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जनवरी, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

sahas

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तेरे आने की खुशी ने जगा दी है आस और जाने के ही गम से हो गये उदास रहते हो जब तुम मेरे आस-पास दूर हो जाती है उलझने मिलता जीने का साहस

प्रेम का मूल है अनादि अंतहीन विस्तार है

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प्यार व्यापार नहीं है नीतिगत व्यवहार है , मन के भीतर तक समाया स्नेह का संस्कार है प्रीती कामासक्ति नहीं सत्य की आराधना है कामनावश जो करे तो शुध्द व्याभिचार है , दृष्टी से दृष्टी मिले तो प्रेम अंगीकार है सृष्टी ने मानव को दिया है प्यार का उपहार है सुंदरी के आगमन की प्रेमी करता है प्रतीक्षा मन से मन का हो मिलन तो प्रेम का उपचार है  रूपसी का रूप भी तो प्रेम पुरुस्कार है मोरनी सी चाल में ही नृत्य का अवतार है कामिनी काया को लेकर जब चली नवयौवना होठो पर बिखरे हंसी तो प्यार का इजहार है प्रेमवश जो भी मिला तो हार्दिक सत्कार है मधुर वाणी से हुआ व्यक्तित्व का विस्तार है है जरुरत आदमी से आदमी से प्यार की अहंकारी आदमी तो जिंदगी पर भार है  प्रेम चिर पावन सनातन बंधुत्व का भण्डार है श्रीकृषण सुदामा की भाति मित्रवत व्यवहार है प्रीती कई बुझ गई ज्योति मित्रता परिभाषा खोती स्नेह्शुन्य मित्रता में स्वार्थ की झंकार है  माता की ममता लुटाती बच्चो पर दुलार है बहन भाई में परस्पर प्रेम का संचार है प्रेम है यशोदा मैया गोपिया गोकुल कन्हैया प्रेम की सर्वोच्च सत्ता पूर्ण निर्विकार

समाधान थोड़े

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सवालों की भीड़ है समाधान थोड़े ऊसर बालुकामय डिगा नहीं निश्चय पथ पर धंसे पग त्रिस्नाये तोडे , मंजिल भी तो दूर मुश्किलों से भरपूर निराशा के दम पर क्या सामर्थ्य को निचोड़े , बरसते है पीठ पर समस्यायों के कौड़े गिरते सम्हलते सपने तो जोड़े दायित्वों के गठ्ठर लदे हुए सर पर , सवालों की भीड़ है समाधान थोड़े

dard pardeshi nahi hai

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धुल सी छाई हुई है हर तरफ फैली उदासी प्रश्नों का चलता प्रशासन फिर मिली उत्तर को फांसी छल कुटिलता से व्यथित मन स्वाद चखता है कसैला सपनों की अर्थिया ढ़ोकर रह गया है जो अकेला दर्द परदेशी नहीं है बन गया उर का निवासी संवेदनाओ के खिलोने दिखते कितने सलौने शब्दों के शिल्पी सौदागर आचरण के लोग बौने असत्य का आधार बढ़ता सत्य फिर अज्ञातवासी रिश्तो के किस्से अनूठे सेतु संवादों के टूटे आस्थाए ढह गयी है रह गए स्वार्थो के खूटे प्रीत पटरानी नहीं है बन गयी वैभव की दासी