है 

यहाँ बदन गठीला मोहे मन 
                     सुंदरता सबको भाती है 
भीतर जो होती कोमलता 
                   ओझल होकर रह जाती है 
मानव मन का यह दोहरापन 
                      सौंदर्य कहा रख पाता है

यहाँ समय सदा ही सपनो सा
                     खुश किस्मत ने ही पाया है 
दुःख सह कर भी मद मस्ती का 
                        यहाँ रंग कही गहराया है 
सुख की है छाँव नहीं आती 
                     सुख सपनो का कब आता है

यह रंग बिरंगी दुनिया है 
                          रंगों में सब कुछ पाया है 
फागुन में बसते रंग रहे 
                        जिसे झूम झूम कर गाया है 
रंगों में मस्ती नाच रही 
                       यह रंग बहुत सिखलाता है

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

दीक्षित नहीं यह पौध है

आंधिया उठते बवंडर मार्ग पर अवरोध है 
दर्द से गमगीन चेहरे ,युध्दरत हर बोध है 

द्वेष की परछाईयाँ है मन में पलते द्व्न्द्व है 
बारूदी होती है खुशिया हो रही हुड़दंग है 
आस्था घायल हुई है दीखता प्रतिशोध है 

माटी से होती बगावत कौनसा प्रतिकार है 
राष्ट्र भक्ति क्षय हुई है उन्हें जय से इनकार है 
सत्य से भटके विचारक लक्ष्य विचलित शोध है 

भ्रम है फैला मन विभञ्जित क्लांत सी तरुणाई है 
वृक्ष पर फल है विषैले विष फसले पाई है 
शिक्षा से होते न शिक्षित दीक्षित नहीं यह पौध है

बुधवार, 30 दिसंबर 2015

युध्द रत हर घाव है

रक्त से लथ पथ हथेली ,पथ फिसलते पाँव है 
श्रम सीकर से है सिंचित ,लक्ष्य की यह छाँव है 

पंथ पर न चिन्ह अंकित, चहुओर बिखरी रेत  है 
नभ पर चिल गिध्द उमड़े, क्षितिज होता श्वेत है 
प्यारा सा बचपन बचा लो ,युध्द रत हर घाव है 

नियति क्यों होती है निर्मम खेलती रही खेल है 
निज रक्त भी होता पिपासु ,परजीवी विष बेल है 
कष्ट में रहता कौशल्य ,अकुशल के भाव है

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

ताकते प्रतिबिम्ब है

झाँकते हर और चेहरे
 ताकते प्रतिबिम्ब है 
रास्ते जल से भरे है 
 दृश्य होने भिन्न है 

दिखती है दिव्यता तो 
प्राची की अरुणाई में 
ओज और ऊर्जा पवन में 
उम्र की तरुणाई में 
रह गई परछाईया है 
वक्त के पदचिन्ह है 

दृष्टिगत होते क्षितिज में 
कल्पना के रंग है 
उम्र भर उड़ती  रही है
लक्ष्य की पतंग है 
वृहद व्यथा की कथा है 
मन क्यों होता खिन्न है


गुरुवार, 6 अगस्त 2015

भाव विसर्जन

अंजन ,मंजन, मन का रंजन 
वंदन, चन्दन, भावुक बंधन

नवल ,धवल है साँझ सवेरे 
सपने तेरे ,सपने मेरे 
स्वप्न प्रदर्शन ,चित का रंजन

अर्पण ,तर्पण, व्याकुल दर्पण 
लगी प्यासी है ,भाव समर्पण 
दया भाव हो ,नहीं हो क्रंदन 

सर्जन, अर्जन, भाव विसर्जन 
मिली सांस , पाया बल वर्धन 
गजल गीत का, हो अभिनंदन 

छाया माया ,कुछ भी न पाया 
शिल्प कला से ,मन भर आया
कला कर्म का ,महिमा मंडन

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

जीवन जल की धारा सा

आसमान में तारा सा 
जीवन जल की धारा सा 

बहती हुई हवाये  है 
सुख दुःख इसमें पाये है 
हारा सा दुखियारा सा 
खट्टा मीठा खारा सा 

किस्मत किसने पाई है
 सुख सपने परछाई है 
सपना एक कुंवारा  सा 
जीवन दर्द दुलारा सा

जल निर्मल कोमल हो मन 
परिवर्तन जीवन का धन 
 सूरज के उजियारा सा 
जीवन  सबसे प्यारा सा


शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

जीवन गीता श्लोक हो

घर आँगन में दीप  जला लो ,ह्रदय में आलोक हो 
उजियारे से प्रीत लगा लो ,मन  निर्भय अशोक हो 

जग जननी माँ दुर्गा लक्ष्मी ,देती यश धन बल है 
गुणों से पूजित हो जाते ,गुण  बिन सब निष्फल है
गुण  को पा लो स्वप्न सजा लो ,धरा स्वर्ग का लोक हो 

ज्योति से होता उजियारा, ज्योतिर्मय जगदीश है 
ज्योतिर्मय जग मग आशाये ,ज्योति का आशीष है 
चमक दमक दीपो की ज्योति ,जीवन गीता श्लोक हो

शनिवार, 21 जून 2014

बदले मन के भाव है

फूल बिखेरे गुलमोहर ने  , गर्म हो रही छाव है 
 ताप दे रही है दोपहरिया , भींग रहे सिर पाँव है 

रस्ते टेड़े  बदहाली के ,पथ पर उड़ती धूल  है 
मानसून में होती  देरी ,शायद हो गई भूल है
जल बिन जीवन कब होता है निर्जन होते गाँव है 

लौट रही न अब यह गर्मी ,सूखा थल से जल है
आज कटे है सुन्दर उपवन ,
नष्ट हो रहा कल है
हे ! बादल तुम क्यों है बदले? बदले मन के भाव है 

सूख गए है घट, तट, पनघट ,रिक्त हुए सब कुण्ड है 
जल बूंदो को तरसे खग दल ,भटक रहे चहु झुण्ड है 
कोयलिया फिर भी है बोली ,कौए  करते कांव  है

 
 
 




 

रविवार, 16 मार्च 2014

बिन रंग के जीवन मरा


छंद से जीवन भरा ,
आनंद से जीवन भरा 
स्नेह का यह कन्द ले लो 
सदभावना  दे दो ज़रा 

चाँदनी मधुकामनी 
अब दे रही खुशबू हमें
तुम चले  हो छोड़ कर 
मुह मोड़कर धड़कन थमे
हम बुलाये तुम  न आये
सोच कर कुछ मन डरा 

 होलिका बन जल रही है 
 दस दिशाए  छल रही है
 गल रही है भावनाए 
आशाये मन कि ढल रही है 
तुम बसे हो प्यार में ,
 विश्वास  को कर दो हरा

भाव के भावार्थ है 
परमार्थ के कई रूप है 
रंगो  से तू खेल होली 
 क्यों रहा चुप -चुप है ?
रंग से रंगीन हुआ मन 
बिन रंग के जीवन मरा

रविवार, 29 दिसंबर 2013

भक्ति में रहता समर्पण

भक्ति में रहता समर्पण और त्याग में संन्यास है 
भावना का यह सरोवर ,नहीं वाक्य का विन्यास है 

रहता निश्छल ह्रदय में ,भाव से अभिभूत है 

आत्मा होती बैरागन ,मन हुआ अवधूत है 
आस्था है चिर सनातन ,भक्त का विश्वास  है 

 जानता है मानता है ,पर कहा वह सुख है 
राधा जी  रूठी हुई है ,हर ख़ुशी में दुःख है 
भक्ति में शक्ति है रहती और प्रेम में उल्लास है 

राम से होती रामायण, श्रीकृष्ण से संगीत है 
प्यार कि हर हार में ही ,होती ह्रदय की जीत है
भाव भी भींगे हुए है पर बुझ  पायी प्यास है

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

कायर वीरो का स्वामी है

अब घृणा गिध्द ने भावो के घावो को खाया नोचा  है
ह्रदय में उनकी याद रही आहे भर भर  कर
सोचा है

 हो  नयन  शून्यवत ताक रहे एकांत रहा  एक साथी है
रही असत तमस की साजिशे चींटी बनती अब हाथी है
दुखड़ो से मुखड़े सिसक रहे  अश्को
को किसने पोछा है

पथ पर है कांटे और कंकड़ मिली कर्मो को गुमनामी है
कायरता इतनी भरी हुई कायर वीरो का स्वामी है 

शब्दों से घायल होता मन हर बोल यहाँ पर ओछा  है 

सुख दुःख गम खुशिया साथ रहे अपनों से इनको बाँट रहे
सपने बनवाते शीश महल रही चहल पहल और ठाट  रहे
मिलता जख्मो को दर्द यहाँ ,जख्मो को गया खरोचा है 

मंगलवार, 26 मार्च 2013

संशय ने हारी हर बाजी ,सुख सपनो का नवनीत रहा

यह कंठ वेदना लिख रहा, जीवन बाधा से सीख रहा 
ह्रदय का अंतर चींख रहा ,क्रोधित मन मुठ्ठी भींच रहा 

होली रंगों से खेल रही ,ईर्ष्या नफ़रत की बेल रही 
माता ममता उड़ेल रही ,सखीया अंखिया से खेल रही 
आँचल ने पोंछे  है आंसू  ,अनुभव आयु से जीत रहा 

चंचल लहरों में है हल चल  लहराती है बल खाती है 
वह नृत्य करे करती नखरे, तट से आकर टकराती है 
तट पे आकर मन से गाकर करुणा का लिखता गीत रहा 

महुए पे  मादक फुल रहे ,ढोलक मांदल से सूर बहे 
साँसों में बसती हो सजनी  रंगों में सब मशगुल रहे 
घूमता फिरता पूनम चन्दा  मन के आँगन में  दिख रहा 

सुविधा दुविधा की मूल रही तृष्णा आशाये झूल रही 
नित रंग बदलते है रिश्ते शंकाये थी निर्मूल रही 
संशय ने हारी हर बाजी ,सुख सपनो का नवनीत रहा  
 

बुधवार, 23 जनवरी 2013

याद मे देखू छवि



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http://fc01.deviantart.net/fs70/i/2010/248/d/a/sad_face_in_sketch_by_widya_poetra-d2y22da.jpgसोंचता हूँ प्यार का इजहार कैसे मै करु

                   दर्द से चींखू यहा पर या फिर जमाने से डरु


                   दर्द मे लिपटी हुई ,दिलवर तुम्हारी याद है

                     रूप की हल्की झलक है थोड़ा सा संवाद है

                       याद मे देखू छवि और दैख कर आहे भरु


                      दूरिया मजबूरिया है  राह पे न फूल है

                       चाहते रहती अधूरी बिखरी हुई चहु धूल है

                       पंथ पर मै पग धरु और चाह पर मिट कर मरू

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

दर्द मे भींगा







दर्द मे भींगा हुआ है
सर्दिला मौसम
सर्द का मौसम हुआ है
सर्द का मौसम

झील के झिल-मिल किनारे
लहरो की हल चल
लहरो की हल-चल हिलाती
ठंडी हवा पल पल
प्यारा सा जीवन सजा ले
ऐ मेरे हम-दम


दर्द से घायल हुई है
प्यार की पायल
प्यार मे पागल समन्दर
पागल हुई कोयल
साज और  आवाज से ही
सज गई सरगम


तो कभी वह घी रहे हैं

वे कभी अमृत रहे हैं  तो कभी वह घी रहे हैं  जब कथायें न सुहाती  तो व्यथा को जी रहे है  है. जहां से सूर आया  गीत और संगीत पाया  गीत और संगीत स...