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सखिया करती हास ठिठौली

जिव्हा  खोली कविता बोली  कानो  में मिश्री  है घोली जीवन का सूनापन हरती  भाव  भरी शब्दो की  टोली प्यार  भरी  भाषाए बोले जो भी मन में सब कुछ खोले लगता है इसमें अपनापन  तट पनघट मुखरित यह हो ले मादकता छाई है इसमें   दिवानो कि यह हमजोली कविता से प्यारा से बंधन  करुणा से पाया है क्रंदन वंदन चन्दन नंदन है वन  सुरभित होता जाता जीवन हाथो मेहंदी आँगन रोली  सखिया करती हास ठिठौली  काव्य सुधा अब क्यों न बरसे  भाव धरातल नेह को तरसे    प्रीत गीत का पीकर प्याला झुम झुम कर ये मन हरषे  प्रिय तम मेरी कितनी भोली   आँख मिचौली करे बड़ बोली