संदेश

सितंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहा गई मुस्कान

जीवन मे कही मान मिला ,मिला कही अपमान  मन की खुशियां कहा गई ,कहा गई मुस्कान अपने थे जो चले गये ,कहा है अपनापन रस जीवन मे नही बचा, खोया है बचपन जिसके मन मे स्नेह नही ,वहा नहीं भगवान जो होता है तरल हृदय ,वह सबसे धनवान एक प्यारी सी याद रही यादो के बीज प्यारा था जो नही रहा रह गया है नाचीज़ कहा पे सच्चा प्यार रहा, निश्छल सी मुस्कान मासूम बचपन सिसक रहा ,जीवन है श्मसान

सज्जन है संतुष्ट

सबके अवगुण देख रहा  दिखा न खुद का दोष दुर्जन को न कभी रहा  थोड़े में संतोष  बौने है प्रतिमान नये  धीमी है रफ्तार धीमे धीमे लुप्त हुए  प्रतिभा अविष्कार प्रतिबिम्बो में देख रहे  जीवन का वो सत्य दिखते अब तो उन्हें नही  अपने अनुचित कृत्य थोड़ा भी है जिन्हें मिला वे सज्जन संतुष्ट सब कुछ पाकर दुखी रहे लोभी जन और दुष्ट

ऐसा संत कबीर

जो दुख में भी दुखी नही होता नही अधीर सुख में भी जो डिगा नही ऐसा संत कबीर जो संतो के संग रहा रखता मन समभाव मानव नही  देव रहा झेल गया हर घाव खुद के बल पर टिका हुआ खुद पर है विश्वास जो मूल से है जुड़ा यहा छू लेता आकाश मिल कर के भी घुला नही इक ऐसा भी रंग सुख सुमिरन भुला नही रहता सत के संग मन मे तो संतोष नही दिखती नही उमंग  वह कैसा संन्यास भला कैसे हो सत्संग

मानव वह बेडौल

मन को तू क्यों मार रहा मन का कर उपचार मन ही मन जो दुखी रहा उसका न संसार चिंता तन को राख करे तू चिंतित क्यो होय चिंतन जीवन सुखी रहे चिंता को क्यो ढोय चिंतन पथ परमार्थ भरा चिंतित क्यो है जीव चिंतन ने नव स्वर्ग रचा स्वर्गिक सुख की नींव मौलिकता का मूल्य नही वह तो है अनमोल मूल से जो है भाग रहा मानव वह  बेडौल भीतर भी है नाद रहा उससे कर संवाद  भीतर न रह पायेगा चिंता और अवसाद

जीत जाती खुद्दारी है

अंधियारे के भीतर सुलगती रही चिंगारी है  चिंगारी के बिना उजाले ने यह दुनिया हारी है बदल जाते है भाग जब होती सीने में आग है हारी सदा ही खुदगर्जी जीत जाती खुद्दारी है

हे!कान्हा नटखट

इतने दिन तुम कहा रहे, हे!कान्हा नटखट सूनी सूनी रही डगरिया, सूने है पनघट जंगल मे सुख चैन बसा ,नियति का सौंदर्य झर झर निर्झर शोर करे, सिंह का अद्भुत शौर्य सन्नाटो में शोर नही ,उपवन बिखरे राग कोकिल बोले मीठी बोली ,करे ठिठौली काग जीवन मे जहां राम नही वहां न निश्छल स्नेह छल की कैकयी रोप रही है मन मे कुछ संदेह

पितरो का परलोक रहा

दादी का जिन्हें प्यार मिला दादा की दुत्कार  सचमुच जीवन पाया है पाये है अधिकार पूर्वजो का साथ मिला पाई सूझ बूझ सीख नन्ही गुड़िया नाच रही किलकारी और चीख कितने सारे फूल गिरे पग पग बरसा नभ माँ के पग आशीष रहा जीवन है जगमग  कितनी पावन रीत रही कितना प्यारा भव पितरो का यह श्राध्द रहा श्रध्दा का उत्सव अपने थे जो चले गए इस भव के उस पार  पितरो का परलोक रहा सपनो का संसार

कहा गए है वृध्द

सुख के साधन कहा गए कहा गए है वृध्द अनुभव के जो पाठ रहे जीवन था समृध्द अपनो का सामीप्य मिले रिश्तो का हो मान सीख मिले बुजुर्गो से अनुभव के वरदान धन वैभव तो वही रहा जहां पितरो का साथ पूर्वज जब तक साथ रहे कर लो उनसे बात जब तक उनका साथ रहा पूरे थे अरमान  हम बच्चे ही बने रहे रखते थे वे ध्यान हरि के हाथों फूल खिले दे कंचन मुस्कान मात पिता से पाया तन जीवन के सामान

दुख का साथी कौन

टिम टिम जलता दीप रहा जुगनू के है दल जुगनू करते शोर रहे दीप से तम उज्ज्वल दुख के साथी कहा गये सुख के साथी साथ पीडायें दिन रात जगी होते छल और घात अपनो का न साथ रहा अपनो का न बल अपनो से ही हार गया डूबता अस्ताचल सपने सारे ध्वस्त हुए कविता हो गई मौन छल पाकर हम पस्त हुए दुख का साथी कौन

साथी है बेईमान

मुश्किल जो है राह मिली सौ योजन या कोस तुझसे तेरा छीन गया उसका क्या ?अफसोस भोला सा इंसान रहा इक भोली सी बात जिसके कोई साथ नही उसके भोलेनाथ किस्मत से न लक्ष्य मिले बन तू क्षमतावान अक्षम करता है सिकवा सक्षम का भगवान सज्जन के साथ रहा ईश्वर का वरदान तेरा कोई दोष नही  साथी है बेईमान