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यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है

यहाँ शब्द नहीं अनुभूति है  अनुभव से सब कुछ पाया है अनुभूति जितनी गहरी हो  ठहरी उतनी ही काया है   जब घना अँधेरा छाता है  चिंतन गहरा हो जाता है मन यादो की कस्तूरी से  खुशबू लेकर कुछ गाता है खुशबू से नज्मे भरी हुई  यहाँ दर्द हुआ हम साया है    जहाँ ह्रदय मिला कोई घाव नहीं  वहा शब्द रहे पर भाव नहीं    जो मस्त रहा है हर पल पल  जीवन रहते अभाव नहीं   मस्ती में झूम झूम कर हरदम नव गीत अनोखा पाया है    जहा रही वेदना मर्म रहा रचना का अपना धर्म रहा कोई धन्य हुआ अनुभूति से तिल तिल देकर आहुति से वह मानवता का वंदन कर जीवन को समझा पाया है   

पथिक रहा अजेय है

लहर लहर संवारता हिलोर पे है वारता चैतन्यता सदैव है चैतन्यता सदैव है     दया निधि पयोनिधि रत्नभरा अतुल निधि दिखा समुद्र देव है दिखा समुद्र देव है     रहा समुद्र देवता वारि बादल से भेजता नैया को माँझी खेवता पथिक रहा अजेय है     बने नवीन द्वीप है मोती बने है सीप है अमरता का संचरण विविध बनाता जैव है