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जीवन के सरोकार

प्यार में कोई शर्त नहीं होती आस्था और विश्वास में कोई संशय नहीं होता ममता करुणा और स्नेह की कोई सीमा नहीं होती क्षमताये जाग्रत हो जाए तो असीम है अहंकार के कई रूप है प्रकार है अहंकार में समाहित रहे समस्त विकार है अमर ,शाश्वत सनातन रहे विशुध्द विचार है वैचारिक विरासत सबसे उत्तम है भौतिक विरासत में पलते कई गम है संस्कारो की विरासत को जिसने पाया है जीवन में रही अक्षय ऊर्जा रही कीर्ति की छाया है

युध्द रत हर घाव है

रक्त से लथ पथ हथेली ,पथ फिसलते पाँव है  श्रम सीकर से है सिंचित ,लक्ष्य की यह छाँव है  पंथ पर न चिन्ह अंकित, चहुओर बिखरी रेत  है  नभ पर चिल गिध्द उमड़े, क्षितिज होता श्वेत है  प्यारा सा बचपन बचा लो ,युध्द रत हर घाव है  नियति क्यों होती है निर्मम खेलती रही खेल है  निज रक्त भी होता पिपासु ,परजीवी विष बेल है  कष्ट में रहता कौशल्य ,अकुशल के भाव है

रहो न केवल मौन यहाँ ,ज़िंदा जगती कौम

लोह पुरुष सरदार थे, लोहे सा संकल्प    माटी का अभिमान रहा ,अहम भाव न अल्प    होता झगड़ा रोज है, होता रोज बवाल  कश्मीर से प्रीत करो ,भारत माँ के लाल  ऐ.के सैतालिस रही, उग्रवाद के हाथ  उग्रवाद उन्मत्त रहा ,होती जनता अनाथ  भर भर झोली लेत रहे ,चले चाल पर चाल     रहे दोगले देश यहाँ, लंका और नेपाल जल न जाए देश यहाँ ,क्यों बनते हो मोम  रहो न केवल मौन यहाँ ,ज़िंदा जगती कौम

आई करवा चौथ है ,बीत गई है तीज

प्यारा सा संसार रहे, प्यार बसे  हर बोल  प्रीती और अनुराग लिए ,करवा व्रत को खोल  मन व्यापे न आग कही ,तन  व्यापे न दोष  पानी के दो घूँट में ,व्यापत  है संतोष  मन न विष का वास रहे, प्रीती  हो  अटूट  पी ले करवा चौथ पर, पानी के दो घूँट  सूख गया गल कंठ अब ,सजना समझो पीर  प्यारे से परिवार में ,मत खींचो लकीर  सजनी तेरे प्यार में ,चंदा क्या है चीज  आई करवा चौथ है ,बीत गई है तीज

झोपड़ी खपरैल है

चित्र
छत  पर छप्पर कवेलू ,झोपड़ी खपरैल  है  कच्ची है पर सच्ची रहे ,फैली रेलम पेल है  झाड़ और झुरमुट खड़े है ,टेडी मेडी मेढ़  है  आती जाती बैल गाडी ,हिलते डुलते  पेड़ है  माटी के बनते खिलौने ,काठ बनती रेल है  हुई अकड़ती एक ककड़ी ,नन्हा सा एक झाड़ है  देशी बोली में ठिठोली ,अम्मा देती लाड़ है  हल को धरता है हलधर,  हीन हिनाते बैल है  गाँवों में होता है जीवन ,सीधे सच्चे गाँव है  खेतो से चल कर निकलते ,खुर दरे से पाँव है खेती में होता परिश्रम ,होती नहीं वह खेल  है

ताकते प्रतिबिम्ब है

झाँकते हर और चेहरे  ताकते प्रतिबिम्ब है  रास्ते जल से भरे है   दृश्य होने भिन्न है  दिखती है दिव्यता तो  प्राची की अरुणाई में  ओज और ऊर्जा पवन में  उम्र की तरुणाई में  रह गई परछाईया है  वक्त के पदचिन्ह है  दृष्टिगत होते क्षितिज में  कल्पना के रंग है  उम्र भर उड़ती  रही है लक्ष्य की पतंग है  वृहद व्यथा की कथा है  मन क्यों होता खिन्न है

मानव बनता है दानव

बजता डमरू महाकाल का  नाच रहे नंदी भैरव  नर से होते नारायण है  अर्जुन के केशव माधव  ऊँचे पर्वत गहरी नदिया नभ पर पंछी की कलरव हलचल होती मन के भीतर सृजन स्वर उपजे अभिनव झरते झरने सात समंदर  गहरे जीवन के अनुभव  अंधड़ ,पतझड़ ,बारिश की झड़, मौसम होते असंभव  ताल सरोवर भूमि  उर्वर  गिरता उठता है शैशव  धर्म कर्म की बात पुरानी  नया पुराना होता भव  जीवन से होता परिचय तो  जीवन की लीला है नव  जीवन ले ले कुदरत खेले  विपदायें भीषण तांडव  कटते  जंगल होते दंगल  मानव बनता  है दानव  विस्फोटक की खेप पुरानी  क्षत विक्षत बिखरे है शव

पुष्प से माला पिरोई

भाव सृजन की धरा  है  लेखनी मन  में डुबोई  आत्मीयता ह्रदय में  प्यार की आशा संजोई  चित्त  में चित्तचोर रहता  शब्दहीन संवाद करता  श्याम ने पाई न राधा  बाधाये जाने न कोई  हाथो में मेहंदी रची ज्यो  भक्ति प्रीती में भिंगोई  श्याम की बंशी बजी तो   मीरा राधा सी है खोई  गंध और सुगंध पाने  भवरे होते   है  दीवाने  पंख  सपनो से जुड़े है  पुष्प  से माला पिरोई

राखी में आशा समाई

दर्द के हालात है, या फिर यहाँ कुछ और है  आचरण छल से भरे है , हर आवरण में चोर है विशिष्ट न अब  शिष्ट रह गए , विशिष्ट अब निकृष्ट है शुध्द न पर्यांवरण है, दिखती नहीं कही भोर है  अश्रु से आँचल भरा है ,आँख रोई है भींगोई पीड़ा क्रीड़ा कर रही है, ,माँ तो बैठी है रसोई  भैया भाभी ले गए है ,राजू अम्मा रह गए है  राखी न आई कही से ,आये न बहना बहनोई  बहना  हो गई है पराई  बहना की राखी है आई  राखी में रहती सुरक्षा   राखी में आशा समाई   

एक मुलाक़ात बाकी है

छू  लो नभ को सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए अभी भी बहुत साहस है कुछ  सांस  बाकी है  पा लो खुशियो को हालात से लड़ते हुए  संघर्षो का साथ जज्बातों की बरात बाकी है  जी लो हर पल को उल्लास से बढ़ते  हुए  जीवन नहीं है नीरस रस भरा मधुमास बाकी है  बुझा लो प्यास अंजुली भर आचमन से  बहुत ताजा है पानी पूरी बरसात बाकी है  बहुत किलकारियाँ भीड़ है चहु शोर है  मिले ख्वाईश को पंख एक मुलाक़ात बाकी है

भाव विसर्जन

अंजन ,मंजन, मन का रंजन  वंदन, चन्दन, भावुक बंधन नवल ,धवल है साँझ सवेरे  सपने तेरे ,सपने मेरे  स्वप्न प्रदर्शन ,चित का रंजन अर्पण ,तर्पण, व्याकुल दर्पण  लगी प्यासी है ,भाव समर्पण  दया भाव हो ,नहीं हो क्रंदन  सर्जन, अर्जन, भाव विसर्जन  मिली सांस , पाया बल वर्धन  गजल गीत का, हो अभिनंदन  छाया माया ,कुछ भी न पाया  शिल्प कला से ,मन भर आया कला कर्म का ,महिमा मंडन

चहकी नदिया महका जंगल

बरसी ज्यो बारिश की बूंदे  प्रियतम चाहत हुई घायल  चित चोर मोरनी थिरक रही  छम छम सी बजती बिन पायल  सरिता में धारा की हलचल  मद मस्त हिलोरे हुई चंचल  उठ और पखेरू उड़ता चल  राह ताक रहे जल के बादल  आशा क्यों अस्त हुई जाती  दीपक की बाती  सा तू जल  हो निर्मल मन उजला सा तन  चहकी नदिया महका जंगल

माँ और मैं

माता से यह देह मिली माता से संस्कार माँ के पावन चरणों में वंदन बारम्बार माँ ममता को बाँट रही माता का वात्सल्य माँ से मुक्ति मार्ग मिला माता से केवल्य  माँ का चेहरा भूल गया भुला न पाया स्नेह हर धड़कन माँ व्याप्त रही व्यापे मन औ देह  माँ ने अब तक दुःख सहा सुख न पायी माँ माँ मिटटी बन मिट गई दुःख से काँपी माँ  कांप गया नेपाल यहाँ आया जब भूचाल धरती माता हिल रही पूछती रही सवाल  काया थर थर काँप रही जीर्ण शीर्ण है देह बूढ़ी आँखे तरस रही मिला न निश्छल स्नेह  

एक दृश्य -भूकम्प

आज वहा उजड़े कई  घर है  बिखरे परिवार है  कुछ लोग जो कल तक जीवित थे  गुमशुदा या  विदा है ऊँची  -ऊँची  अट्टालिकाएं  जो कल तक थी इतरा रही  हो गई कुछ ढेर  जो बची है वे हो जायेगी ढेर देर -सबेर  एक बच्चा और एक औरत  तलाशते है सामान को  मिल जाए टूटे घर में से  कुछ बरतन खान पान को  पर मिलता नहीं यह कुछ मिलता है मलबे के ढेर में  एक माँ को बेटे का  एक बेटे को माँ का  एक पत्नी को पति का शव रोते  बिलखते परिवार  बच्चो की किलकारिया  ममता से वंचित शैशव       

जीवन जल की धारा सा

आसमान में तारा सा  जीवन जल की धारा सा  बहती हुई हवाये  है  सुख दुःख इसमें पाये है  हारा सा दुखियारा सा  खट्टा मीठा खारा सा  किस्मत किसने पाई है  सुख सपने परछाई है  सपना एक कुंवारा  सा  जीवन दर्द दुलारा सा जल निर्मल कोमल हो मन  परिवर्तन जीवन का धन   सूरज के उजियारा सा  जीवन  सबसे प्यारा सा