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मई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

स्वजन ने स्व लूट लिया

 दुर्बल होकर देह गली,क्यो चिंतित है मन चिंतन को अस्वस्थ करे दूषित संचित धन मन तो दृढ़ संकल्प रहा,रहा न फिर भी मान स्वजन ने स्व लूट लिया, निजता का अभिमान  दुर्जुन हरदम स्वांग रचे ,धरते दृष्टि मलीन सज्जन तो पाखंड बचे ,होते पूज्य कुलीन गुरु चरणन आबध्द रहा, मिला उसे ही ज्ञान  साधक संत महंत कुलीन करता है कल्याण

आधुनिक है चित्र

गहरी मन की प्रीत रही , मिलने को बैचेन सूरज से है सांझ मिली, पल पल ढलती रैन चलने को न साथ मिला,राहे बिल्कुल शांत बिन मांगे ही मिला यहाँ, जीवन मे एकांत आड़ी तिरछी रेख खींची, घुले रंग में इत्र आधुनिकता साथ रही,  आधुनिक है चित्र सडको पर न धूल मिली, निर्मल नील आकाश निर्मल नदिया नीर हुआ, जीवन को अवकाश

घर मे है जगदीश

भीड़ में न विवेक रहा भीड़ बढ़ने से रोक भीड़ में से ही लाश मिली कोरोना का रोग  उसका था जो चला गया,रहा नही कुछ अंश   नगरी नगरी  दाग लगा , कोरोना का दंश महामारी से दूर रहो ,खुद का करो बचाव घर मे ही बस मौज करो  मन में न भटकाव जीवन का कोई मूल्य नही यह तो है अनमोल बाहर तो है आग लगी, भीतर के पट खोल तीर्थो में कब ईश मिला घर मे है जगदीश मन को मंदिर मान लिया  नित होता नत शीश

देख रहे है नैन

मजदूरी तो मिली नही कुचल गई है ट्रैन कुछ रोटी संग साग रखा ताक रहे है नैन गिरते उठते चोट लगी , घायल हो गए पाँव है सबका संकल्प यही, मिल जाये बस गांव  मुम्बई से वह गांव चला, होकर के मजबूर भूख से तो है मौत भली , मरना भी मंजूर तुम कितनी ही बात करो , सब कुछ है बेकार  दुख निर्धन का बांट सको , है इसकी दरकार दे दो चाहे लाख करोड़ , कुछ भी न हो पाय चल कर जो बेहोश हुए   घर पहुचाया जाय

देखो न उन्मान

देखो सोचो जान लो गलती के परिणाम कुदरत ने यह रोग दिया मुश्किल में है प्राण उतरो गहरे जान लो न देखो उन्मान  गहराई में खोज मिली , गहरी गुण की खान जो कुछ है  पुरुषार्थ यहां , उसके आगे ईश आलस में सामर्थ्य नही आलस व्यापत विष निर्जन वन अब कहाँ गये, कहा गया एकांत अब ऐसा एक रोग लगा ,गलिया भी है शांत

मेरा हिंदुस्तान

थोड़ी सी भी छांव नही ,घर मे नही सकून लथ पथ लथ पथ देह हुई महीना है मई जून चलते चलते उठा  गिरा , बेबस एक इंसान अपने घर कब जाएगा मेरा हिंदुस्तान बच्चे आँसू पोंछ रहे ,पूंछे एक सवाल कोरोना क्या भूत रहा? जो खाली चौपाल शव इतने कि गिने नही , कैसा है यह रोग दूर से ही तुम नमन करो , दूर से पावाधोग

कितने ही मजदूर

पथ पर न गंतव्य मिला चल चल कर बेहाल सडको पर है भूख मिली कर लो तुम पड़ताल अपने घर से दूर हुए मरने को मजबूर   सपनो से वे छले गये कितने ही मजदूर पग पग छाले भरे हुए  चेहरे हुए मलीन मजबुरी के साथ रहे , मजदुरो के दिन कैसा चिर विश्वास रहा कैसा रहा जूनून पैदल पैदल चले गए ,पटना देहरादून    सडको पर है आग लगी चली न देहरादून  कटने को मजबूर हुए , पटरी पर है खून कोरोना के साथ रहा महीना मई और जून दाढ़ी मूंछे कटी नही , सिली नही पतलून  पग में छाले भरे हुए , हरे हुए है घाव  दुखियारी और हारी माँ भावो पर पथराव