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गिरधर और गोपाल

रिश्ते उतने साथ रहे जितने थे सम्बन्ध मन से मन को बांध रहे स्नेहिल से अनुबंध क्या होता है पुण्य यहाँ क्या होता है पाप पापी था जो डूब गया मर गया अपने आप गिर कर उठता चला गया रहा सदा सक्रिय उसका ही है भाग्य जगा रहा सभी का प्रिय चिड़िया भी है चहक रही चहकी हर चौपाल बरगद पीपल छाँव पले गिरधर और गोपाल बिखरी जाती रेत रही सूने सूने तट उखड़े कितने वृक्ष यहां सजते है मरघट

श्रम का अमृत

पौरुष से है भाग्य जगा नियति भी है बाध्य  मंजिल कोई दूर नही सब कुछ है श्रम साध्य जीवन कड़वा नीम नही मीठा है इक फल मीठी मीठी बात करो मिल जायेंगे हल श्रम से सारे काज हुए होता क्यो ?नाराज  श्रम से सब कुछ पायेगा मत करना तू लाज श्रम का ही तो मूल्य रहा ,बिन श्रम सब बेकार आलस कर जो भाग रहा, कर्मो से मक्कार उसका कोई मोल नही जो करता खट पट झट पट जिसने काम किया होता वो कर्मठ श्रम साधे है काज सभी जीवन का है मूल श्रम का अमृत बाँट लिया देवो ने मिल जुल

माँ

माँ कंचन सी रूप रही ,माता उजली धूप माँ आंसू को पोंछ रही, दुख सहती चुप चुप माता सुख की छांव रही ,हर लेती सब दुख माँ करती उपवास रही ,ली बेटे की भूख माँ तो हरदम साथ रहे ,माँ देती सम्बल  माँ नदिया बन नीर बहे ,माँ यमुना चम्बल माता होती रात रही ,होती गहरी नींद दूब को देती ओंस नई ,जल को दे अरविंद   माँ बेटे को प्यार करे ,होकर के वत्सल  गौमाता भी चाट रही, बछड़े को पल पल  माँ पत्ते और पेड़ रही ,माँ होती फल फूल  माँ टहनी पर नीड़ रही ,चिड़ियों का स्कूल  माँ का सपना टूट गया ,उठ गया विश्वास  जब बेटे के हाथ पीटी ,झेली है भूख प्यास

राम उसी के होय

राम राम तो सब कहे राम रहे न कोय जो बन कर के राम रहे राम उसी के होय राम नाम सत शब्द रहा राम रहे सत्कर्म  राम रहे निज आचरण राम रहे है धर्म बसे राम हनुमान हृदय राम बसे हर जीव  निकट राम लक्ष्मण रहे राम सखा सुग्रीव राम सत्य संकल्प रहे राम रहे हर आस रामायण जी यह कहे राम रहे विश्वास जहा राम वहां स्नेह रहा प्यारा सा है गेह बारिश से है भींग रही राम कृपा से देह राम प्रखर पुरुषार्थ रहे राम रहे आराध्य  साधक जीवन सुखी रहा पाया जो भी साध्य  जिनके भीतर अहम नही उनके भीतर राम  सहज सरल और तरल नयन मर्यादा के धाम