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नवंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ठहरा मन विश्वास

गहरा गहरा जल हुआ गहरे होते रंग ज्यो ज्यो पाई गहराई पाई नई उमंग गहराई को पाइये गहरा चिंतन होय उथलेपन में जो रहा मूंगा मोती खोय गहरा ठहरा जल हुआ ठहरा मन विश्वास ठहरी मन की आरजू पाई है नव आस गहराई में खोज मिली गहरे उठी दीवार गहराई न जाइये गहरी गम की मार ऊंचाई से उतर रहे लेकर चिंतन वेद जीवन तो समझाईये गहरे है मतभेद

एक भौर जुगनू की

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सुप्रतिष्ठित ललित निबंधकार श्री नर्मदा प्रसाद जी उपाध्याय द्वारा २६ वर्ष पूर्व मुझे प्रेषित यह पत्र  जब अचानक मुझे ढूंढने पर मिला तो उनके द्वारा रची गई कृति "एक भौर जुगनू की याद "आ गई आज कल ऐसी प्रेरणा मिलती कहा है

हलछठ

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आत्मीय संसर्ग हुआ अंतर मन की प्रीत जीवन मे आ जाओ न बन जाओ संगीत आँचल तो आकाश हुआ जब आई हल छठ सूरज से इस रोज मिले खिल गए है पनघट इतना प्यारा सच्चा है सूरज तेरा प्यार किरणों से तो रोज मिला जीवन को उपचार निर्मल जल सी सांझ रहे बांझ रहे न कोय दिनकर संग जो जाग रहा भाग्य उसी का होय  पटना की है परम्परा नदियों के है तट डूबते को भी प्यार मिला सूरज की हल छठ

भैय्या दूज

बहना का भाई रहा भैय्या की है दूज   संघर्षो से जीत मिली बहना की सूझ बूझ जीवन में कई बार मिले सुख दुख के संजोग बहना से मिलता रहा भैया को सहयोग उसका निश्छल प्रेम रहा  निर्मल है अनुराग बहना जग की रीत रही होती घर का भाग   मिट जाते सब दुख यहाँ कट जाते सब रो ग बहना के आ जाने से समृध्दि के योग

सज्जनता एक धन

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भीतर ही अंधियार रहा  भीतर में आलोक   जीवन पथ उद्दीप्त हुआ  बजे मंत्र और श्लोक अनगिन तारे ताक रहे अंतहीन आकाश चम चम चमके दीप यहाँ सुरभित मन विश्वास हृदय में न प्यास रहे आस रहे हर नैन   दीप्त रहे मनोकामना समृध्दि और चैन एक ज्योति सी बांध रही  मेरा अंतर्मन किरणों से है दीप्त धरा  विकसित है चिंतन  मन भावो से दीप्त रहे तृप्त रहे हर जन   दीवाली पर दीप कहे सज्जनता एक धन