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किस्मत अब तो उन्ही करो में

कड़े सुरक्षा के घेरो में  रहे निरंतर जो पहरो में  छुपी हुई है निष्ठुरता तो, कुर्सी के कुत्सित चेहरो में  जटिल प्रक्रियाओ में घिरकर  मिटी योजनाओ कि स्याही  संवेदना का स्वांग रच रही  शोषणकारी नौकरशाही  कैद हो गई है जनता की   किस्मत अब तो उन्ही करो में  धसे हुए है प्रगति पहिये  बिकी हुई सम्पूर्ण व्यवस्था  थकी हुई बेहाल जिंदगी  ढूंढ  रही खुशहाल अवस्था  समाधान के सूत्र खोजती  बीत गई आयु शहरो में  यश वैभव की ऊँची मीनारे कलमकार को ललचाये  चाटुकारिता के हाथो में  राज्य नियंत्रण रह जाए  सिमट गए सुख के उजियारे   उनके ही आँगन कमरो में  

भक्ति में रहता समर्पण

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भक्ति में रहता समर्पण और त्याग में संन्यास है  भावना का यह सरोवर ,नहीं वाक्य का विन्यास है  रहता निश्छल ह्रदय में ,भाव से अभिभूत है  आत्मा होती बैरागन ,मन हुआ अवधूत है  आस्था है चिर सनातन ,भक्त का विश्वास  है   जानता है मानता है ,पर कहा वह सुख है  राधा जी  रूठी हुई है ,हर ख़ुशी में दुःख है  भक्ति में शक्ति है रहती और प्रेम में उल्लास है  राम से होती रामायण, श्रीकृष्ण से संगीत है  प्यार कि हर हार में ही ,होती ह्रदय की जीत है भाव भी भींगे हुए है पर बुझ   न पायी प्यास है

मीलो की दूरिया

मीलो की  दूरिया  मिलने  कि मजबूरिया  हो सकती है  दिलो में दूरिया पैदा  नहीं कर सकती  लम्बे और दीर्घ अवधि के अंतराल  समय तो तय कर सकते   आत्मीयता  कम नहीं कर सकते  दुश्मन कितना भी दुष्ट हो  उसका प्रहार कितना भी पुष्ट  हो  संकल्प का बल हिला नहीं सकते  राहे कितनी भी वीरान हो   सफ़र में कितनी भी थकान हो  जीत जाता अंतत साहस है  मृत्यु के क्षणो में भी व्यक्ति के पास होती  जीने कि जिजीविषा  रहती जीवन कि आस है  जग में कितना भी कोलाहल हो  बिखरा  कितना भी हलाहल हो  लग जाता योगी का ध्यान है  जीवन में कुछ जुड़ता जाए  अपनी जड़ो से जो जुड़ जाए  व्यक्ति होता वह महान है

क्या कोई निवारण है ?

मनुष्य और जीव -जंतु में कितना फर्क है  जीव जंतु अपने आकार और प्रकार से  तरह तरह की सूचनाये देते है  सर्प  अपने आकार से डसने कि सूचना  गिध्द अपने रूप से नोचने कि सूचना देता है  सिंह अपनी चाल से और भाव भंगिमा से  आक्रमण कि सूचना देता है  परन्तु मनुष्य का  दोगला पन  उसके आचरण का दोहरापन  कोई सूचना नहीं देता    सूचना दिए बिना अचानक अप्रत्याशित आघात करता है  दुष्ट व्यक्ति अकारण विश्वास घात करता है  डसता  है  धीमे जहर से पर डसने का कोई कारण नहीं है  दोगलापन उसे डसने का कारण देता है  कब नोचेगा ? कितना नोचेगा ? क्यों नोचेगा ? गिध्द की एक सीमा है  पशु के साथ उसकी  प्रकृति है  प्राकृतिक गरिमा है  पर इंसान ने अपनों को  ही बुरी तरह नोंचा है  सपनो को तोड़ा है जख्मो को बार -बार खरोंचा है  समाज और परिवार में ऐसे कई उदाहरण है  दोगलेपन का भी क्या कोई निवारण है ?

मन अमृत है विष मत घोलो

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खुद को तोलो फिर कुछ बोलो  मन अमृत है विष मत घोलो जीवन तो वरदान है  चन्दा तारा यह जग प्यारा  जीवन सारा तू खुद हारा  क्यों करता विषपान है? भाव रंगीले नीले पीले  चिंतन का वट  तट रेतीले  करता क्यों अभिमान है ? पल पल हर पल   कल  छल कल छल  चंचल मन अविराम है  टिम टिम टिम टिम     तारे टिम टिम  रिम -झिम रिम झिम  बारिश रिम झिम  कर लेना रस पान है  राते  गहरी शाम सुनहरी  दिन गुजरे और उषा ठहरी  सुबह की  मुस्कान है  

बहुत है

आप पूजा करो या न करो  पर आपके कारण कोई पूजा करने में समर्थ हो जाए यही बहुत है आप सेवा करो या न करो  आपके कारण कोई सेवा कर पाये यही बहुत है आप दान करो या न करो  पर आपके मितव्ययिता के कारण कोई दान कर पाये यही बहुत है आप अच्छे वस्त्र और आभूषण पहनो या मत पहनो  पर आपके सादगी किसी नंगे गरीब बच्चे और  किसी नारी कि लज्जा ढक  पाये बहुत है आप ईमानदारी से कार्य करो या न करो  आपके व्यवहार से कोई ईमानदार रह पाये पर्याप्त है आप  चरित्रवान रहो या न रहो आपकी ईच्छा  है  पर आपके कारण किसी का चरित्र सुरक्षित रह जाए यह पर्याप्त है  आपका व्रत उपवास उतना नहीं है आवश्यक  जितना आवश्यक है कि किसी भूखे को समय से समुचित भोजन मिल जाए आपकी साधना ईष्ट को  जब ही प्रसन्न कर पायेगी  जब संसार कि प्रत्येक व्यक्ति के प्रति समदृष्टि हो आपकी  प्रत्येक परिस्थिति में आपके मन में उल्लास है  आप पढ़ाई  या स्वाध्याय करो या न करो  पर आपके संयमित आचरण और उदारता से पढ़ पाये आगे बड़ पाये बहुत है आप भले अकर्मण्य रहो भले आलस्य रत हो पड़े रहो  पर आपकी अकर्मण्यता किसी कि सक्रियता बाधित न करे बहुत है आप कुछ अच्छा रच सको या न

नारी और नदि का अस्तित्व

नदि नदि नही नारी है नारी नारी नही नदि है नदि और नारी सब समझती है सब जानती है वह अपने भीतर की कमजोरिया और ताकत को अच्छी तरह पहचानती है जीवन मे कौन है अच्छा और कौन है बुरा कौन है पूर्णता को लिये हुये  और है अादमी अधुरा नदि ने अपना प्रदूषण खुद धोया है घनघोर बारिश के भीतर किया है स्नान  अपना आँचल भींगोया है पर इन्सान ने अपनी गलतियो को नही सुधारा  और फिर खूब रोया है नदि और नारी को कोई कितना भी अपवित्र कर दे  उसके पास पावनता के साधन है और पुरुषो के पास उपयोग है उपभोग है  शोषण की मानसिकता है ,भोग के संसाधन है इसलिये नदि और नारि की सामर्थ्य को कोई नही समझ पाया है नारी ने नदि बन कर और नदि ने बह - बह कर अपना अस्तित्व बचाया है

सूरज की संघर्ष यात्रा

उषा साक्षी है  सूरज के संघर्ष यात्रा की उसने देखा है  सूरज के अँधेरे से लड़ने का साहस सूरज का  वह साहस और पौरुष  जो हम नहीं देख पाए  हमें  तो  केवल  सूरज की सम्पूर्णता का ही अहसास है हम नहीं जान सकते  सूरज ने  सम्पूर्णता पाने के लिए कौनसे दर्द सहे है सूरज के ह्रदय में दुखो के कौनसे लावा बहे है इसके लिए हमें ब्रह्म मुहूर्त में पूरब के क्षितिज  को निहारना होगा देखना होगा की एक अन्धेरा  उदित  होने वाले प्रतिभा के रवि को किस प्रकार डराता है नया नवेला सूरज  जब उगने को होता है  तब  अन्धेरा किस तरह गहराता है जिसने भी सूरज की उस संघर्ष यात्रा को देखा है प्रतिभा रूपी रवि को उसने ही जाना पहचाना है परखा है   

निर्धनता मन में भरी हुई

राहे कांटो से भरी हुई  खुशिया दुखो से डरी  हुई कुंठित होती अभिलाषा है  तृष्णाए  मन में हरी हुई हुए स्वप्न पखेरू है घायल  और नदी हिलोरे लेती है  जहरीली होती  हुई फसले फसले  पोषण कहा देती है रेतीले सुख बहे जाते  आशा जीवन में मरी हुई यहाँ मिला सत्य को निर्वासन  सज्जनता दुःख सहती है नारे नफ़रत से भरे हुए  दानवता विष को बोती  है यहाँ दया दीन  पर नहीं आई  निर्धनता मन में भरी हुई  यहाँ मिला दीप से काजल है  निर्बल का होता मृग दल है  हुआ दीप शिखा से उजियारा  उजियारे में होता बल है  रोशन होता है अंधियारा बिंदिया  मांथे पे धरी हुई

पायलिया सी खनक रही, रूपवती की देह

बारिश बूंदे बरस रही ,बरस रहा है नेह पायलिया सी खनक रही, रूपवती की देह  रूप सलौनी चंद्रमुखी ,अंधियारी है रात अंधियारे में बहक रहे ,तन मन और जज्बात मन में क्यों कलेश रहा ,क्यों कलुषित है चित है  नारायण  साथ तेरे  ,मत हो तू विचलित नदिया निर्झर बह रहे ,निर्मल बारिश जल  आसमान भी स्वच्छ हुआ ,स्वच्छ हुए जल थल  

आत्मा प्रदीप्त है

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अंधियारे में जलता ,आस्था का दीप है आस्था में पूजा  है ,ईश्वर समीप है    भक्ति में शक्ति है ,शक्ति में है ऊर्जा  ऊर्जा है भीतर तक ,आत्मा प्रदीप्त है  तन मन के भीतर ही ,ईश्वर की खोज है  आत्मा में पावनता ,अंतस में ओज है  तन मन को चिंतन को ,कर निर्मल जीवन को चिंतन है चित में ही, कीर्तन में मौज है  

पढ़ा दर्द का पहाड़ा है

लहराता हुआ जल है ठहरा हुआ आकाश है बिखरे हुई रिश्तो में हुई अपनों की तलाश है प्रेमाकुल पायलिया पर मिटता  विश्वास  है जीवन के चारो ओर  फिर बिखरा विनाश है बिगड़तेहुये  हालात  को लोगो ने बिगाड़ा है गुलशन हुए इस घर फिर किसने उजाड़ा है चाहो की राहो को मिली नहीं राहत है आहत  हुई भावनाए ,पढ़ा दर्द का पहाड़ा है

दंगे तेरी भेट चढ़ी, चलती हुई दूकान

जहां  चाह वहा राह मिली ,चाहत कितनी दूर चल चल कर थक पैर गए, हो गए थक कर चूर चेहरो पर मुस्कान नहीं ,उजड़े हुए मकान दंगे तेरी भेट चढ़ी,  चलती हुई दूकान महलो के मोहताज नहीं ,बचता एक ईमान रहा सत्य ही शीर्ष पर ,सत्य करे विषपान रिश्ते रस से हीन हुए, नहीं बचा कही रस ममता मन से छूट गई ,प्रीत हुई बेबस राज गए महाराज गए ,गए संत अब जेल जेलों में अब खूब हुई ,रेलम -ठेलम -पेल

सुन्दर सज्जन प्रीत से रहते क्यों अनजान

सुन्दरता  अभिशाप नहीं सुन्दरता वरदान सुन्दर सज्जन प्रीत से रहते क्यों अनजान मानसिक सौन्दर्य  बिना, खिला नहीं कोई रूप सुन्दरता बिखरी हुई ,नैसर्गिक स्वरूप विश्व मोहनी बुला रही , लूट रही है चैन भस्मासुर भी भस्म हुआ ,भगवन की थी देन यहाँ मुख्य सौन्दर्य नहीं मुख्य  हुआ है ज्ञान मुखरित होता मुख से ,वाणी से विद्वान  वाणी में सौन्दर्य नहीं  जिव्हा कड़वी नीम कोरे रूप को क्या करे ,जीवन हो गमगीन

कायर वीरो का स्वामी है

अब घृणा गिध्द ने भावो के घावो को खाया नोचा  है ह्रदय में उनकी याद रही आहे भर भर  कर सोचा है  हो  नयन  शून्यवत ताक रहे एकांत रहा  एक साथी है रही असत तमस की साजिशे चींटी बनती अब हाथी है दुखड़ो से मुखड़े सिसक रहे  अश्को को किसने पोछा है पथ पर है कांटे और कंकड़ मिली कर्मो को गुमनामी है कायरता इतनी भरी हुई कायर वीरो का स्वामी है  शब्दों से घायल होता मन हर बोल यहाँ पर ओछा  है  सुख दुःख गम खुशिया साथ रहे अपनों से इनको बाँट रहे सपने बनवाते शीश महल रही चहल पहल और ठाट  रहे मिलता जख्मो को दर्द यहाँ ,जख्मो को गया खरोचा है 

खुशिया

खुशिया मिलती नहीं खुशिया चुराई जाती है रिश्तो को  सींचने से खुशिया पाई जाती है जब हम दूसरो को खुशिया देते है तो किसी पर अहसान नहीं करते है अपने भीतर को खुशियों से संजोते है  खुशियों में जीते है खुश होकर मरते है ख़ुशी की अपनी अपनी परिभाषाये है खुश होकर जिए यह हर जन की आशाये है पर  आशाये ही रखे यह तथ्य व्यर्थ है तरह तरह से खुश रहे सही खुशिया पाए ऐसे सुख से हम हुए समर्थ है ख़ुशी कभी सुख सुविधा से नहीं आती है सच्ची ख़ुशी अभावो के भीतर आत्मा को निखरा  हुआ पाती है आत्मीयता की ऊर्जा पाकर जीवन में सक्रियता सदभाव  फैलाती है आपसी सद्भाव से ही पाया उल्लास है खुशिया चहु और बिखरी रहे मिलता रहे विश्वास  है

jo maran ko janm samajhe mai use jeevan kahungaa

गलतिया

जीवन में गलतिया हर व्यक्ति से होती है परन्तु गलतियों की पुनरावृत्ति बुरी आदतों का कारण होती है बुरी  आदते व्यक्ति को अपराधी बना देती है जब लोग गलतियों को बर्दाश्त करते है  तो व्यक्ति स्वयं को सही मानने का भ्रम पाल लेता है अपराध की तह तक जाने के लिए अपराधी की मानसिकता तक जाना होता है अपराधी के मनो मष्तिष्क के भीतर विचरने वाले विचारों  षड्यंत्रों को पाना होता है इसलिए गलतियों को मत दोहराओ गलतिया करने वालो को  जहा  भी अवसर मिले गलत जरुर ठहराओ यह सच है इंसान गलतियों का पुतला है पर गलतिया करते हुए यहाँ कोई इंसान नहीं निखरा है गलत स्पष्टि करणों  से झूठा हुआ आदमी  व्यक्तित्त्व बिखरा है

विमल मति

ज्योति रूप परमात्मा, द्वादश ज्योतिर्लिंग आलोकित अंतर करे ,शिव मंदिर शिव लिंग परम पिता परमात्मा ,माता पार्वती महादेव दो वर हमें ,हो निर्मल मन विमल मति

चिंतामन है शिव

परम धरम अनुराग है ,करम धरम की नींव  तू क्यों चिन्तारत हुआ ,चिंतामन है शिव  सावन होता हरा भरा ,हरियाता हर खेत  नदिया लाई अपने साथ, कितनी सारी रेत  भाग्य रथी  भागीरथी ,भव के हरते पीर  जीवन सुखमय कर देता ,मन का निर्मल नीर राज गए राजा गए ,चले गए सम्राट  जर्जर  काया होत रही, पकड़ी सबने खाट  बारिश झर -झर  बरस  रही, सरिता हुई निहाल तट सेतु अब टूट गये ,मैदानों में ताल  

कौन नहीं चाहता

संसार  में कौन नहीं चाहता की उसके शत्रु नहीं हो ? यह धरा सभी और मित्रो और हितैषियो सी घिरी हुई हो कौन नहीं चाहता की वह सभी प्रकार की आशंकाओं और भय से मुक्त हो ? सभी प्रकार से सुरक्षित हो जीवन आनंद और उल्लास से युक्त हो कौन चाहता वह योध्द्दा अपराजेय हो ? वैभव और ऐश्वर्य से हो युक्त होती रहे चहु और उसकी जय जय हो संसार में कौन नहीं चाहता वह गुणवान और विद्वान हो ? महकती रहे यामिनी बिखरी  तारो सी  मुस्कान हो कौन चाहता वह सूर्य सा तेजस्वी हो ? व्यक्तित्व में हो शीतलता व्यक्तित्व ओजस्वी हो पर इतना सब कुछ  चाहने से क्या होता है पल्लवित परिवेश में वही  होता है   जैसा हमारे कर्म का बीज होता है

आस्था

  विश्वास  जब श्रध्द्दा  के वसन  धारण  कर  लेती  है  तो आस्था  बन  जाती  है  हजारो  आस्थाये जब  प्रतिमा पर एकत्र  हो जाती  है  तो प्रतिमा  प्रतिमा नहीं रह जाती  मंदिर में जीवंत  हो वह  देवता और  देवी  कहलाती  है   आराधना जिसकी हम करे  वे हमारे  आराध्य  कहलाते है  अनिष्ट  का  हरण  करे  अभिष्ट  की पूर्ति करे हम  उन्हें ईष्ट  कहते  है  ईष्ट  हमारी  साँसों  में और ईष्ट के भाव  लोक  में  हम  रहते है  आलॊकित करे अन्तर्मन  को  उस व्यक्तित्व  को हम महापुरुष , संत, महंत , कहेंगे  जीवन  की सकारात्मकता  को छोड़ कर  तो हम भयभीत  ही रहेंगे  अच्छाई जब नहीं मिल पाती है  तो आशाये बिखर बिखर जाती है  सद  विचारों के बीच पाकर यह आत्मा   अपनी वास्तविकता समझ  जाती है  अंधियारे  के  भीतर  हलकी सी रोशनी  जहा  जहा  भी नजर आती है   अनुभूतिया  अवतरित  हो  परम  सत्ता  की नजदीकिया  पाती  है  पी  ले हलाहल  का   प्याला  तो व्यक्तित्व शिव  शंभू  कहलाये  भूंखे  नंगे को दे  निवाला  तो  विश्वनाथ   बन  कर आये  सज्जनों  का पाकर  साथ तन   चंगा  और यह  मन  गंगा  में नह

हे भगवन लौटा दे, वापस मुस्कान

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भींगी हुई  दोपहर ,भींगी  हुई शाम  भींगा  हुआ हर पल ,बह गये  धाम  तीर्थो में  भर  गये  है , सारे  ही  कुंड  क्षत -विक्षत  लाशें  है, बिखरे नर  मुंड  बहुतेरे  मिल  गये है, ढेरो  गुमनाम  बदला है बारिश  ने ,कितना  भूगोल  पैरो  में छाले है, बम  हर हर तू बोल  हे भगवन  लौटा  दे, वापस  मुस्कान 

बद्री और केदार

प्रकृति में शक्ति है शक्ति में समाहित शिव है  शक्ति के बिना शरीर ही नहीं शिव भी निर्जीव है  शिव  की पूजा में आस्था है अभिषेक है आचमन   है शक्ति पूजा में भक्ति है प्रार्थना है शुध्द चित्त और मन है  रहे प्रकृति सुरक्षित और रहे निर्मल पर्यावरण है  शिव पूजा में हमारी होती आस्थाए कम है  मनो मस्तिष्क में पले  कई भ्रम है  शिव शक्ति की संयुक्त पूजा में प्रकृति का  संरक्षण है  पुरुषार्थ है बल है और परिश्रम है  फिर क्यों हुई विनाश लीला दिलो में गम और आँखे नम है  येन केन प्रकारेण  हमने प्रकृति को सताया है  प्रकृति को सता कर शिव शम्भू और केदार को किसने पाया है  इसलिए शिव और शक्ति की पूजा के नवीन मानदंड अपनाओ  प्राकृतिक संसाधनों को बचाओ  शिव और शक्ति को तन मन में बसाओ  प्रकृति में समाहित बद्री और केदार है  ईश्वर  उञ्चाइयो में ही नहीं गहराईयों में भी है  नैया की पतवार है  परम सत्ता के बल पर टिका हुआ यह संसार है 

मिथ्या ही विज्ञापन ,नहीं दीखता उल्लास

 रहती है जीवन में ,मरुथल की प्यास  इच्छित न मिल पाता ,नित दिन उपवास  उड़  गई निंदिया भी, अलसाए नैन  तकते है तारो को, मिलता न चैन  मिल जायेगी चितवन ,मन का विश्वास  बारिश की बूंदों से ,होती रिम झिम  रह गई दिल में ही ,चाहे अनगिन  चाहत की राहो पर, मिलता उपहास  गाँवों में अंधियारा ,दीपक टिम -टिम  जर्जर छत स्कूल की ,मिलती  तालीम  मिथ्या ही विज्ञापन ,नहीं दीखता उल्लास 

सुबह जग -मगाई है

नीले नीले आसमा पर, लालिमा छाई है  सूरज की मेहनत ने, अरुणिमा पाई है  पौरुष से किस्मत है, बजती शहनाई है  संध्या ने सूरज की, तृष्णा  बुझाई  है  अस्त हुये दिनकर ने ,शीतलता पाई है  निशा के आँचल में ,निंदिया गहराई है  खग -दल भी गुम सुम है, पवन सुखदायी है  उग आई उषा  है ,सुबह जग -मगाई है  प्रियतम की आँखों में, दिखती सच्चाई है  प्यारा सा जीवन जल, मृदुलता पाई है  भावनाये बहकी है ,मेहंदी रंग लाई  है  प्रीती से जीवन है ,हुई ईर्ष्या पराई है  भर आई आँखे है, गम की गहराई है  गागर में सागर है ,सरिता तट आई है  भावो के आँगन में ,पाया  है  अपनापन  सपनो में अपनों की ,झलकिया पाई है 

झलकी व्यथाए

थम जाती है आँधियाँ  और तूफानी काली घटाए  सोच लेता निश्छल मन तो, सुगम बन जाती है राहे  कंटको  से क्या डरे हम ? हो गया विदीर्ण ये मन  ठोकरे लगती  गई है ,टूट गई  संवेदनाये  वेदना किसको बताये ,विरह की लम्बी कथाये  काल और कंकाल पर ,नृत्य करती कामनाये  प्रीती ने विश्वास  तोड़ा ,नियति ने उदास छोड़ा  सत्य की कश्ती डूबी तो, सृजन में झलकी व्यथाए 

कैक्टस और बबूल

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कैक्टस की तरह रूखे कांटो से भरे  बिना उगाये ही उग आये व्यवहारिक धरातल पर विद्वेष के वृक्ष  क्योकि मै  नहीं कर पाया  शूल को फूल कहने की भूल  मुझमे उस साहस का है अभाव जो कहला देता है  अँधेरे को उजाला और सफ़ेद को काला  मिटा देता है सत्य और असत्य के बीच का अंतर  तब भ्रमित पथिक वैभव के अन्धकार में लिपट कर  दिशाहीन ध्येय विहीन जीवन पथ की और हो जाता है अग्रसर  मै  नहीं बनना चाहता दिशाहीन ध्येय विहीन भ्रमित पथिक  इसलिए मुझे साँसे लेना ही होगी  उस जहरीले वातावरण में जहाँ  उगते है  कैक्टस और बबूल  

थोड़ी सी पीर

मौसम की गर्मी से ,मिली नहीं ऊष्मा है  पसीने से लथ पथ है, टूटा हुआ चश्मा है  हाथो में हंसिया है, महँगी हुई खुशिया है  मिली नहीं हल धर को ,सपनों की सुषमा है  तन मन में पीड़ा है ,नयनो में नीर  फसलो के पकने पर जगती तकदीर बो देना खेतो में ,थोड़ी सी पीर  जल होगा मरुथल में, होगा तू वीर   भींगी हुई आँखों  में , बहुत दर्द बाकी है  प्यासी हुई नजरे है, नहीं कही साकी है  सूरज की गर्मी है ,कर्मी ही धर्मी है  किस्मत ने पौरुष की, कीमत कहा आंकी है    

दोषी मंगल कहलाता है

एक घना अन्धेरा जीवन में, चादर सा लिपटा जाता है  दुर्भाग्य अँधेरी गहरी सी, खाई सा दिखता जाता है  मिली भाग्य नहीं सुरभित, कलियाँ भवरा फिर भी कुछ गाता है  रहा काल चक्र का घोड़ा, पथ पर तेजी से दौड़ा जाता है  दुर्बल के दर पर धुल रहे, धीरज का फल मिल पाता है  चौड़ी हो चिकनी सड़के हो ,वह राजपथ कहलाता है  जहा पग डंडिया गुजर रही, गाँवों तक रस्ता जाता है  घटनाएं जब जब होती है, निर्धन सुत कुचला जाता है  घर घर में होते दंगल है, दोषी मंगल कहलाता है  यहाँ अपमानो का गरल तरल, जीवन की खुशिया खाता है  किस्तों में मिलती मौत रही ,नित मानव मरता जाता है  पूरब से उदित हुआ सूरज ,पश्चिम में ढलता जाता है  गैया मैया तो कैद रहे ,अब विषधर विचरा जाता है  अब वृन्दावन की गलियों में, कान्हा भी छलता जाता है 

संशय ने हारी हर बाजी ,सुख सपनो का नवनीत रहा

यह कंठ वेदना लिख रहा, जीवन बाधा से सीख रहा  ह्रदय का अंतर चींख रहा ,क्रोधित मन मुठ्ठी भींच रहा  होली रंगों से खेल रही ,ईर्ष्या नफ़रत की बेल रही  माता ममता उड़ेल रही ,सखीया अंखिया से खेल रही  आँचल ने पोंछे  है आंसू  ,अनुभव आयु से जीत रहा  चंचल लहरों में है हल चल  लहराती है बल खाती है  वह नृत्य करे करती नखरे, तट से आकर टकराती है  तट पे आकर मन से गाकर करुणा  का लिखता गीत रहा  महुए पे  मादक फुल रहे ,ढोलक मांदल से सूर बहे  साँसों में बसती हो सजनी  रंगों में सब मशगुल रहे  घूमता फिरता पूनम चन्दा  मन के आँगन में  दिख रहा  सुविधा दुविधा की मूल रही तृष्णा आशाये झूल रही  नित रंग बदलते है रिश्ते शंकाये थी निर्मूल रही  संशय ने हारी हर बाजी ,सुख सपनो का नवनीत रहा    

जल

जल की सरलता और तरलता प्रवाह देती है  तृष्णा को तृप्ति देती है  इसलिए जल की तरह सरल और तरल बनो  जल समतल पर नहीं बहता जल समतल नहीं रहता  असमतल धरातल पर जल सदा है बहता  इसलिए जल की तरह विषमताओ में बहो  विषमताओ के  विद्रूप को सहो 

रंगों की पिचकारी

ओझल हुई राहे तो संकरी होती है  गलिया  संकीर्णता छा  गई   मुरझाई हुई  कलियाँ  आस्थाए   आहत हुई पतझड़ भी आ गई  मौसम ने ली करवट ,होली मन भा गई  रंगों की पिचकारी फिसला है यह छलिया  भीलो की टोली है, हाटों  में होली है  महुए की मादकता ,रंगों ने घोली है  महका है गोरा तन ,बहकी हुई पायलिया 

दे दे कोई अपनापन दे दे कोई संबल

आँखों के आंसू है ,भावो का पावन  जल   झरता हुआ झरना बहता है कल -कल  आदमी का आचरण कहा हुआ निश्छल  राहे हुई   पथरीली नहीं हुई  समतल  थके हुए सपनो के हाथो में थमा हल  गुजरती रही जिंदगी गुजरतारहा  पल -पल  जीवन में  अंधे मौड़ है हालात के दल -दल   आचमन करे मन  संकल्प हुए निर्बल  हुई सुबह   कातिलाना  नहीं कही हल- चल  दे दे कोई अपनापन दे दे कोई संबल 

प्रलय का परिचय

सिमटी हुई दूरिया   देश से देश की  वेश की परिवेश  नगर  से नगर की  डगर से डगर  सफ़र से  ठांव की  गाँव से गाँव की  पेड़ से छाँव की  सिमटी ही जा रही   संबंधो के दायरे  संकीर्ण होते जा रहे  यह देख अनजाना भय  कचोटता है ह्रदय  सोचता रिश्तो की यह सिकुडन  कही शून्य में न समा जाए   तब शून्य में प्रविष्ट समष्टि को  विलुप्त होती सृष्टि को  कहा होती सृष्टि को  कहा जाएगा यही है यही है  प्रलय का परिचय     

उजाले की प्यास

विकलांगता सपनो को तोड़ नहीं सकती मानसिकता गुलामी की दौड़ नहीं सकती हर एक अँधेरे को रही दिए की तलाश है उजाले की प्यास कभी मुंह मोड़ नहीं सकती

मात नर्मदे चपल तरंगे

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पुण्य सलिला रेवा माता , तेरे सदगुण मानव गाता जप तप तेरे तट पर होते , जप तप से है मन हरषाता   मात नर्मदे चपल तरंगे , दर्शन पाकर हो गये चंगे हर हर गंगे हर हर गंगे , शिव की संगे शिव की अंगे लहराकर इतराता आता कल - कल छल - छल बहता जाता   तव कीर्ति ही गाती बाणी , तू उर्जा है तू महारानी ,   मै बालक तू मात भवानी तेरे तट बसते मुनि ध्यानी जीवन मे जब तम गहराता तेरे तट पर मै आ  जाता   तट पनघट है तेरे गहरे , सागर तट पर तू जा ठहरे विजय पताका तेरी  फहरे  गिरती उठती पावन लहरे तृप्त धरा को कर हरियाता तेरा जल तृष्णा हर पाता /

दो कन्या को प्यार

कन्या कोई अभिशाप नहीं , कन्या है वरदान कन्या से धन धान्य मिले , कर कन्या गुण - गान कन्या से ही काव्य सजा , सजा सुखी संसार कन्या से ही धन्य हुआ , धवल हुआ घर - द्वार कन्या ने ही प्यार दिया , दी पायल झंकार कन्या से मुग्ध हुआ , कलाकार फ़नकार कन्या भ्रूण चीत्कार रहा , मत ले उसके प्राण कन्या पुत्री रत्न बने , करे नवीन निर्माण काव्य रचा तो शब्द बचा , बचा स्वपन संसार कन्या ने ही विश्व रचा , दो कन्या को प्यार

वे भीतर से रीते है

आकाश सा आँचल हो सागर सा जल हो ममता हो , विश्वास हो , स्नेहिल पल हो निष्ठाए हो फौलादी आत्मा में बल हो मानवीय आचरण सरल हो निश्छल हो अपमानो का हलाहल पीकर जो जीते है लिए दर्द जिगर में जख्मो को सीते है कभी होते गिरधर कभी शिव के रूप जो सुखो में रहते है वे भीतर से रीते है

शान्ति और अशान्ति

--> शान्ति आत्मा का स्वभाव है अशान्ति मे घ्रणा है अभाव है शान्ति मे ऊर्जा है जोश है अशान्ति मे आक्रोश है असन्तोष है विश्व की महाशक्तिया पूर्णत शान्त है दुर्बलताये होती अशान्त और आक्रांत है शान्ति और मौन से शमन होते विकार है शान्ति व्यक्ति पूर्ण रुपेण होता निर्विकार है शान्ति मे अलौकिक परम सत्ता का वास है अशान्ति मे है व्याकुलता का आभास है सत्य और अहिंसा मे रही शान्ति है झूठ और पाखंड मे समाहित भ्रान्ति है चहु और छाया अशान्ति का साम्राज्य है शान्ति मे सुशासन है रामराज्य है शान्त व्यक्तित्व मे समाहित क्रष्ण बुद्ध और शिव है शान्ति मे होता विकास शान्ति ही शक्ति की नींव है इसलिये परिस्थितिया कितनी भी हो प्रतिकूल शांत रहो अशांति के आक्रमण से विचलित न रहो क्योकि शान्ति से निकल पाये सभी समाधान है अशान्ति मे है मानसिक विचलन अस्थिरता व्यवधान है शांत रह कर विकट स्थितियो को सम्हालो मन से अशांति आशंकाए हो तो मन से निकालो शांत रह कर सहज ही परमात्मा परम शक्ति को पा लो

याद मे देखू छवि

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--> सोंचता हूँ प्यार का इजहार कैसे मै करु                    दर्द से चींखू यहा पर या फिर जमाने से डरु                    दर्द मे लिपटी हुई , दिलवर तुम्हारी याद है                      रूप की हल्की झलक है थोड़ा सा संवाद है                        याद मे देखू छवि और दैख कर आहे भरु                       दूरिया मजबूरिया है   राह पे न फूल है                        चाहते रहती अधूरी बिखरी हुई चहु धूल है                        पंथ पर मै पग धरु और चाह पर मिट कर मरू

सबक दिल का तू सीखेगा

तू अपनी बन्द कर आँखे तेरा दिलदार दिखेगा तेरी गुमनाम हस्ति है , हीरा के मोल बिकेगा चला - चल नेक राहो पर तुझे मन्जिल बुलाती है तेरे सोये मुकद्दर मे वो बिजली जग - मगाती है तेरे सपने तेरी दुनिया , नया इतिहास लिखेगा हुआ है सर्द जब मौसम , उठा है दर्द , आँखे नम समुन्दर सा भरा है गम , बसी है गीत मे सरगम तमन्ना है मिले दिलवर , सबक दिल का तू सीखेगा

संतो का मैला है

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विश्वास और आस्था का होता दर्पण है आस्था के मन्दिर है आस्था के तर्पण है त्रिवेणी तट पर कुम्भ पर्व मैला है मैले मे हल चल है भक्ति समर्पण है गंगा के तट पर संतो का मैला है त्रिवेणी संगम है गुरुवर है चैला है भक्ति मे शक्ति है भक्तो का रैला है कुदरत ने सर्दी क्या खेल खैला है