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सामने दिखती ढलान

हौसलो से घोसले है  पंख भरते है उड़ान जिंदगी बिकने को आई  बनने लगे है जब मकान रोटियों के वास्ते ही  है बिछुड़ता हर शहर पंथ के लंबे सफर पर  लगने लगी है अब थकान   घाटियों पर है चढ़ाई  लाद कर ढोते समान चोटियों जिसने भी पाई  दिल की दुनिया है वीरान अब रही न महफिले है  अब कही न फूल खिले है गीत और संगीत रोता  काव्य भी लेता विराम   हर तरफ तकरार आई  जख्म के होते निशान धूर्तता ने घेर ली है  सादगी की अब दुकान स्वार्थ से वह घेरता है  अब नजर वह फेरता है छल कपट का है अंधेरा  सामने दिखती ढलान