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हे मात! तेरे ही लिये

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हे मात! तेरे ही लिये , निज प्राण का उत्सर्ग है निर्झर नदी हिमभूमी पर्वत , विकसित धरा है स्वर्ग है ऋतुये विविध चहु  और है जन्मे यहा पर देव है रही क्यारिया केसर भरी लटके यहा फल सेव है तन - मन हुये पुलकित नयन बिखरा यहा निसर्ग है _ मधुपान करता है जीवन , तपोभूमी पर है आचमन  खेले यहा राधा - रमण , श्रीराम का वन मे गमन सभी धातुये तुझमे रही , रहता यहा हर वर्ग है _  सेवा करे रेवा सदा , निमाड है मालव भूमी पर्वत खडे महादेव से , ऊँची चोटिया नभ ने चूमी शिव शक्ति सा है आचरण , उनका यहा संसर्ग है

क्षितिज के उस पार है

खिलखिलाई  सुबह होगी, झिलमिलाती शाम होगी तज थकन तू बढ मुसाफिर ,जिन्दगी वरदान होगी पत्थरों सा जो पड़ा है ,वह शिखर पर कब चढ़ा है  जो चेतना रसपान करता ,तारे सा नभ में जड़ा है  छोडकर मन की उदासी,मुस्कान न मेहमान होगी   उम्मीदो के आशियाने ,क्षितिज के उस पार है घोर तम में कर परिश्रम तू जीत का हकदार है  ठोकरे जो भी मिलेगी ,तेरी ही गुलाम होगी प्रश्न कितने तेरे मन मे , है चुनौतिया जीवन मे  लोहे से कुन्दन बन जा, चिंगारिया है तन-मन  मे चढ गिरी की घाटीयों पर,चिर विजय तेरे नाम होगी रोने से फल क्या मिला है,चलने से मिलता किला है दे हौसलो को तू बुलन्दी,मरुथल मे मृदुजल मिला है काया को कर तू निरोगी,माया से पहचान होगी

समय

रवि रश्मि  सत रंग है,सप्त रहे है दिन सप्त सूर की साधना,लाभान्वित अनगिन सूर्य समय के साथ है,चला काल का चक्र सूर्य देव को कोटि नमन,हटे द्रष्टिया वक्र समय गान को गाईये,समय बडा रंगीन श्रम के हाथो आज रहा ,परिश्रम बिन दीन समय परे जगदीश है,सार समय है बीज समय प्रमेय का खेल रही,तिथिया आँखातीज समय गुरू और  शिक्षक है, सीख सके तो सीख सीख रही दुनिया सारी ,तू क्यो मांगे भींख समय काल महाकाल है,काल बना विकराल प्रतिपल बीता जात रहा है,बनो काल के लाल पल-पल नभ पर चढता सूरज,ढली शाम बनी रात सूत्र समय का फिसल गया है,व्यर्थ रह गई बात स्वर्ण समय है चांदी है,मोती माणिक रत्न मूल्यवान को मिल जायेगा,कर ले सारे यत्न समय शिव का भाल है,भावी की है नींव जो पल पल को पूज रहा,सदा सुखी वह जीव

बारिश का मौसम क्या ? गर्मी का बेटा है

मौसम ने तन-मन को लू से लपेटा है बारिश का मौसम क्या ? गर्मी का बेटा है जीव-जन्तु अकुलाये सहमे हुये है साये  खग-दल है गुम सुम  ठहरे पल अलसाये चल-चल कर मरूथल मे भाग्य गया लेटा है पत झड़ ने झड़ - झड़ कर पत्ते खूब बरसाये  तकदीर से लड़ - लड़ कर मंजिल को हम पाये दुःख दर्द हर  गम को आँचल मे समेटा है जीवन का संगीत तो धीर वीर ने गाया है यमुना के तीर से ही बांसुरी स्वर आया है पर्वत है गोवर्धन  , ग्वाला -दल बैठा है