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उम्मीदे कुछ और है

मार्ग में संघर्ष है  संघर्ष के कई दौर है  संघर्ष में उत्कर्ष है  उत्कर्ष का नहीं छोर है  राह में कांटे बिछाये  मुश्किलें कितनी भी आये  मौत भी न जीत पाये  उम्मीदे कुछ और है  हर खुशी दुःख से बड़ी है मुश्किलो से वह लड़ी है  लौट आओ उम्मीदे तुम  मंजिले चौखट खड़ी  है  आज के भीतर रहा कल  अंकुरित बीज फिर बना फल  हर प्रतीक्षा है परीक्षा  यहाँ परीक्षा की झड़ी  है

जन जन में खुशिया छाई है

लोक अदालत आई है ,जन जन में खुशिया छाई है  कर लो बहना राजीनामा ,प्रेम सुधा सुख दाई है सेवा ही संकल्प हमारा ,सेवा ही अभियान है  न्याय दान ही महादान है निर्धन का सम्मान है  न्याय शुल्क से पा लो मुक्ति, न्याय भागीरथी आई है  मत भेदो  को दूर कर प्यारे ,नवयुग का आव्हान है  प्री लिटिगेशन प्री बार्गेनिंग ,यह विधि का वरदान है  विधि है मूर्ति विधि से पूर्ति ,हर मुश्किल हट पाई है

Geet

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भाव के नहीं ईख है

जिंदगी है धार नदिया  है  दर्द है तकलीफ है  हार तो मिलती रही है  जीत में कहा सीख है  चाहतो के मिल रहे शव ,राहते  मिलती नहीं है  प्यार की तुलसी है झुलसी  नहीं वक्त की मिली भीख है हर तरफ चिंगारियाँ है  किलकारियाँ है चीख है  प्यास ठहरी अधबुझी है फिर मिली कालिख है विष घोले  है सपोले    होले  होले मन टटोले नीम करेले है कसैले  भाव के नहीं ईख है

जीवन गीता श्लोक हो

घर आँगन में दीप  जला लो ,ह्रदय में आलोक हो  उजियारे से प्रीत लगा लो , मन  निर्भय अ शोक हो  जग जननी माँ दुर्गा लक्ष्मी ,देती यश धन बल है  गुणों से पूजित हो जाते ,गुण  बिन सब निष्फल है गुण  को पा लो स्वप्न सजा लो ,धरा स्वर्ग का लोक हो  ज्योति से होता उजियारा, ज्योतिर्मय जगदीश है  ज्योतिर्मय जग मग आशाये ,ज्योति का आशीष है  चमक दमक दीपो की ज्योति ,जीवन गीता श्लोक हो

दीवाली के दीप जले है, दीपो का त्यौहार है

दीवाली के दीप  जले है, दीपो का त्यौहार है  मिली रोशनी अंधियारे को ,खुशियो की बौछार है  मिटटी से बन जाता सब कुछ, माटी करती  प्यार है  मिटटी के दीपक कर देते ,धरती का श्रृंगार है  मिटटी से ही शिल्प ढला  है ,शिल्पी का  औजार है  गौरी की छम छम पायलिया , बैलो के बजते घुँघरू  रंगो से सजती दीवारे ,मस्ती की डम डम  डमरू  दीपक सा जग -मग हो तन मन रोशन हर दीवार है  कर्मो का यह दीप  पर्व है, करम धरम का मर्म है  शुभ कर्मों  का सुफल होगा ,नीच कर्म से शर्म है  बिना कर्म के आज नहीं है ,सपने हो बेकार है

दिवाली है

अमीर हो या गरीब  उजला धन हो तो दिवाली है  जन निर्धन हो या सम्पन्न  मन प्रसन्न हो तो दिवाली है  ब्लैक मनी नहीं है हनी  व्यवस्था भ्रष्ट हो तो जिंदगी काली है  प्रशासन सख्त हो  कामकाज में  व्यस्त हो तो दिवाली है  जीवन हरा भरा हो  अपराधी  डरा  डरा  हो तो दिवाली है  सेवा  ही धाम हो  भक्ति निष्काम हो तो खुशहाली है  धड़कन में राम हो  मन में विश्राम हो तो दिवाली है

धर्म अंधी आस्था नहीं भगवान विष्णु का चक्र सुदर्शन है

धर्म जीना सीखाता है  धर्म मारना नहीं मरना  सीखाता है  पीडितो असहायों की सेवा  करना , पीड़ा हरना  दुःख दूर करना सीखाता है  धर्म माया नहीं छाया है  धर्म वही  है जो सदाचार के पथ चल आया  है धर्म उजाले का सूरज है  अन्धेरा ढला  तो दिया है  धर्म के पथ पर चल कर  सुकरात और दयानंद ने जहर को पीया है  धर्म कर्म से विमुख कभी नहीं रहा है  कर्म को धर्म गीता में भगवन ने कहा है  धन्य वे है जो धर्म निभा कर कर्मवीर हुए है  सच पूछो तो वे कर्म वीर ही नहीं धर्म वीर हुए है  धर्म वह है जो निर्दोष के प्राण बचाता है  एक अबला की इज्जत और सज्जनता का मान बचाता है  झूठ और मक्कारी को नंगा कर सच्चाई और अच्छाई को गले लगाता है  धरम ईमानदारी और बेईमानी को अपने सही मुकाम तक पहुँचाता है  धर्म अंधी आस्था नहीं भगवान विष्णु का चक्र सुदर्शन है  सच्चाई की ताकत में ही धर्म है भगवन का होता दर्शन है

मुसीबतो का करते रहे इन्तजार है

उन्हें मुसीबतो से कम और सुविधाओ से बहुत प्यार है  हम उपाय खोज कर मुसीबतो का  करते रहे इन्तजार है उनके लिए मुसीबतो का आना एक खौफ है  मुश्किलो से होती रही हमारी नोक झोक है  जीवन में मुसीबतो का सिलसिला है  मुसीबतो के सहारे ही तो हमें यह सब कुछ मिला है  जीवन के समंदर में कही मीठा तो कही खारा जल है  करते रहो लहरो को पार  क्षितिज के उस पार उजला  कल है  उनकी कथनी और करनी में रहा बहुत भेद है  मनसा वाचा कर्मणा से हम एक रहे  तो जीवन गीता उपनिषद वेद है  परिश्रम के पसीने से जिसने कर्मो को सींचा है  हर संकल्प में बल है  हर शब्द एक ब्रह्म और वाक्य उसकी ऋचा है

हे !माधव केशव

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काया  भी अब क्षीण हुई ,मिटटी हो गया शव  अर्जुन सा मन दीजिये, हे !माधव केशव  राधा सी अब  प्रीत नहीं ,नहीं उध्दव सा ज्ञान  भव् बंधन से मुक्त करे ,शिव जी की मुस्कान 

शिव सतयुग निर्माण

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चिंता चित से हटी रहे ,चित में हो भगवान  विषपायी शिव पूज्य रहे ,कर शिव का गुणगान  शिव पूजन है सहज सरल , शिव व्यापे अभिषेक  शिव की शक्ति जानिये, शिव शक्ति है एक   सावन पावन  हरा भरा, बारिश की रिम झिम   शिव  जल  का अभियान है, शिव शंकर है हिम  शिव जी सबके परम पिता ,हम बालक अनजान  बालक सा मन  चाहिए चाहिये ,मासूम सी मुस्कान  शिव व्रत और उपवास नहीं , शिव है जग कल्याण  शिव सज्जन के साथ रहे ,शिव सतयुग निर्माण 

परमानंद

व्यक्ति प्रतीक हो या स्थान  उसे पवित्र  बना दो पर  इतना पवित्र बना भी मत दो कि  उ नसे  दुरी स्थापित हो जाए  उनमे परायापन लगने  लगे किसी व्यक्ति विशेष को  इतना पूजनीय आदरणीय मत बना दो कि  उससे हम अनुकरण न कर सके  और हम उसे सिर्फ पूजते रहे  स्वयं को इतना श्रेष्ठ मत मान लो  कि  हम जन सामान्य से दूर हो जाए ऐसी पवित्रता ऐसा पूज्य होना ऐसी श्रेष्ठता  जो आराध्य को साधक से दूर कर दे  और स्वयं को जन सामान्य को दूर निरर्थक है मिथ्या है पाखण्ड से परिपूर्ण है  हमें तो ऐसी सहजता चाहिए  और ईष्ट में ऐसी सरलता चाहिए  कि चहु और अनुभूति होती रहे ईष्ट कि और हम डूब जाए परमानंद में

बदले मन के भाव है

फूल बिखेरे गुलमोहर ने  , गर्म हो रही छाव है    ताप दे रही है दोपहरिया , भींग रहे सिर पाँव है  रस्ते टेड़े  बदहाली के ,पथ पर उड़ ती धूल  है  मानसून में होती  देरी , शायद हो गई भूल है जल बिन जीवन कब होता है निर्जन होते गाँव है  लौट रही न अब यह गर्मी ,सूखा थल से जल है आज कटे है सुन्दर उपवन , नष्ट हो रहा कल है हे ! बादल तुम क्यों है बदले ? बदले मन के भाव है  सूख गए है घट, तट, पनघट ,रिक्त हुए सब कुण्ड है  जल बूंदो को तरसे खग दल , भटक रहे चहु झुण्ड है  कोयलिया फिर भी है बोली ,कौए  करते कांव  है        

पेड़ और पिता

पेड़ और पिता में क्या अंतर है ? पेड़ भी पिता के समान छाया देता है  पेड़ की टहनियों पर पंछी आकर थकान मिटाते है  पिता के पास पुत्र आश्रय पाकर  अरमान सजाते है  सरंक्षण पाकर अभय दान पाते है  पेड़ की जड़े  बहुत गहरी होती है  पिता की सोच अनुभव से भरी होती है  पेड़ से पंछी और मानव मीठे फल पाते है  गिरने वाली लकडियो से हम भोजन पकाते है  पेड़ की छाया  देखते ही आशाये जग मगाती है  पसीने से लथ -पथ नाजुक सी देह राहत पाती है  इसलिए पिता भी पेड़ के बीच कोई अंतर नहीं है  पेड़ और पिता दोनों हमारे पूज्य है  फिर भी हम दोनों के अस्तित्व को मिटाने पर क्यों तुले है  हुई ढीली  संस्कारो की जड़े और वृध्दाश्रम क्यों खुले है 

समझो वह प्यारी माता है

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करुणा दीपक है द्वार धरा  ज़ीवन मे जिसके प्यार भरा  हम जिसे देख कर हर्षाये  इस जग का सारा सुख पाये  प्यारा से जिससे नाता है  समझो वह प्यारी माता है  तन मन का जिससे बन्धन है  चरणोँ की  रज मे चन्दन है  बेटे का मन जो पढ़ पाई  वह कठिन वक्त से लड़ आई  दिल  दर्द उसी  का पाता है  समझो वह प्यारी माता है  खुशिया आँखों मे छलकाए  दुख देखे आँसु बरसाए  मन जिसके प्यार मे पागल है  जीवन मे पाया सम्बल है  गीत उसके ही गुण गाता है  समझो वह प्यारी माता है  हम  हँस कर खेले बड़े हुये मिटटी मे लथ-पथ खड़े हुये आँचल से ममता बरसाए होकर वत्सल माँ बहलाये नटखट बचपन इतराता है समझो वह प्यारी माता है 

जो नजदीक है दूर हुए ,दूर रहते वो पास

रिश्तो का इतिहास रहा ,रिश्तो का  भू -गोल  रिश्ते लाते प्रीत रहे ,रिश्ते मीठे बोल  रिश्तो की  है  रीत रही ,रिश्तो के रिवाज  रिश्ते नाते टूट रहे ,निकली न आवाज  भावो से जो  रिक्त रहा रिश्तो से अनजान  रिश्तो की गहराई को ,मानव  तू पहचान  खूशबू से भरपूर रहा ,रिश्तों का अहसास  जो नजदीक है दूर हुए ,दूर रहते वो पास  रिश्तो से कुछ आस रही , मन  लगती है  ठेस  अपनो से तो पीर मिली , प्रीत मिली  परदेस

संतुष्टि तो मन की अवस्था है

संतुष्टि का कोई पैमाना नहीं होता कोई व्यक्ति एक बूँद पाकर संतुष्ट हो सकता है कोई व्यक्ति समुन्दर पाकर संतुष्ट नहीं होता संतुष्टि तो मन की अवस्था है असंतोष की कोई सीमा नहीं होती असंतुष्ट व्यक्ति को जितना मिल जाय कम है असंतुष्ट व्यक्ति को संतुष्ट करना  बहुत मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है असंतुष्ट व्यक्ति का साथ होता बहुत दुखदायी है संतोषी व्यक्ति ने सदा ही खुशिया बरसाई है संतुष्ट वह व्यक्ति है जो भीतर जो संत है भीतर की सत्ता की संतुष्टि का स्तर अनंत है संतुष्ट मीरा थी  जिसने गरल को पीया तो अमृत पाया है संतुष्ट संत रसखान थे  जिन्होंने धर्म को पूजा नहीं जिया है इसलिए  सदा संतुष्ट रहो असंतुष्ट रह कर कभी नहीं निकृष्ट और दुष्ट रहो

पेड़ बचा लो छाया पा लो

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दिल में दर्द भरा तो छलका  आँखों में भावो का जल  नदिया निर्झर की धाराये बहती जाती है कल -कल   बारिश छम छम नाच रही है  बाँध रखे घूँघरु पायल   चमकी बिजली  गिरते ओले   नभ पर गरजे है बादल          मौसम की होती मनमानी  उठती लहरो की हल चल   मीठी वाणी कोयल रानी  भींगी राहे है खग -दल  मरुथल मांग रहा है पानी  बालू रेती हुई पागल  घायल साँसे वृक्ष कँटीले  दुर्गम  राहे बिछड़ा दल  फाग अनूठे मस्त सुरीले मस्त हवाये हुई चंचल  उजड़े वन तो व्याकुल जीवन  जंगल जंगल है दल दल  चींटी मकड़ी तितली रानी  में भी होता अतुलित बल  प्यासे को पानी  की बूंदे  बूँद दे रही कुछ  सम्बल पेड़ बचा लो छाया पा लो  निखरा होगा भावी कल  बारिश से नदिया पूर होगी   होगा मीठा निर्मल जल 

बिन रंग के जीवन मरा

छंद से जीवन भरा , आनंद से जीवन भरा  स्नेह का यह कन्द ले लो  सदभावना  दे दो ज़रा  चाँदनी मधुकामनी  अब दे रही खुशबू हमें तुम चले  हो छो ड़ कर  मुह मोड़कर धड़कन थमे हम बुलाये तुम  न आये सोच कर कुछ मन डरा    होलिका बन जल रही है    दस दिशाए  छल रही है  गल रही है भावनाए  आशाये मन कि ढल रही है  तुम बसे हो प्यार में ,  विश्वास  को कर दो हरा भाव के भावार्थ है  परमार्थ के कई रूप है  रंगो  से तू खेल होली    क्यों रहा चुप -चुप है ? रंग से रंगीन हुआ मन  बिन रंग के जीवन मरा

कीमत

गुणो के पारखी को ही पता होती है कि सद गुणो की कीमत क्या है? सज्जनो को ही पता होती है कि संस्कारो कि कीमत क्या है? व्यापारी को ही पता होती है व्यवहार और विश्वसनीयता कि कीमत क्या है? ज्ञानी की कीमत क्या है? यह शिक्षित समाज ही जानता है मूर्ख कहा विद्वता कि पहचान कर पाता है भोजन कि कीमत सिर्फ भूख ही तो कर पाती है रेगिस्तान से पूछो कि  प्यास किसे कहते है? प्यासे रह कर  भीषण गर्म लू को लोग कैसे सहते है? ईमानदारी कि कीमत बेईमान को पता नहीं होती  ईमानदार ही बता सकता है कि  ईमानदारी कायम रखने कि कीमत क्या है  क्योकि उसने ईमानदारी कायम रखने कि कीमत समाज  परिवार ,परिवेश ,में जो चुकाई है  बेईमान मानसिकता को पराजित करने के लिए  जीवन में पग -पग पर कई चोटे जो खाई है  प्यार कि कीमत क्या और कितनी होती है  उस व्यक्ति से पूछो जिसने जीवन में ईर्ष्या और और अपमानो को झेला है  प्यार का सरोवर कितना मीठा है  घृणा से लथ -पथ जीवन कितना मैला है  

सखिया करती हास ठिठौली

जिव्हा  खोली कविता बोली  कानो  में मिश्री  है घोली जीवन का सूनापन हरती  भाव  भरी शब्दो की  टोली प्यार  भरी  भाषाए बोले जो भी मन में सब कुछ खोले लगता है इसमें अपनापन  तट पनघट मुखरित यह हो ले मादकता छाई है इसमें   दिवानो कि यह हमजोली कविता से प्यारा से बंधन  करुणा से पाया है क्रंदन वंदन चन्दन नंदन है वन  सुरभित होता जाता जीवन हाथो मेहंदी आँगन रोली  सखिया करती हास ठिठौली  काव्य सुधा अब क्यों न बरसे  भाव धरातल नेह को तरसे    प्रीत गीत का पीकर प्याला झुम झुम कर ये मन हरषे  प्रिय तम मेरी कितनी भोली   आँख मिचौली करे बड़ बोली

विकृतिया हटाओ

चुनावी घोषणा पत्र से, प्रेमिका के वादे  नेता के आश्वासन से, प्रेमी के इरादे  दिल के लिए फैसलो से ,होते चुनाव  उभरता रहा रिश्तो के ,भीतर एक तनाव  दाम्पत्यिक जीवन में, वैवाहिक बंधन  अल्पमत सरकारे ,समझौते गठ बंधन  तनी हुए तलवारे, और बिखरते रिश्ते   मजबूरियो के रहते ,अरमान है पिसते  जीवन एक प्रबंधन ,व्यवस्था बताओ  जन गण मन गायक हो ,विकृतिया हटाओ

कर्म से पहचान है

कर्म ही पूजा है प्यारे ,कर्म पावन ज्ञान है कर्म ही किस्मत सँवारे ,कर्म से पहचान है  कर्म तुझको है पुकारे ,कर्म ही  बलवान है कर्म से विमुख हुआ क्यों, कर्म से सम्मान है  कर्मरत रहता निरोगी ,कर्म से मुस्कान है कर्म कि तू कर परायण, कर्म ही भगवान् है  कर्म गीता ने कहा है ,कर्म में सब कुछ रहा है कर्म में  रहता कन्हैया. कर्म से निर्माण है  कर्म क्यों न कर रहा है ?कर्म से क्यों डर रहा है ? कर्म से मिलती है सिध्दि ,कर्म में हनुमान है