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मीलो की दूरिया

मीलो की  दूरिया  मिलने  कि मजबूरिया  हो सकती है  दिलो में दूरिया पैदा  नहीं कर सकती  लम्बे और दीर्घ अवधि के अंतराल  समय तो तय कर सकते   आत्मीयता  कम नहीं कर सकते  दुश्मन कितना भी दुष्ट हो  उसका प्रहार कितना भी पुष्ट  हो  संकल्प का बल हिला नहीं सकते  राहे कितनी भी वीरान हो   सफ़र में कितनी भी थकान हो  जीत जाता अंतत साहस है  मृत्यु के क्षणो में भी व्यक्ति के पास होती  जीने कि जिजीविषा  रहती जीवन कि आस है  जग में कितना भी कोलाहल हो  बिखरा  कितना भी हलाहल हो  लग जाता योगी का ध्यान है  जीवन में कुछ जुड़ता जाए  अपनी जड़ो से जो जुड़ जाए  व्यक्ति होता वह महान है

क्या कोई निवारण है ?

मनुष्य और जीव -जंतु में कितना फर्क है  जीव जंतु अपने आकार और प्रकार से  तरह तरह की सूचनाये देते है  सर्प  अपने आकार से डसने कि सूचना  गिध्द अपने रूप से नोचने कि सूचना देता है  सिंह अपनी चाल से और भाव भंगिमा से  आक्रमण कि सूचना देता है  परन्तु मनुष्य का  दोगला पन  उसके आचरण का दोहरापन  कोई सूचना नहीं देता    सूचना दिए बिना अचानक अप्रत्याशित आघात करता है  दुष्ट व्यक्ति अकारण विश्वास घात करता है  डसता  है  धीमे जहर से पर डसने का कोई कारण नहीं है  दोगलापन उसे डसने का कारण देता है  कब नोचेगा ? कितना नोचेगा ? क्यों नोचेगा ? गिध्द की एक सीमा है  पशु के साथ उसकी  प्रकृति है  प्राकृतिक गरिमा है  पर इंसान ने अपनों को  ही बुरी तरह नोंचा है  सपनो को तोड़ा है जख्मो को बार -बार खरोंचा है  समाज और परिवार में ऐसे कई उदाहरण है  दोगलेपन का भी क्या कोई निवारण है ?