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दिसंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जगे भाग्य की रेख

नित अभिनव की प्यास रहे, नूतन नित उल्लास नवीन वर्ष में सोच नई हो , हो मन मे विश्वास जग में होते पंथ कई, ईश्वर फिर भी एक नये वर्ष में नई उमंगे, जगे भाग्य की रेख जब तक न संतोष रहा, जीवन होता शाप नवीन वर्ष में हटे अंधेरा , कट जायेगे पाप मन्दिर बजते शंख रहे, घंटी सजते थाल होता सच्चा कोष वहाँ , जो मन से खुशहाल चित में तो सन्यास नही , चिन्तन में न राम फिर भी भगवा वेश धरा, इच्छा रही तमाम

गीता ज्ञान प्रचुर

गीता में श्री कृष्ण रहे गीता ज्ञान प्रचुर गीता ने कल्याण किया  गीता गोरखपुर गीता ने है शोक हरा गीता सूर और तान गीता से नत मुख हुआ आधुनिक विज्ञान गीता में सब श्लोक कहे  धरती पर सब लोक शुध्द कर्म परमार्थ करो   पाप कर्म पर रोक गीता में है गीत रहे  रहे अनुष्टुप छन्द गीता का हर सूक्त रहा जीवन का मकरन्द

ऐसा जो भी शख्स रहा

खुल करके सबसे बात करे  खुल कर के सत्कार ऐसा जो भी शख्स रहा   उसका सद व्यवहार न ही उसके दोस्त बने  जाने न हम तुम जितना वह मासूम रहा  उतना ही गुमसुम उखड़ी उनकी साँस रही   उखड़ा उनका दम फिर भी वह सिगरेट पिये, खांसी और बलगम कोरोना का ग्रास बना   ऐसा एक इंसान सुबह न तो सैर करे  व्यसन करे तमाम

पिता हरदम मौन खड़े वे पर्वत उपमा

जिसका निश्छल प्रेम रहा, वह प्यारी है माँ पिता हरदम मौन खड़े, वे पर्वत उपमा कितने कितने घाव सहे , फिर भी रहते चुप पिता का सामर्थ्य रहा, सूरज की ज्यो धूप पिता होते शुध्द हवा, प्राणों का आधार पिता जी है पूज्य रहे, कर इनका सत्कार कानो में है गूँज रही , पिता की आवाज पिता जी गुमसुम रहे, पिता जी नाराज पिता जी है गुजर गये , गुजरा मन का बल पिता के बिन विश्व लगा, जंगल और दलदल चेहरा तेरा बाँच रहे, पिता जी है आज उनसे गम भी छुपे नही , छुपे नही है राज पिता हिमवत जमे नही, वे बरसे बादल पिता होते पूर्ण सहज , वे गिरी विंध्याचल माता कुछ है सोच रही , गाती मीठे गीत भृकुटी पिता तान रहे , दृष्टि में कुछ हित माता तो एक राग रही पितृवत है छन्द मुठ्ठी जिनकी खुली नही , होती वह सौगंध पिता से संसार मिला , पिता से घर बार  पिता जी के चरणों मे , वंदन बारम्बार पितृवत है ज्ञान रहा, पितृवत अनुभव पिता जी से सीख मिली , जीवन है सम्भव

अदरक और लहसुन

बहरे होकर मौन हुए, रहे स्वार्थ के भाव गहराई की और चले , गहरा हो स्वभाव ठण्डी होती छाँव रही , देती धूप सकून मीठी अच्छी चाय लगी, अदरक औ लहसुन मक्का रोटी साग रही, मैथी पालक ज्वार इनसे तू क्यो भाग रहा, ये पौष्टिक आहार धनिया चटनी भूल गये,  खरड़ रही नही याद भरमा बैगन की सब्जी का , कितना प्यारा स्वाद चूल्हे चौके कहाँ गये, बुझते गये चिराग बाती में न तेल रहा, कहा कंडे की आग

लिफ्ट हुये अरमान

ऊँचे शॉपिंग माल रहे, ऊँची रही दुकान ऊंचाई में शिफ्ट हुये ,लिफ्ट हुए अरमान रिश्ते थे जो बिके नही, हे मेरे सरकार दिल से दिल तक जुड़े रहे, अंतर्मन के तार बहरे होकर मौन हुए, रहे स्वार्थ के भाव गहराई की और चलो, गहरा हो स्वभाव

रोता एक किसान

घायल दोनों पैर हुये, घायल होते भाव फसलों को वो सींच रहा, सर्दी में एक गांव बारिश में है भींग रहा, थक के चकनाचूर किस्मत उनको ले गई, सुख से कितना दूर पलको में न नीर रहा , ऐसा भी एक मर्द हल्का होता भार नही , कर्जा है सिरदर्द चलते उनके पैर रहे,फिर भी नही थकान आँखों मे भी नींद नही, रोता एक किसान

निन्दक नरक पधारिये

नीति से न प्रीत रही ,लेता है हरि नाम होता नही ईश सगा , उसका काम तमाम निंदा होती व्यर्थ रही ,निन्दक है डरपोक निन्दक नरक पधारिये, बिगड़ा है इहलोक करता वह कुतर्क रहा ,  होता टस न मस मिथ्या ही अभिमान किया , ले निन्दा का रस निन्दक मन समझाईये , निन्दा है दोष निन्दा से क्यो व्यक्त करे , तू अपना यह रोष

खुली हृदय की आँख

धू धू करके देह जली, बनती जाती  राख चिंतन से है सोच ढली, खुली हृदय की आंख चिंतन जीवन वैद्य रहा , चिंतन है देवेश  चिंतन चिन्ता मुक्त करे, करते रहो निवेश चिंतन में भगवान रहे , चिंतन में है ज्ञान चिन्तन चित के दर्द हरे, अमृत का रसपान जो हर पल को साध रहे,  चिन्तन है महादेव चिन्तन बंधन काट रहा, चिन्तन कर सदैव चिन्तन से है सत्य मिला, हुई तत्व की खोज भीतर भीतर प्यास जगी , तृप्ति मिली हर रोज

ईश्वर होता व्यक्त नही

सच्ची प्रीति कहा गई , भोले जो थे लोग भोलेपन को भूल गये , कैसा है दुर्योग सीधा सच्चा धर्म कहा, सीधा सच्चा पथ इतने बढ़ते स्वार्थ गये,करता क्या समरथ ईश्वर होता व्यक्त नही , वह तो है अहसास व्यक्ति से क्यो टूट रहा, व्यक्ति का विश्वास सुख दुख में सामान्य रहा, पल पल है स्वीकार उस पर होती ईश कृपा, उसकी जय जयकार

सीधे सच्चे गाँव

सौंधी खुशबू मिटटी की , ईश्वर का वरदान ईश के ही समतुल्य रही , मासूम की मुस्कान नन्हे पंछी कहा गये, उनका कहा मुकाम मासूम बच्चा देख रहा, कितना नभ सुनसान पसरा हर पल मौन यहा,चमके तम झींगुर कर्मो का न मूल्य रहा, समय रहा निष्ठुर करते रहते सैर रहे , मिली नही है ठाँव झूठो की है रही नगरिया, सीधे सच्चे गाँव

हर जीव का कल्याण

अब तीर्थो में देव नही , भीतर है भगवान भीतर ही देदीप्य हुआ , भीतर हुआ विहान सूरज में वो आग नही , नही हिमालय हिम  बे मौसम है बरस रही , बारिश की रिम झिम उगता डूबता रोज रवि, सागर के उस पार सागर पर है साँझ मिली, किरणों का दरबार भीतर से तू भाग रहा, भीतर है निर्वाण भीतर भीतर हुआ करे, हर जीव का कल्याण

तू उससे क्यो माँग रहा

निर्मल पावन गति रही , नदिया को तू पूज चिंतन लेखन पूज्य रहा, पूज्य रही सूझ बूझ जिसका दरिया दिल रहा, जिसका चित उदार पुरुषों में वह राम रहा, अपना कर्ज उतार सबका दाता ॐ हरि, भूत भावी वाचक तू उससे क्यो मांग रहा, जो खुद है याचक सबसे सुन्दर नाम रहे, राम कृष्ण हरि ओम हरि से पुलकित रोम रहा, शिव से पावत सोम

स्वर्ग की राह निकाल

नयनो में अरविन्द रहे, हृदय में गोविन्द जीवन मे न क्लेश रहे,शेष रहे जयहिन्द जितने चंचल कृष्ण रहे, जितने सीधे राम युक्ति देते कृष्ण रहे, मुक्ति दे श्रीराम कर्मो का फल यही मिला, जीवन मे तत्काल होता ऊपर स्वर्ग नही ,स्वर्ग की राह निकाल सुख दुख दोनों साथ रहे,सुख दुख का संसार दुख से अनुभव ज्ञान मिला,सुख जीवन श्रृंगार

लेखन भी इक आग

गहरे है जज़्बात रहे, गहरा है अफ़सोस मौसम सर्दी गर्मी के, कुदरत को मत कोस चौराहे पर भीड़ जमी, जमी पर बर्फ सी बात सर्दी में कुछ आग जली, फिर भी ठिठुरी रात खिड़की से है चाँद दिखा, दिखा चाँद पर दाग लिखती दिखती वसुंधरा, लेखन भी इक आग सुन्दरता निर्दोष रही,सुन्दरता में दोष सृष्टि का सौन्दर्य रहा, हृदय का संतोष

इस युग मे महाराज

तू जिससे है खेल रहा  वह जलती हुई आग होता क्यो है भग्न हृदय सच से रख अनुराग हर पल सारे मूल्य गिरे सम्मुख दिखता काल महामारी से देश घिरा  फिर भी है हड़ताल सत के पथ पर कौन रहा  इस युग मे महाराज जिसने जितने मंत्र जपे  उसमे उतने  राज जब संकट मे देश रहा चले गये परदेश कोरोना में लौट रहे  वापस अपने देश

बन जा संत हृदय

तेरे तुझको बांध रहे, सुदृढ़ कर निश्चय जीवन कोई मंच नही, बन जा संत हृदय जिसको तूने याद किया , उसकी याद सम्हाल जो तुझको पाल रहा , वह गिरधर गोपाल मिथ्या के है वस्त्र कुलीन, नग्न रहा है सत्य कितने ऊँचे बोल रहे, अब उदघाटित तथ्य वक्त सख्त और क्रूर रहा, कैसा है यह दौर तन मन से जो जीत रहा, रहता वह सिरमौर

खाली है सन्दूक

घर घर बारूद बाँट रहे, घर घर है बंदूक कैसे दुर्दिन काट रहे, खाली है सन्दूक बिगड़ी जाती सोच रही ,बिगड़ा है आहार बिगड़े होते चाल चलन , बिगड़े है परिवार बिगड़े उनके बोल रहे, बढ़ती रही दरार रिश्ते रस रिक्त हुए , ऊंची उठी दीवार जलते घर परिवार रहे,जलती रहती रेल दुकानों में है आग लगी, दंगो का है खेल अब महलो का मोल नही ,बोल रहे अनमोल शब्दो के कुछ अर्थ रहे , अर्थो को टटोल

बोझिल है आकाश

ऊँचे पर्वत मौन खड़े, जग में सीना तान  इनसे नदिया नीर बहे, उदगम के स्थान गहरी झील सी आँख भरी, बोझिल है आकाश पर्वत टूट कर रोज गिरे, जंगल की है लाश जितने ऊंचे आप रहे,उतने बड़े सवाल थोड़ी सी है भूल रही, कितना रहा बवाल बदली उनकी सोच रही , बदली उनकी चाल ऊँचाई पर पंख लगे , हो गये वे वाचाल जितना उनमे जोश रहा, उतने भूले होश उतना ही आतंक करे, ऐसा जोश खरोश दिखती दूर से एक नदी, दिखता है पाताल मण्डवगढ़ की रूपमती , हरियाता एक ताल महामारी में कौन लड़ा,कर लो तुम पड़ताल सड़को पर है जाम लगा, वो करते हड़ताल