जिसने तिरस्कार सहा
किया है विष का पान
जीवन के कई अर्थ बुने
उसका हो सम्मान
कुदरत में है भेद नहीं
कुदरत में न छेद
कुदरत देती रोज दया
कुदरत करती खेद
जिसने सारा विश्व रचा
जिसका न आकार
करता है जो ॐ ध्वनि
ईश्वर वह ओंकार
तय जो कर पाई समय को, खो गई कोई सदी है खोह, पर्वत, खाइयों से बहकर आई नदी है पत्थरों से जो संवरती, गीत में संगीत भरती, खोजती अपना धरातल, हौसलो...