संदेश

नवंबर, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
जीवन की नदी में उम्र की है नाव कड़ी दोपहर में कही नहीं छाँव रहा नहीं साथी किस्मत का हाथी छीन ली गई जैसे अंधे की लाठी शूलो की चुभन से घायल है पांव सफर की थकन में मिली नहीं ठांव सबल बाजुओ ने सागर है तैरे थके सूर्य से भी सुबह मुंह फेरे क्षितिज के है उस पार सपने सुनहरे बसायेगे यहाँ सतयुगी गाँव

anubhootiyaa

(1) शिशिर के सर्दिले झोके, तिमिर में गहराते जाए सोई हुई संवेदना ने ,चेतना के गीत गाये कोसना बंद किया जाए , अब यहाँ शीतल पवन को शीत की सदवृत्ति से ही गंगा हिमालय से है आये (2) कुछ देर भले ही लग जाए स्वप्निल उषा की प्रथम किरण में घनघोर अंधेरो की बस्ती में रजनी उज्ज्वलता पायेगी रही परम्परा प्रतिकूल चले हम डटे रहे प्रतिमान बचाने मधु- भंवरो की आक्रांत -क्रीडा पीड़ित न प्रण को कर पाएगी (4) स्मृतियों की गुहा में छाया हुआ घनघोर तम है व्यथित मन में उठती आहे तृप्ति के क्षण बहुत कम है शब्द जाल में उलझकर गम हो गई संभावनाए अनगिनत प्रतिबिम्बों में ही सृजनाओ के भरम है

वेदनाओं का गरल पी ,संवेदनाओं को बचाया

उम्मीदों का सघन वन ,जीवन में चहु और छाया झाड़ियो के झुण्ड ने ही ,हरे वृक्ष को सुखाया कष्ट प्रद पथ से गुजर कर ,वक्त को हमने बीताया कंटको और कंकडो ने ,पैरो से रक्त बहाया नियति की निर्ममता में ,निज शैशव जब पला था था नहीं ममता का साया ,बालपन हुआ था पराया लक्ष्य की लम्बी डगर पर ,मेरा यौवन जब चला था उखड़ती सांसो के दम में ,संकल्प का दीपक जला था दूर तक फैले क्षितिज में ,दिखती नहीं थी छाया ताडनाओ की तपन थी ,था सूरज भी तम-तमाया कामना पर प्रश्न -अंकित ,मंजिले थी चिर प्रतीक्षित थी प्रतिभाये उपेक्षित ,रही उमंगें फिर भी संचित छद्म चल की देख माया ,अंतर्मन अति अकुलाया काँटों सी कुटिलता ने ,राह को मुश्किल बनाया गूंजता नव-गान मेरा ,आव्हान है जाए अन्धेरा विहान छा जाए सुनहरा ,सृजन का लग जाए डेरा बस इसी आशा किरण से ,जीवन में अनुराग आया वेदनाओं का गरल पी ,संवेदनाओं को बचाया

गीत और संगीत करे ईश का गुणगान है

सुर भरी सुबह है सुर मयी शाम है, पंछीयों के गान से मिट गई थकान है बारीश की छम-छम से बजती नुपूर है, महफिले है कुदरत कि नाचते मयुर है नैसर्गिक जीवन मे संगीत विज्ञान है झरनों के कल-छल मे राग है बसे हुये भॅवरो की गुंजन भी रागीनि लिये हुये कोकिल के कंठ से निसर्ग करती गान है परमात्मा से रही आत्मा को प्रीत है भावों से परिपूर्ण गीत और संगीत है गीत और संगीत करे ईश का गुणगान है

माटी पर वह मर मिटा,लोहा था पिघल गया

कैसे देखे कोई सपने अाकाश के हुई निर्लज्ज थी उनके अाॅख की हया रक्त -रंजित रहे हाथ कर्मयोग के पत्थरों को मिल रही हर तरफ से दया चौराहे पर मिली थी हमे निष्ठुरता मूर्तियों से शहर पूरा सजता गया           सज्जनो के भाग मे अाऐ थे घोर तम था समय बहुत विषम जीत फिर भी वह गया सत्य की राह पर राही बढता गया सूर्य सत्कर्म का नित्य उगता गया थे नहीं खोंखले वादे इरादे , फौलादी मंसूबो ने फासला तय किया ,ढेरो थी मुसीबते वे हसते रहे षड़यंत्र के चक्र व्यूह वे रचते रहे दीप निर्विकल्प का ज्योति पुंज ले नया शुभ संकल्प का दीप्त पथ कर गया लेखनी क्रान्ति की दे रही है चेतना , ध्येय की अाग थी ,शोला बनता गया खून अौर अाॅसू ने ,थी लिखी व्यथा कथा , मत सताना उसे ज्वाला वह बन गया थी शहीद की चीता ,सीमा पर था डटा , माटी पर वह मर मिटा ,लोहा था पिघल गया शत्रु दल दहल गया ,दे हौसलों को बल गया इस वतन के राग को दे नई गजल गया