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क्रोध को आक्रोश मत बनने दो

आक्रोश एक उबलता हुआ क्रोध है जज्बात है जो बाहर आना चाहते है पर मजबूर है कसमसा कर मुठ्ठियाँ भींचे हुए क्रोध जब अभिव्यक्त नहीं हो पाया तो वह आक्रोश बना आक्रोश एक लावा है जो बरसो सीने में दफ़न रहा आक्रोश को अभिव्यक्ति के अवसर की तलाश है बहुत दिनों से वह अभिव्यक्त नहीं हो पाया है वह आक्रोश असमानता शोषण और अन्याय की उपज है अभाव जिसका भाई गरीबी और अशिक्षा जिसकी बहन है आक्रोश कभी अकारण नहीं होता सकारण होता है अकारण तो आतंक होता है क्रोध आक्रोश बन जाए उससे पहले भावनाओ के माध्यम से बहने दो क्रोध को क्रोध ही रहने दो हताशा और आक्रोश मत बनने दो 

सेवा का हो दान

घट घट में शिव व्याप्त हुए ,माता तेरे तट  रेवा जल से मुक्त हुए ,पाखंडी और शठ  माँ रेवा की आरती , रेवा तट  पर स्नान  माँ पुत्रो के कष्ट हरे  ,देती सुख सम्मान  निर्मल कोमल नीर भरा, ,है नैसर्गिक तट कलयुग में भी स्वच्छ रहे।,तेरे तट पनघट  मेरे मन की पीर हरो, करता हुँ जब स्नान  तन मन को तृप्त करो, सेवा का हो दान