कुल्हड़ की
वह चाय नहीं है
मैथी का न साग
चूल्हे में
वह आग नहीं
कंडे की न राख
माटी की सुगन्ध
है बिछड़ी
कहा गई वह
प्यारी खिचड़ी
जितने भी थे
रिश्ते बिखरेलगे स्वार्थ के दाग
अब यहां उत्तर भटकते और खटकती सोच है पंख फैले पंछीयो के दिख रही यहां चोंच है अब हमें परछाईयों गहराइयों को जानना है ...