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पुकारता तू आसमाँ

पुकारता तू आसमाँ  निहारता तू भौर है  मिला रवि से तेज है  शशि ने हिलोर है  है लक्ष्य पर बढ़े कदम  क्षितिज का न छोर है  समेट ले तू सारे गम  लगा ले दम किनोर  है  मिली विजय न राह पर  जीवन मरण का दौर है  ख़ुशी है किसके वास्ते  ख़ुशी से मन विभौर है  हुई क्यों आँख तेरी नम  मिला नहीं तुझे सनम  धरो चरण करो वरण   सफल न करता शोर है  खुद ही से तू है हारता  खुद ही पे तेरा जोर है  तू ही जीवन संवारता  भीतर तेरे ही ठौर है सुहाता नहीं ये समा   अभी तो तू किशोर है  सुबह से ले ले ताजगी    जगेगा पोर पोर है