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सितंबर, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

यह आखिरी अनुतोष है

आतंक बढता जा रहा है  चारो तरफ जन रोष है रिक्त होता जा रहा  भारत का धन कोष है महंगाई बढती जा रही है  घट रहा मानव का मुल्य वे मुस्करा कर कह रहे है  मेरा नही कुछ दोष है भडके नही कही भी दंगे  इस बात का संतोष है चलते रहे गोरख धंधे  मारा गया निर्दोष है बेंच दी जिन्हे आत्माये  मतदान कर उन्हे क्यो जिताये ? सुधरे व्यवस्था  अवस्था   यह  आखिरी  अनुतोष है दीन भूख से निढाल हुआ  दिखती उन्हे  प्रदोष है वे जीत कर चले आ रहे है  होता रहा जय घोष है हुई व्यर्थ सारी योजनाये  स्वराज्य की संकल्पनाये चहु और फैला है हलाहल  और ृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृक्रुध्द आशुतोष है

तिमिर सामाज्य चिरकर ,नव चेतना जागे

कमजोर सुत्रो पर टिके है, रिश्तो के धागे अनगिनत कठिनाईया ,इन्सान के अागे है खोखले विश्वासो पर ,कटती यहाँ पर जिन्दगी तेरी यादो मे न सोये,रात भर जागे कच्चे है घर के घरौंदे ,सुख-चैन को त्यागे दर्द दुख परेशानियो को ,छोडो बढो अागे जब हौसले हो इस दिल मे अौर सामने हो मंजिले तिमिर सामाज्य चिरकर ,नव चेतना जागे

हे नाथ मेरे साथ हो

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ईमान की धरती रहे ,सत्कर्म का अाकाश हो अाराधना हो देव कि, निज ईष्ट पर विश्वास हो सूर्य से चैतन्य हो ,जीवन हमारा धन्य हो चारित्रक सौन्दर्य का,हे प्रभु !रत्न मेरे पाास हो माॅ शारदे का वरद हस्त ,इस दास के ही माथ हो चलता रहुॅगा कर्म पथ पर ,नैराश्य नही पास हो है सत्य का दुर्गम पथ पर ,नही मान लूॅगा हार लक्ष्य के पति हो समर्पण , विवाद विषाद मे भी ,न मन मेरा उदास हो अग्यान का दूर हो अंधेरा ,अौर ग्यान का पकाश हो न्याय का पथ हो पशस्त ,हो जाये दुर्भाग्य अस्त अात्मा का उजला दर्पण ,अौर रिश्तो मे मिठास हो

स्नेह

अब छुपी सच्चाईयो ,कौन जाने प्यार कि गहराईयो ,कौन माने हर तरफ मक्कारिया ,फैली हुई हो निष्कपट स्नेह को ,मिलते है ताने वक्त नहीं ठहरता अहसास ठहर जाते है यादो के भीतर से बस जख्म उभर आते है रिश्तो की हकीकत होती ही कुछ ऐसी मिलने के पल अाते है ,पर मिल नही पााते है

Shyam teri Banshi By Bipin yadav

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भारतीय मूल्यो को ,मिलता वनवास

रही सही जनता कि ,टूट गयी आस राजनैतिक सामाजिक,मूळयो का हास संसद के भीतर अब ,छिड गयी जंग लोहिया के चेलो ने ,बदले है रंग लोकनायक जे-पी का ,उडता उपहास गांधी के सपनो का ,कहा गया देश विदेशी चिंतन है ,खादी का वेश भारतीय मूल्यो को ,मिलता वनवास महंगाई आई है तो ,रूठ गये प्राण छिन गयी रोटी है,निर्धनता निष्प्राण अन्ना जी करते है ,अनशन उपवास फैली है चहु और बंद और हडताल शनैः शनैः चलती है जाँच और पडताल भृष्टो का बंगलो मे होता है वास दीन हीन को मिलते न ,मौलिक अधिकार गठबंधन से चलती ,केन्द्रीय सरकार कालेधन कि होती ,व्यवस्था दास

मंडप

ठ हरती ठुमकती ठिठकती है ठंडक तटो पर ठिठुरते टर्राते है मेंढक !! ध्रुव पद !! सर्दीले दिन होते , सर्दीली राते शीतल पवन करती शर्मीली बाते हिमगिरि से आते  हिमगिरि से आते  खुश्बू भरे पल तो हिमगिरि से आते  लगती है ठंडक चिपकती है ठंडक घरो से निकलते ही लगती है ठंडक !! १ !! ,,,,,,,,,,,,,,,,,, ठहरती ठुमकती ठिठकती है ठंडक अंधेरो को चीरती हुई आती  बयारे शीतल निर्मल जल तो फसले सॅवारे बिछाये है मौसम ने कोहरे के मोहरे हुई यादो सी धुंधली ठिठुरती दोपहरे सभी हुए बन्धक सभी हुए बन्धक विस्मित है प्रबन्धक , सभी हुए बन्धक !! २ !! ,,,,,,,,,,,,,,,, ठहरती ठुमकती ठिठकती है ठंडक हरी होती जाती है गेहू की बाली सॅवरती है सजती है मिटटी की थाली मौसम के य़ौवन , ने फसले सम्हाली लोगो के चेहरो पर दिखती दिवाली धरा से गगन तक चतुर्दिक क्षितिज तक तने हुये मंडप , तने हुये मंडप , तने हुये मंडप !! ३ !! .................. ठहरती ठुमकती ठिठकती है ठंडक