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श्रंध्दांजली जताई है

(1) उन्होंने आज  सैनिकों की शहादत पर  अश्रुपूरित हो श्रध्दांजलि जताई है  और श्रद्धांजलि के नाम पर  दो मिनट मौन रह कर  चीन से आयातित मोमबत्तीया जलाई है (2) अब नही रह पाएगा  बाज़ार में कोई चीनी समान है  कही सस्ता सा मिल जाये मोबाईल  बस यही अरमान है (3) स्वदेशी की बात करते हुए  गला रुंधा है  मानो सीमाओं ने पुकारा है पर क्या करे?  इस  दौर में  सस्ता चीनी माल ही तो  आजीविका का  सहारा है

भरी गर्मियों में पारा उसका चढ़ा है

सवेरा सूरज की किरण से लड़ा है  तमस का शकुनि उधर चुप खड़ा है  जिसे हर तरफ से है षड्यंत्र घेरे  रही मुंडमाला है वही मन्त्र फेरे  चला कर्म के पथ क्षत विक्षत पड़ा है हुई पस्त काया  छाया की जय है  रहा  छद्म शत्रु रहा दुराशय है चला ऐसा युध्द जो निरंतर बढ़ा है  कभी मस्त मौसम कभी उठते शोले  रही जब नमी तो बहते है रेले भरी गर्मियों में पारा उसका चढ़ा है

ठिठकी हुई दुनिया

स्वीच मिले मोबाईल साइलेंट हुए फ़ोन है अदृश्य हुआ शत्रु पक्ष मृत्यु हुई मौन है  बीमार है लाचार हैं संहार का संसार है कहर है कुदरत का ये कौनसा त्रिकोण है मौत भी चली आई  कोरोना के मारे है बहती हुई सदिया ,नदिया के किनारे है कौनसा है संकट जो आज हमने पाया है ठिठकी हुई दुनिया है खुद के सहारे है संकट हुआ विकट काला सा साया है  विजय का महामंत्र हम सबने गाया है  सबका ही सपना है झुकना न रुकना है बदलेंगे अब हम सब ,जीना अब आया है

मानवता की लाश

धन उसके ही पास रहा , जिसका उन्नत मन  मन तो इक विश्वास रहा , मन तो है  दर्पण रिश्तों से वह शून्य रहा , कटुता जिसके पास मानव का मन टूट रहा , टूट रहा विश्वास मानवता है ढूँढ रही ,कहा है अपनापन शब्दो से है बात बनी, शब्दो से अन बन धरती करुणा भूल रही , विचलित है आकाश दिखती चारो और रही , मानवता की लाश

जीवन पूर्ण विराम

जीवन देकर चली गई किसकी थी यह चूक हथिनी बच्चे से से कहे कितनी महंगी भूख मौसम की कोई बात नही बिन मौसम का खेल कुदरत बदला मांग रही है झेल सके तो झेल जो होता अभ्यस्त नही जीवन पूर्ण विराम भीतर भीतर ध्यान लगा मन को दे विश्राम पशुवत जीवन बीत रहा पशुवत विचरे मन  मानवता तो बोध रही कहा है मानव मन पशु के जीवन घात रही जीवन मृत्यु खेल कुदरत ने है खेल रचा , कस दी नाक नकेल