शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025
गर्मी पर गीत
रविवार, 24 जुलाई 2022
पेड़ पर और कौन ठहरा
मंगलवार, 15 जनवरी 2019
खुशियो की शहनाईयां
झीलों की गहराइयां
नभ से निकली उतर रही
कैसी है परछाईया
उड़ती हुई पतंग
सबने बाँची नभ में नाची
ठहरी कही उमंग
बच्चो की होती किलकारी
खुशियो की शहनाईयां
जीवन हो संक्रांति
मिल मिल कर के बिछुड़ रही
जीवन से सुख शांति
अपनापन था गुजर गया
न होगी भरपाईया
शुक्रवार, 17 अगस्त 2018
यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है
यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है
अनुभव से सब कुछ पाया है
अनुभूति जितनी गहरी हो
ठहरी उतनी ही काया है
जब घना अँधेरा छाता है
चिंतन गहरा हो जाता है
मन यादो की कस्तूरी से
खुशबू लेकर कुछ गाता है
खुशबू से नज्मे भरी हुई
यहाँ दर्द हुआ हम साया है
जहाँ ह्रदय मिला कोई घाव नहीं
वहा शब्द रहे पर भाव नहीं
जो मस्त रहा है हर पल पल
जीवन रहते अभाव नहीं
मस्ती में झूम झूम कर हरदम
नव गीत अनोखा पाया है
जहा रही वेदना मर्म रहा
रचना का अपना धर्म रहा
कोई धन्य हुआ अनुभूति से
तिल तिल देकर आहुति से
वह मानवता का वंदन कर
जीवन को समझा पाया है
रविवार, 11 मार्च 2018
भरता रहूँ उड़ान
तू प्रीती का गीत रही भीतर की मुस्कान
तुझसे जीवन पाऊ मै भरता रहूँ उड़ान
इस जग में जहाँ प्यार रहा सुख है अपरम्पार
गहनों में हो पायल तुम जीवन की रफ़्तार
तुम धड़कन और सांस रही अमृत का रसपान
तुझपे वारा ये तन मन जो भी कुछ है शेष
तू मौसम मधुमास भरी तू विचार विशेष
मरते दम तक साथ रहे निकले संग ही प्राण
सारा जीवन प्यार मिले प्राणों का आधार
सजनी तेरे साजन पर रख लेना ऐतबार
एक नेक हूँ साथ सदा यही सत्य ही जान
तुझसे सच्चा प्यार मिला जीवन को आकार
जीवित मेरा स्वप्न रहा तू नदिया की धार
तू ही मन की मीत रही जीवन का सम्मान
गुरुवार, 16 मार्च 2017
प्यार की कमाई
अदाए मदमस्त तेरी मेरी यादो में सजती
दिन तो गुजर जाते है रात में तन्हाई डसती
तेरी चाहत से मैंने जो राहत पाई है
तेरे हाथो में थमा दी है मैंने प्यार की कश्ती
दिल के भीतर मैने सूरत तेरी बसाई है
मेरे दोसत तेरे प्यार मे सागर सी गहरायी है
बदन की खुशबु जो घुल गयी है मेरी साँसो मे
वो मेरे प्यार कि थोड़ी सी कमाई है
मौसम का तीखा मिजाज है
चाहत के नये अन्दाज है
आप कही भी रहो सनम
रहते हो हर पल मेरे पास है
तेरे आने कि खुशी ने जगा दी है आस
और जाने के ही गम से हो गये उदास
रहते हो हर पल मेरे आस-पास
हो जाती दूर उलझने मिलता जीने का साहस
बारिश का सुहाना मौसम कितना अनूठा है
तनाव भरी व्यस्तता में आनंद जीवन का रूठा है
प्रकृति की शरण में रहे घुमे फिरे भ्रमण करे
स्वास्थ्य का महामंत्र सच्चा है बाकि सब झूठा है
भाग्य के प्राची क्षितिज पर ,उग सूर्य आया है
चाँद सा चेहरा तेरा ,जब खिलखिलाया है
महकते मोगरे चम्पा चमेली, बाग़ उपवन में
मधुरता घुल गई है ,तेरी बोली से मेरे मन में
तुम्हारे रुप के कारण, हर पल मुस्कराया है
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,चाँद सा चेहरा तेरा ,जब खिलखिलाया है
भाग्य के प्राची क्षितिज पर ,उग सूर्य आया है
मेरी यादो के भीतर ,सदा तेरा अहसास रहता है
तेरी ऑखो मे डूबकर ,मेरा तन मन पिघलता है
तुम्हारे नेह की गागर मे, सागर भी समाया है
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,चाँद सा चेहरा तेरा ,जब खिलखिलाया है
सोमवार, 13 मार्च 2017
यहाँ रंग कही गहराया है
अब वक्त कहा मिल पाता है
फागुन की मस्ती छाती है
मन मन ही मन कुछ गाता है
है सहज सरल से तरल नयन
मौसम में रंगत आई है
बच्चो की शक्ले निखर रही
बस्ती ने रौनक पाई है
संसार सगो का मैला है
इंसान अकेला ही जाता है
यहाँ बदन गठीला मोहे मन
सुंदरता सबको भाती है
भीतर जो होती कोमलता
ओझल होकर रह जाती है
मानव मन का यह दोहरापन
सौंदर्य कहा रख पाता है
यहाँ समय सदा ही सपनो सा
खुश किस्मत ने ही पाया है
दुःख सह कर भी मद मस्ती का
यहाँ रंग कही गहराया है
सुख की है छाँव नहीं आती
सुख सपनो का कब आता है
यह रंग बिरंगी दुनिया है
रंगों में सब कुछ पाया है
फागुन में बसते रंग रहे
जिसे झूम झूम कर गाया है
रंगों में मस्ती नाच रही
यह रंग बहुत सिखलाता है
सोमवार, 11 अप्रैल 2016
दीक्षित नहीं यह पौध है
बुधवार, 30 दिसंबर 2015
युध्द रत हर घाव है
पंथ पर न चिन्ह अंकित, चहुओर बिखरी रेत है
शुक्रवार, 25 सितंबर 2015
ताकते प्रतिबिम्ब है
गुरुवार, 6 अगस्त 2015
भाव विसर्जन
शुक्रवार, 16 जनवरी 2015
जीवन जल की धारा सा
शनिवार, 25 अक्टूबर 2014
जीवन गीता श्लोक हो
शनिवार, 21 जून 2014
बदले मन के भाव है
ताप दे रही है दोपहरिया , भींग रहे सिर पाँव है
रस्ते टेड़े बदहाली के ,पथ पर उड़ती धूल है
मानसून में होती देरी ,शायद हो गई भूल है
जल बिन जीवन कब होता है निर्जन होते गाँव है
आज कटे है सुन्दर उपवन ,नष्ट हो रहा कल है
सूख गए है घट, तट, पनघट ,रिक्त हुए सब कुण्ड है
जल बूंदो को तरसे खग दल ,भटक रहे चहु झुण्ड है
कोयलिया फिर भी है बोली ,कौए करते कांव है
रविवार, 16 मार्च 2014
बिन रंग के जीवन मरा
चाँदनी मधुकामनी
दस दिशाए छल रही है
रविवार, 29 दिसंबर 2013
भक्ति में रहता समर्पण
शुक्रवार, 6 सितंबर 2013
कायर वीरो का स्वामी है
ह्रदय में उनकी याद रही आहे भर भर कर सोचा है
हो नयन शून्यवत ताक रहे एकांत रहा एक साथी है
रही असत तमस की साजिशे चींटी बनती अब हाथी है
दुखड़ो से मुखड़े सिसक रहे अश्को को किसने पोछा है
पथ पर है कांटे और कंकड़ मिली कर्मो को गुमनामी है
कायरता इतनी भरी हुई कायर वीरो का स्वामी है
शब्दों से घायल होता मन हर बोल यहाँ पर ओछा है
सुख दुःख गम खुशिया साथ रहे अपनों से इनको बाँट रहे
सपने बनवाते शीश महल रही चहल पहल और ठाट रहे
मिलता जख्मो को दर्द यहाँ ,जख्मो को गया खरोचा है
मंगलवार, 26 मार्च 2013
संशय ने हारी हर बाजी ,सुख सपनो का नवनीत रहा
सुविधा दुविधा की मूल रही तृष्णा आशाये झूल रही
नित रंग बदलते है रिश्ते शंकाये थी निर्मूल रही
संशय ने हारी हर बाजी ,सुख सपनो का नवनीत रहा
बुधवार, 23 जनवरी 2013
याद मे देखू छवि
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सोमवार, 10 दिसंबर 2012
दर्द मे भींगा
तो कभी वह घी रहे हैं
वे कभी अमृत रहे हैं तो कभी वह घी रहे हैं जब कथायें न सुहाती तो व्यथा को जी रहे है है. जहां से सूर आया गीत और संगीत पाया गीत और संगीत स...