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गलतिया

जीवन में गलतिया हर व्यक्ति से होती है परन्तु गलतियों की पुनरावृत्ति बुरी आदतों का कारण होती है बुरी  आदते व्यक्ति को अपराधी बना देती है जब लोग गलतियों को बर्दाश्त करते है  तो व्यक्ति स्वयं को सही मानने का भ्रम पाल लेता है अपराध की तह तक जाने के लिए अपराधी की मानसिकता तक जाना होता है अपराधी के मनो मष्तिष्क के भीतर विचरने वाले विचारों  षड्यंत्रों को पाना होता है इसलिए गलतियों को मत दोहराओ गलतिया करने वालो को  जहा  भी अवसर मिले गलत जरुर ठहराओ यह सच है इंसान गलतियों का पुतला है पर गलतिया करते हुए यहाँ कोई इंसान नहीं निखरा है गलत स्पष्टि करणों  से झूठा हुआ आदमी  व्यक्तित्त्व बिखरा है

विमल मति

ज्योति रूप परमात्मा, द्वादश ज्योतिर्लिंग आलोकित अंतर करे ,शिव मंदिर शिव लिंग परम पिता परमात्मा ,माता पार्वती महादेव दो वर हमें ,हो निर्मल मन विमल मति

चिंतामन है शिव

परम धरम अनुराग है ,करम धरम की नींव  तू क्यों चिन्तारत हुआ ,चिंतामन है शिव  सावन होता हरा भरा ,हरियाता हर खेत  नदिया लाई अपने साथ, कितनी सारी रेत  भाग्य रथी  भागीरथी ,भव के हरते पीर  जीवन सुखमय कर देता ,मन का निर्मल नीर राज गए राजा गए ,चले गए सम्राट  जर्जर  काया होत रही, पकड़ी सबने खाट  बारिश झर -झर  बरस  रही, सरिता हुई निहाल तट सेतु अब टूट गये ,मैदानों में ताल  

कौन नहीं चाहता

संसार  में कौन नहीं चाहता की उसके शत्रु नहीं हो ? यह धरा सभी और मित्रो और हितैषियो सी घिरी हुई हो कौन नहीं चाहता की वह सभी प्रकार की आशंकाओं और भय से मुक्त हो ? सभी प्रकार से सुरक्षित हो जीवन आनंद और उल्लास से युक्त हो कौन चाहता वह योध्द्दा अपराजेय हो ? वैभव और ऐश्वर्य से हो युक्त होती रहे चहु और उसकी जय जय हो संसार में कौन नहीं चाहता वह गुणवान और विद्वान हो ? महकती रहे यामिनी बिखरी  तारो सी  मुस्कान हो कौन चाहता वह सूर्य सा तेजस्वी हो ? व्यक्तित्व में हो शीतलता व्यक्तित्व ओजस्वी हो पर इतना सब कुछ  चाहने से क्या होता है पल्लवित परिवेश में वही  होता है   जैसा हमारे कर्म का बीज होता है