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अनुभव पुरातन पास है

ढला शिल्प में जब सोच है निर्मित हुआ कुछ ख़ास है  चित्रित हुई हर कल्पना  दिखा रंग और उल्लास है हुई बाग़ में तुलसी घनी हुआ पुष्ट मन विश्वास  है  हुई वेदना से दिल्लगी विष्णु प्रिया निज पास है  नभ छूने को आतुर हुई चढ़ी  पेड़  पर यह बेल है  तब शून्य से सृष्टि बनी  हुई व्यष्टि विकसित खेल है  बरसो निखरती जिन्दगी पल में मिला वनवास है  रही स्मृतियाँ अनकही रहा मन के भीतर वास है  मन हर पुराने गम रहे रहा तिमिर फिर भी आस है  मिली हमें है नूतन जिंदगी अनुभव पुरातन पास है

कब मिलेगी छाँव है

भंवर फूलो पर रहे है झील रहती नाव है ताप देती गर्मिया है तप रहे सिर पाँव है हो कहा पर प्रिय मेरे बोलती है आज टहनी खो गई जग से शीतलता खोई खोई छाँव है  जल में होती है शीतलता जल निर्मल भाव है तृप्ति को वन वन भटके सूखते कूप गाँव है हो कहा पर वत्स मेरे बोलती है आज मिटटी कट गए है वृक्ष सारे और बिकती छाँव है  हो गए अपकृत्य सारे लुप्त जल की आंव हैै पक्षीगण बून्द बून्द तरसे रोज मिलते घाव है गई कहा चंचल चिड़िया चहचहाती क्यों नही गगन सेे अब आग बरसे कब मिलेगी छाँव है

दीक्षित नहीं यह पौध है

आंधिया उठते बवंडर मार्ग पर अवरोध है  दर्द से गमगीन चेहरे ,युध्दरत हर बोध है  द्वेष की परछाईयाँ है मन में पलते द्व्न्द्व है  बारूदी होती है खुशिया हो रही हुड़दंग है  आस्था घायल हुई है दीखता प्रतिशोध है  माटी से होती बगावत कौनसा प्रतिकार है  राष्ट्र भक्ति क्षय हुई है उन्हें जय से इनकार है  सत्य से भटके विचारक लक्ष्य विचलित शोध है  भ्रम है फैला मन विभञ्जित क्लांत सी तरुणाई है  वृक्ष पर फल है विषैले विष फसले पाई है  शिक्षा से होते न शिक्षित दीक्षित नहीं यह पौध है