मंगलवार, 25 अक्तूबर 2022

कितने जग में दीप जले

मानव जल  थल  बाँध  रहा
कुदरत  का  है  चोर
मानव दस्यु  दैत्य  रहा 
मानव  आदम  खोर 

कुदरत  थर  थर कांप  रही 
शापित  है  हर  जीव 
हम  खुद  ही  अब  खोद  रहे 
सृजन  की  हर  नींव 

कितना  सारा खून  बहा 
मानव  तेरे  हाथ 
जीव  हिंसा  और  युध्द  हुए 
रुकते  न अपराध 

भीतर  हिंसा  कौंध  रही 
यह  हिंसक  है  दौर 
अपने  मन  के  दर्पण  पर 
करना  होगा   गौर 

कितने  जग  में  दीप  जले 
क्या  निकला  है  अर्थ 
खग दल  मरते  तेज  ध्वनि 
होता  प्रदूषण  व्यर्थ 

तुम  ऐसा  एक  पुण्य  करो 
हो  सबका  कल्याण 
हर  मन आशा  दीप जले 
हो  कुछ  नव  निर्माण 

रविवार, 23 अक्तूबर 2022

घर का आँगन लीप

पौरुष से पुरुषार्थ हुआ
पौरुष है पतवार 
जिनके भीतर  ओज  रहा 
वे  तट के  उस  पार 

सच्चाई  की  कोख  पली 
भीतर  की  मुस्कान 
अंतर्मन  में  दीप जला
कर  उजियारा  दान 

अंधियारे  की  रात  नहीं 
झिलमिल  है  आकाश 
तू  कर्मों  से  प्रीत  दिखा  
होगा  दिव्य  प्रकाश 

अन्तर  से  चित्कार  उठी 
मिला  सृजन  नवनीत 
गीतों  की  झनकार रही 
हर पल छलकी प्रीत 

जीवन  मे  धन  धान्य  रहे 
जले  स्वास्थ्य  के  दीप
दीपो से  य़ह  पर्व सजे 
घर  आँगन  को  लीप 

बाहर  कितना  शोर  रहा 
भीतर  रहा  तिमिर 
तू  इक  ऐसा  दीप जला 
तम को  जो  दे  चीर 


मिलेगी उसकी टोह

रुप  तो  है  पर  गुण  नहीं, गुण के बिन न ज्ञान 
रूप को देखे  ब्याह  करे, वह गुणहीन इन्सान 

चंदा  जैसा  रूप  दिखा, दिखा नहीं चरित्र 
 सीधा  सच्चा मूर्ख नहीं  होता  अच्छा  मित्र 

 जो जितना ही प्रिय  रहा, उससे उतना  मोह 
रब से सच्ची  प्रीत  लगा, मिलेगी उसकी टोह 

जीवन  मे  आरोग्य  नहीं,  लगे  रोग  पर  रोग 
धन  माया न  साथ  रही, तन  मन  करो निरोग 

गीता

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