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सितंबर, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

निर्धनता मन में भरी हुई

राहे कांटो से भरी हुई  खुशिया दुखो से डरी  हुई कुंठित होती अभिलाषा है  तृष्णाए  मन में हरी हुई हुए स्वप्न पखेरू है घायल  और नदी हिलोरे लेती है  जहरीली होती  हुई फसले फसले  पोषण कहा देती है रेतीले सुख बहे जाते  आशा जीवन में मरी हुई यहाँ मिला सत्य को निर्वासन  सज्जनता दुःख सहती है नारे नफ़रत से भरे हुए  दानवता विष को बोती  है यहाँ दया दीन  पर नहीं आई  निर्धनता मन में भरी हुई  यहाँ मिला दीप से काजल है  निर्बल का होता मृग दल है  हुआ दीप शिखा से उजियारा  उजियारे में होता बल है  रोशन होता है अंधियारा बिंदिया  मांथे पे धरी हुई

पायलिया सी खनक रही, रूपवती की देह

बारिश बूंदे बरस रही ,बरस रहा है नेह पायलिया सी खनक रही, रूपवती की देह  रूप सलौनी चंद्रमुखी ,अंधियारी है रात अंधियारे में बहक रहे ,तन मन और जज्बात मन में क्यों कलेश रहा ,क्यों कलुषित है चित है  नारायण  साथ तेरे  ,मत हो तू विचलित नदिया निर्झर बह रहे ,निर्मल बारिश जल  आसमान भी स्वच्छ हुआ ,स्वच्छ हुए जल थल  

आत्मा प्रदीप्त है

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अंधियारे में जलता ,आस्था का दीप है आस्था में पूजा  है ,ईश्वर समीप है    भक्ति में शक्ति है ,शक्ति में है ऊर्जा  ऊर्जा है भीतर तक ,आत्मा प्रदीप्त है  तन मन के भीतर ही ,ईश्वर की खोज है  आत्मा में पावनता ,अंतस में ओज है  तन मन को चिंतन को ,कर निर्मल जीवन को चिंतन है चित में ही, कीर्तन में मौज है  

पढ़ा दर्द का पहाड़ा है

लहराता हुआ जल है ठहरा हुआ आकाश है बिखरे हुई रिश्तो में हुई अपनों की तलाश है प्रेमाकुल पायलिया पर मिटता  विश्वास  है जीवन के चारो ओर  फिर बिखरा विनाश है बिगड़तेहुये  हालात  को लोगो ने बिगाड़ा है गुलशन हुए इस घर फिर किसने उजाड़ा है चाहो की राहो को मिली नहीं राहत है आहत  हुई भावनाए ,पढ़ा दर्द का पहाड़ा है

दंगे तेरी भेट चढ़ी, चलती हुई दूकान

जहां  चाह वहा राह मिली ,चाहत कितनी दूर चल चल कर थक पैर गए, हो गए थक कर चूर चेहरो पर मुस्कान नहीं ,उजड़े हुए मकान दंगे तेरी भेट चढ़ी,  चलती हुई दूकान महलो के मोहताज नहीं ,बचता एक ईमान रहा सत्य ही शीर्ष पर ,सत्य करे विषपान रिश्ते रस से हीन हुए, नहीं बचा कही रस ममता मन से छूट गई ,प्रीत हुई बेबस राज गए महाराज गए ,गए संत अब जेल जेलों में अब खूब हुई ,रेलम -ठेलम -पेल

सुन्दर सज्जन प्रीत से रहते क्यों अनजान

सुन्दरता  अभिशाप नहीं सुन्दरता वरदान सुन्दर सज्जन प्रीत से रहते क्यों अनजान मानसिक सौन्दर्य  बिना, खिला नहीं कोई रूप सुन्दरता बिखरी हुई ,नैसर्गिक स्वरूप विश्व मोहनी बुला रही , लूट रही है चैन भस्मासुर भी भस्म हुआ ,भगवन की थी देन यहाँ मुख्य सौन्दर्य नहीं मुख्य  हुआ है ज्ञान मुखरित होता मुख से ,वाणी से विद्वान  वाणी में सौन्दर्य नहीं  जिव्हा कड़वी नीम कोरे रूप को क्या करे ,जीवन हो गमगीन

कायर वीरो का स्वामी है

अब घृणा गिध्द ने भावो के घावो को खाया नोचा  है ह्रदय में उनकी याद रही आहे भर भर  कर सोचा है  हो  नयन  शून्यवत ताक रहे एकांत रहा  एक साथी है रही असत तमस की साजिशे चींटी बनती अब हाथी है दुखड़ो से मुखड़े सिसक रहे  अश्को को किसने पोछा है पथ पर है कांटे और कंकड़ मिली कर्मो को गुमनामी है कायरता इतनी भरी हुई कायर वीरो का स्वामी है  शब्दों से घायल होता मन हर बोल यहाँ पर ओछा  है  सुख दुःख गम खुशिया साथ रहे अपनों से इनको बाँट रहे सपने बनवाते शीश महल रही चहल पहल और ठाट  रहे मिलता जख्मो को दर्द यहाँ ,जख्मो को गया खरोचा है 

खुशिया

खुशिया मिलती नहीं खुशिया चुराई जाती है रिश्तो को  सींचने से खुशिया पाई जाती है जब हम दूसरो को खुशिया देते है तो किसी पर अहसान नहीं करते है अपने भीतर को खुशियों से संजोते है  खुशियों में जीते है खुश होकर मरते है ख़ुशी की अपनी अपनी परिभाषाये है खुश होकर जिए यह हर जन की आशाये है पर  आशाये ही रखे यह तथ्य व्यर्थ है तरह तरह से खुश रहे सही खुशिया पाए ऐसे सुख से हम हुए समर्थ है ख़ुशी कभी सुख सुविधा से नहीं आती है सच्ची ख़ुशी अभावो के भीतर आत्मा को निखरा  हुआ पाती है आत्मीयता की ऊर्जा पाकर जीवन में सक्रियता सदभाव  फैलाती है आपसी सद्भाव से ही पाया उल्लास है खुशिया चहु और बिखरी रहे मिलता रहे विश्वास  है

jo maran ko janm samajhe mai use jeevan kahungaa