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सितंबर, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्रांती जन सम्वाद है

क्रांति मे रहते भगत सिंग , क्रांति होती आग है क्रांति मे होते उधम सिंग , जलियावाला बाग है क्रांति मे होती अमरता , क्रांति मे होता समर था क्रांतिकारी की हो पूजा , क्रांति बदले भाग है क्रांति से भ्रांति मिटे है निकले घर से नाग है माटी पर जो मर मिटा है , मिट्टी से अनुराग है क्रांति से मिटती है खाई , क्रांति ने गरिमा लौटाई क्रांति के आव्हान से ही , होते हम आजाद  है क्रांति से कल तू जिया था , मुक्ति का यह नाद है क्रांती की होती चिंगारी , क्रांती का चिराग है क्रान्ति ने बाँधी शिखा है क्रान्ति से जीना सीखा है क्रान्तिया होती रहेगी , क्रांती जन सम्वाद है

क्रांति

क्रांति में रहते भगत सिंग ,क्रांति होती आग है क्रांति होते उधम सिंग ,क्रांति से आजाद है क्रांति में तो अमरता है ,क्रांति से सब संवरता है क्रांति में है रागिनिया ,क्रान्ति ही युग राग है क्रांति में दीवानगी है ,क्रान्ति में है जिंदगी क्रांतिया भ्रान्ति को तोड़े ,भ्रान्ति में शर्मिंदगी क्रांति होती चेतना है स्वदेश की संवेदना है क्रांतिया जब हुई है ,मद मस्त होती बंदगी क्रांति का ही राग छेड़ो,क्रांति का फूंको बिगुल भ्रान्ति में मतिभ्रम रहता ,नीति होती ढुलमुल क्रान्ति से मुक्ति मिली है मुक्ति से शक्ति खिली है क्रांतिया चिंतन में रहती ,क्रांति करती अनुकूल 

तन्द्रा को तोड़ो

जटिलता को  तोड़ो कुटिलता को छोड़ो सरलता सहजता से कभी मुख न मोड़ो हरा हो भरा हो नही मन मरा हो करूणा हो मन मे दया से भरा हो तोड़ो  न जोड़ो मूच्र्छा को तोड़ो चवन्नी अठन्नी से पा लो करोड़ो दुखी हो सुखी हो नही बेरूखी हो नही मन मे तृष्णा  नही अधोमुखी हो तन्द्रा को तोड़ो उठो जागो दौ ड़ो हालात हाथ  नहीं खुद को  छोड़ो

बिंदी कुंकुम से गौरी

भारतीय भाषाओं में ,सब कुछ है संभव हिंदी मन का भाव है ,हिंदी है अनुभव  हिंदी में आश्रय मिले ,कविता अश्रुमय हिंदी में सब छंद मिले ,छंदों में चिन्मय  हिंदी में ही देश रहा ,हिंदी में परिवेश बिंदी कुंकुम से गौरी ,बदला चाहे वेश ह्रदय में जय हिंद रहा ,रहा हिंद अरविन्द हिंदी तुलसी जायसी ,हिंदी में गोविन्द 

वे अकड़े है तने है

--> मधुर मनोहर अनुभुतियो का पडा अकाल है कटु और कठोर अनुभुतिया बेमिशाल है अहंकार के विकार से वे अकड़े है तने है ओढ़ कर छद्म आवरण कुछ और  ही बने है काले कारनामो की खुली पोल उन्हे मलाल है हुई दुर्व्यवस्थाये , सुव्यवस्था हुई अब बौनी है बन्द और  हडताल से महंगाई हुई चौगुनी है फुल गये हाथ पैर जब हालात हुये विकराल है पक्ष विपक्ष खैलते रहे यहाँ आँख  मिचौनी है स्थगित रही बैठके अब चर्चाये कहा होनी है हुडदंग हंगामो के बीच होता रहा धमाल है बडबोले  अनियंत्रित बोल आजकल  वे बोले है कूपमन्डूक मानसिकता के भेद जिव्हा ने खोले है वाकपटुता पर केन्द्रित राजनैतिक इन्द्रजाल है

महंगी पड़ी मूकता है

--> स्नेह कहा रुकता है भेद कहा छुपता है महंगी पडी होशियारी , महंगी पडी मूकता है कोलाहल गति  को प्रगति को रोक ता है   अकैला एकांत में मन ही मन सोचता है छुपाये नही छुपी मानसिकता कुरुपता है मन ही मन कुढ़ते है , भाव कहा जुडते है सॅकरी हुई है गलिया , फुटपाथ सिकुडते है कायराना आचरण है पलायन  विमुखता है

मुक्ति के ही फूल झरे है

दे रहे शुभकामनाये शुभकामनाओं  से डरे है षडयंत्र है दुर्भावनाये जख्म होते अब हरे है झुठी है सम्वेदनाये वेदना लगती सही है वर्जनाओं की दिवारे वंचना ओं की बही है प्रीती को लुटते लुटेरे झुठ से किस्से भरे है मैला मन है मैला आँचल मैले मे मन तू चला चल भोले मन अब तक छला है छोड जग तू चल हिमाचल मंजिले पुकारती है मुक्ति के ही फूल झरे है

आकलन भी गलत ठहरे

आँखों में भरे आंसू ,बिखरे हुए सपने है परायापन छाया है ,कौन यहाँ अपने है आशाओं का आँचल ,बिछड़ गई छाया है फिर हमें चलना है ,स्वाद कई चखने है समय की कसौटी पर खरा कौन उतरा है स्वार्थ से भरे रिश्तो ,रिश्तो पे खतरा है इतना सब सहना है फिर भी यहाँ रहना है पैतरे पर पैतरा है जीवन हुआ कतरा है शब्द तो वही रहे, उनके कई आशय  है भावो के कई रूप ,दुराशय सदाशय है बिगडी हुई दशाये है,बहकी हुई दिशाये है आकलन भी गलत ठहरे उखड़े महाशय है बदरिया बारिश की कैसी यहाँ बहकी है मनोरम हुआ  मौसम ,बगिया भी महकी है झरते हुये झरने है,सरोवर जो भरने है शीतलता छाई है,निर्मलता चहकी है

सुगन्ध मे विस्तार है

रूप मे सौन्दर्य है रंग रूप मे संसार है स्पर्श मे आनंद  है ,आनंद  अपरम्पार है गन्ध मे अनुभूतिया है,सुगन्ध मे विस्तार है है रस भी रहस्यपूर्ण ,रस रंग की बौछार है सादगी मे ताजगी है ताजगी मे जिन्दगी दोस्ती की राह देती,दोस्ती और  बन्दगी दोस्ती विश्वास है,विश्वास ही संसार है जख्म दे न दोस्तो को दोस्ती दे जिन्दगी व्यक्ति मे है मान रहता,अभिव्यक्त स्वाभिमान है व्यक्तित्व मे निहीत रहे गुण,गुणवान ही इन्सान है चरित्र की परिपूर्णता ही ,ज्ञान की सम्पूर्णता है   चरित्र से परिपूर्ण ज्ञानी, गणमान्य है विद्वान है

वादे मे यादे थी,यादो मे दम था

गैरो के गम मे अपना भी गम था सन्नाटे थे पसरे ,पसरा मातम था पाया न ज्यादा था , थोड़ा सा वादा था वादे मे यादे थी,यादो मे दम था अपने ही गम मे तो रोता है कोई गैरो गम मे नही आँखे भिंगोई संवेदना मानव की ऐसी है सोई झुठी थी हमदर्दी कश्ती डुबोई बिवाईया पैरो मे दिल मे पडे छाले है खूबसूरत चेहरे भी भीतर से काले है कालिमा चेहरो की,भीतर तक गहराई मिट्टी के माधो के सब कुछ हवाले है

कृष्ण सा चितचोर है

हर तरफ चिंगारिया है,होता रहा चहु शोर है प्रश्नो का रहता हिमालय, कही ओर है न छोर है सीने मे है दिल धडकते दिल पर नही अब जोर है अब घुमडती आंधिया है चलता मचलता दौर है जय विजय मिलती रही है, मिलती नहीं कही ठोर है माया ममता का धरातल हर पल फिसलती डोर है छल रहे मन और मनुज, छल से भरी हर भोर है रोता बिलखता बालपन ,देता नही मुख कोर है नैपथ्य में असली कहानी ,मंच पर कुछ और है ले गया सुख चैन मन का , कृष्ण सा चितचोर है