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आलोकित है तम घन घोर

मन से मन का पावन रिश्ता  मन से मन की जुडती डोर टिम टिम तारो की है चम चम  दीये सहारे हो गई भौर दर्द भरा है दिल के भीतर  मचा हुआ है बाहर शोर लुटा रहा है दीपक सब कुछ  आलोकित है तम घन घोर जीवन में मरती क्यों आशा  प्यास  बस रही चारो और  लेकर आई आज दिवाली  जग मग राते उजला दौर  प्यारा सारा देश हमारा  मीठी कोयल नाचे मोर  सेना के सैनिक मतवाले  सीमाओ पर बढता  जोर  गो का वर्धन हो गोवर्धन  हो मर्यादित वाहन शोर  वैदिक जैविक आज जिए हम   आनंदित होकर विभोर छला हुआ है भोला ये मन  पले हुए है आदम खोर बना रहे है मिलकर टोली खुनी लुटेरे कातिल चोर 

माँ तेरी करुणा में बल है

चित्र
माँ शारदे का हंस होता  श्वेत सुन्दर और नवल है  सत्य की होती प्रतीति  ज्ञान का अमृत तरल है  ज्ञान का गहरा सरोवर  अंकुरित होते कमल है  श्वेत वसना सौम्य मूर्ति  माँ तेरी करुणा में बल है  पंक भी होता है उर्वर   शंख रहता सिंधु जल है मान से जीवन मिलता  अपमान में होता गरल है सत्संग से जीवन खिलता  सत्य तो होता अटल है  संत की करुणा की छाया संवेदना होती सजल है अज्ञान में होता अहम् है  ज्ञान सहज और सरल है माँ तेरी कृपा से सृजन  काव्य की धारा प्रबल है

मन से मन की डोर

शारदीय नवरात गई ,शीत बढ़ी प्रतिदिन  दिखा चन्द्रमा प्रीत भरा, रात हुई कमसीन जाग उठे जज्बात नए, पर अलसाई भौर  प्रीत रीत ये बाँध रही ,मन से मन की डोर  जीवन सारा बीत गया,मिला नहीं सुख चैन  चाहत की छवि दिखी नहीं ,प्यासे रह गए नैन  आज यामिनी महक रही, चमक रहा है चंद्र  शरद पूर्णिमा में पाए है ,अमर तत्व के छंद

रिश्ते से ही घर बनते है

रिश्तो के पनघट रहे है रिश्तो से विश्वास  रिश्ते से ही घर बनते है रिश्तो में एक आस  रिश्तो की पूंजी रही है प्रीती का अहसास रिश्ते से मिलती खुशिया है रिश्तो से उल्लास रिश्ता माटी से रहा तो देश भक्ति पास माटी का कण कण बचा लो सीमाएं उदास रिश्ता अपनों से रहा है स्वप्न का मधुमास रिश्तो में होती प्रतीती और परिधि व्यास

निद्रा

निद्रा क्या है निद्रा एक स्वप्न है  स्वप्न जो नेत्र खुलते ही  ध्वस्त हो जाता है  निद्रा जब तक रहती है  स्वप्न हँसाता है रुलाता है  अप्राप्त वस्तुओ की प्राप्ति का अनुभव कराता है  निद्रा दीर्घ कालीन नहीं  अल्पकालीन होती है  अनुभूतियों खट्टी मीठी अत्यंत शालींन होती है  निद्रा में आलस्य है प्रमाद है थकान है गहराई हुई रातो में यह मन लेता  सपनो में ऊँची उड़ान है स्वप्न अर्ध चेतना का प्रतिरूप है  कल्पना चेतना सृजनशीलता है  कर्म का होता स्वरूप है  विशुध्द और निर्विकार मन  निद्रा नहीं योग निद्रा ध्यान करता है  नित्य नयी ऊर्जा पाकर  आनंद का अनुभव  रसपान करता है  इसलिए हे मन निद्रा नहीं  योग निद्रा और ध्यान करो  परम चैतन्य परमात्मा की स्तुति    उसका ही गुणगान करो

बह चली हर धार है

कह रही कुछ पंक्तिया है  होते अंकित भाव है  बीज होते अंकुरित है  और मिलती छाँव है महकती हर क्यारिया है  फल रही हर नस्ल है  बादलों में जल भरण है  मार्ग के भटकाव है बारिशो में बूँद छम छम  तृप्त धरती नेह है  लौट आई आज चिड़िया  घोसले में गेह है  बह चली चंचल नदिया  बह चली हर धार है  हो गया पुलकित यौवन  और दमकी देह है

अनुभव पुरातन पास है

ढला शिल्प में जब सोच है निर्मित हुआ कुछ ख़ास है  चित्रित हुई हर कल्पना  दिखा रंग और उल्लास है हुई बाग़ में तुलसी घनी हुआ पुष्ट मन विश्वास  है  हुई वेदना से दिल्लगी विष्णु प्रिया निज पास है  नभ छूने को आतुर हुई चढ़ी  पेड़  पर यह बेल है  तब शून्य से सृष्टि बनी  हुई व्यष्टि विकसित खेल है  बरसो निखरती जिन्दगी पल में मिला वनवास है  रही स्मृतियाँ अनकही रहा मन के भीतर वास है  मन हर पुराने गम रहे रहा तिमिर फिर भी आस है  मिली हमें है नूतन जिंदगी अनुभव पुरातन पास है

कब मिलेगी छाँव है

भंवर फूलो पर रहे है झील रहती नाव है ताप देती गर्मिया है तप रहे सिर पाँव है हो कहा पर प्रिय मेरे बोलती है आज टहनी खो गई जग से शीतलता खोई खोई छाँव है  जल में होती है शीतलता जल निर्मल भाव है तृप्ति को वन वन भटके सूखते कूप गाँव है हो कहा पर वत्स मेरे बोलती है आज मिटटी कट गए है वृक्ष सारे और बिकती छाँव है  हो गए अपकृत्य सारे लुप्त जल की आंव हैै पक्षीगण बून्द बून्द तरसे रोज मिलते घाव है गई कहा चंचल चिड़िया चहचहाती क्यों नही गगन सेे अब आग बरसे कब मिलेगी छाँव है

दीक्षित नहीं यह पौध है

आंधिया उठते बवंडर मार्ग पर अवरोध है  दर्द से गमगीन चेहरे ,युध्दरत हर बोध है  द्वेष की परछाईयाँ है मन में पलते द्व्न्द्व है  बारूदी होती है खुशिया हो रही हुड़दंग है  आस्था घायल हुई है दीखता प्रतिशोध है  माटी से होती बगावत कौनसा प्रतिकार है  राष्ट्र भक्ति क्षय हुई है उन्हें जय से इनकार है  सत्य से भटके विचारक लक्ष्य विचलित शोध है  भ्रम है फैला मन विभञ्जित क्लांत सी तरुणाई है  वृक्ष पर फल है विषैले विष फसले पाई है  शिक्षा से होते न शिक्षित दीक्षित नहीं यह पौध है

क्रोध को आक्रोश मत बनने दो

आक्रोश एक उबलता हुआ क्रोध है जज्बात है जो बाहर आना चाहते है पर मजबूर है कसमसा कर मुठ्ठियाँ भींचे हुए क्रोध जब अभिव्यक्त नहीं हो पाया तो वह आक्रोश बना आक्रोश एक लावा है जो बरसो सीने में दफ़न रहा आक्रोश को अभिव्यक्ति के अवसर की तलाश है बहुत दिनों से वह अभिव्यक्त नहीं हो पाया है वह आक्रोश असमानता शोषण और अन्याय की उपज है अभाव जिसका भाई गरीबी और अशिक्षा जिसकी बहन है आक्रोश कभी अकारण नहीं होता सकारण होता है अकारण तो आतंक होता है क्रोध आक्रोश बन जाए उससे पहले भावनाओ के माध्यम से बहने दो क्रोध को क्रोध ही रहने दो हताशा और आक्रोश मत बनने दो 

सेवा का हो दान

घट घट में शिव व्याप्त हुए ,माता तेरे तट  रेवा जल से मुक्त हुए ,पाखंडी और शठ  माँ रेवा की आरती , रेवा तट  पर स्नान  माँ पुत्रो के कष्ट हरे  ,देती सुख सम्मान  निर्मल कोमल नीर भरा, ,है नैसर्गिक तट कलयुग में भी स्वच्छ रहे।,तेरे तट पनघट  मेरे मन की पीर हरो, करता हुँ जब स्नान  तन मन को तृप्त करो, सेवा का हो दान

शब्द से संसार है

शब्द में रहती  मधुरता, शब्द से संसार है  शब्द से होता समन्वय ,शब्द से व्यवहार है  शब्द से संवाद रहता , मन्त्र सद विचार है  शब्द में शुभकामना है, सद्भावना हर बार है  शब्द का एक व्याकरण है, आचरण आभार है  शब्द में ब्रह्माण्ड रहता ,ब्रह्म निर्विकार है  शब्द से रुबाइयाँ है ,गीत की झंकार है  शब्दहीन संवेदना है, भावना के तार है  शब्द भी कुछ जानता है ,अर्थ को पहचानता है  अर्थ का कुछ मूल्य पा लो ,शब्द ही व्यापार है   शब्द में आलोचना है ,व्यंग्य बारम्बार है  छंद में हर रस भरा है ,काव्य का शृंगार है  शब्द शक्ति को बचा लो, शब्द ही पतवार  है  शब्द की सीमाये पा लो ,लेखनी की धार है  शब्द में ऊंचाइयां है ,गहराईयाँ है भार है  अर्थ भी मुश्किल रहे है, शब्द से दीवार है  शब्द से कोई पा रहा है, प्यार की बौछार है  जा रहा है शब्द से ही, शख्स वह हर बार है

मानव सेवा का वन्दन है

सेवा का जिसमे भाव भरा  करूणा का पाया चन्दन है करुणा से पाई मानवता   मानव सेवा का वन्दन  है तन दुर्बल होकर मरा मरा  मन मूर्छित होकर डरा डरा बचपन ने खोई कोमलता   फूटे सपनों के क्रंदन है लिए  घाव गरीबी  हाथो मे  बूढी माँ रहती लातो मे झुग्गी रोती है रातो मे  सपनों मे रहता नंदन  है  सुख रहा सदा ही भावो में  वह तृप्त रहा अभावो में दुःख महलो में भी पलते है   होते सुविधा में बंधन है

व्यष्टि और सृष्टि

सृष्टि में समष्टि और समष्टि में व्यष्टि समाहित है सृष्टि में जल वायु बच जाए तो सुरक्षित है व्यष्टि ने समष्टि समष्टि ने सृष्टि को किया दूषित है सृष्टि में वृष्टि शीत कही होती है कम कही होती अपरिमित है शहर गाँव सड़क खेत सभी होते आप्लावित है मिल जाए कही निर्मल जल स्वच्छ वायु तो लग जाए चित है निज स्वास्थ्य हमारा मीत है सृष्टि का आरम्भ है मध्य है और अंत भी सुनिश्चित है पर अंत तक चेतना जीवित है इसलिए हे  व्यष्टि तुम समष्टि के संग अपनी सृष्टि को बचाओ सृष्टि रस द्रव्य कण में परम तत्व को पाओ

शक्ति या सामर्थ्य

शक्ति जहा व्यक्ति का बाह्य बल है सामर्थ्य वही व्यक्ति की आंतरिक क्षमता है शक्ति का अर्थ जहाँ यह दर्शाता है कि कोई व्यक्ति किसी को कितना पीट सकता है सामर्थ्य यह प्रकट करता है कि कोई व्यक्ति कितना सह सकता है शक्ति जहाँ आक्रामकता है सामर्थ्य वहा सहिष्णुता है शक्ति करती जहाँ युध्द क्रीड़ा है सामर्थ्य में रहती भीतर की पीड़ा है सागर की लहरे उठ कर ऊपर की लहराती है तूफान के भीतर सुनामी ले आती है तब वह शक्ति की अभिव्यक्ति करती प्रलय मचाती है सामर्थ्य वह है  जो सागर की गहराई में रहता विशाल जल राशि को नापता है पर्वतो की ऊंचाई और विशालता है जिसकी  विराटता को देख हृदय काँपता है सामर्थ्य जहा धारण करने की क्षमता है शक्ति वही मारण का कारण है सामर्थ्यशाली व्यक्ति की क्षमता सदा होती असाधारण है सामर्थ्य आकाश है  जहाँ कई आकाश गंगाएँ रहा करती है सामर्थ्य शिव है जिनकी जटा से माँ गंगा ही नहीं पसीने से रेवा बहा करती है सामर्थ्य वह धैर्य है  जो संकल्प में पला करता है संकल्प का बल पा  सामर्थ्य सदा भला करता है व्यक्ति वही महान है जो सामर्थ्यशाली है सामर्थ्यवान व्यक्ति की झोल