कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 28 मार्च 2025

कहा गए है पद्य

छंदों से है हुआ विसर्जन
कविता सुंदरतम
सृजन से हर प्यास बुझी है 
पद्य है सर्वोत्तम

कविता अब उन्मुक्त हुई 
कवित हुआ गद्य
जोरो से खूब शोर हुआ 
कहा गए है पद्य

हर पल अब लालित्य कहेगा
पढ़ लो गद्य निबंध
जीवन में न क्षोभ रहेगा 
फैली ऐसी सुगंध

छंदों का न अंत मिला है
मिली न अब तक थाह
कविता देती कर्म प्रखर
जीवन का उत्साह

जहा भाव का भेद रहा
वहा नहीं कल्याण 
होता है अब बहुत कठिन 
छंदों का निर्माण

जिस पर सारा कोष लुटा है 
प्रज्ञा का वरदान
उसने ललित गद्य लिखे है
गद्य है पद्य समान 

कविता होती शुद्ध कुलीन 
कविता भाव प्रधान 
कविता दोहा गीत रही 
नवगीत का अवदान


कविता निकली शुद्ध हृदय 
हृदय का कमल
कविता केवल भाव नहीं 
कवि का है कौशल







रविवार, 19 जनवरी 2025

ब्रह्मा विष्णु महेश

जिसका कुछ मंतव्य रहा
उसका है गंतव्य
वो पाए अधिकार यहां 
जिसके कुछ कर्तव्य

प्राणों पर है बोझ रहा
जो कुछ कर तत्काल
जिसका होता कोई नहीं
उसके तो महाकाल

जीवन जिसका शेष नहीं 
उसका यह परिवेश
उसका होता प्रिय सखा
ब्रह्मा विष्णु महेश

गंगा यमुना यही बही
रहता यही प्रयाग
तीर्थों से उसे पुण्य मिला
हृदय जो निष्पाप 


रविवार, 29 दिसंबर 2024

कुल्हड़ की चाय


कुल्हड़ की 
वह चाय नहीं है
मैथी का न साग
चूल्हे में 
वह आग नहीं 
कंडे की न राख
माटी की सुगन्ध 
है बिछड़ी 
कहा गई वह
प्यारी खिचड़ी 
जितने भी थे 
रिश्ते बिखरे
लगे स्वार्थ के दाग

मुख्य हुए अपवाद



परिभाषाएं गौण हुई 
मुख्य हुए अपवाद
जीवन में अब रहा नहीं है
जिव्हा का वह स्वाद

किंतु यंतु हुए प्रभावी
जंतु का उन्माद
ऐसे बिगड़े चाल चलन है 
पल पल रहे विवाद

जीवन में अब कौन कहेगा
 कर लो तुम संवाद 
कही पे खोया अपनापन है 
नहीं मिली कही दाद

आंख भिगोई ममता रोई
  समझे न जज्बात 
बेटी तो अच्छी है निकली
  बेटे दे आघात




शनिवार, 12 अक्टूबर 2024

स्वारथ की घुड़दौड़

चू -चु करके  चहक  रहे  
बगिया  आँगन  नीड़ 
जब पूरब  से  भोर  हुई 
चिडियों  की  है  भीड़ 

सुन्दरतम है  सुबह  रही 
महकी  महकी  शाम 
सुबह  के  उजियारे  को  
चिड़िया  करे  सलाम 


जब भी  दूर  तक  बात  गई 
हो  गई  पूरी  रात 
घटनाओं का  दौर  चला 
हो  गये  दो  दो  हाथ 

जीवन मे  हर  बार  मिले 
जितने  भी  थे मोड़ 
अब  रिश्तों  की  खैर नहीं 
स्वारथ  की  घुड़दौड़ 

जीवन होता  एक  नदी 
नदी किनारे  गांव 
पगडण्डियाँ  छूट  रही  
कहा गई  है  छांव 

मझधार में फंस गई नैया   
तूफानों के बीच 
तट पर सारे  मिल  गये 
जितने भी थे  नीच 



शुक्रवार, 12 मार्च 2021

जीवन का सौरभ

आज यामिनी निखर रही 
अमृत बरसे नभ
शरद पूर्णिमा में पाया है 
जीवन का सौरभ

ठंडी ठंडी पवन बही 
 ठंडे दिन और रात
खुशबू महके पंछी चहके 
सुरभित पारिजात

बांसुरी की मीठी लहरी, 
कान्हा करे पुकार
हिय में अंतर्नाद रहा 
बजते रहे सितार


मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

बोझिल है आकाश


ऊँचे पर्वत मौन खड़े, जग में सीना तान 
इनसे नदिया नीर बहे, उदगम के स्थान

गहरी झील सी आँख भरी, बोझिल है आकाश
पर्वत टूट कर रोज गिरे, जंगल की है लाश

जितने ऊंचे आप रहे,उतने बड़े सवाल
थोड़ी सी है भूल रही, कितना रहा बवाल

बदली उनकी सोच रही , बदली उनकी चाल
ऊँचाई पर पंख लगे , हो गये वे वाचाल

जितना उनमे जोश रहा, उतने भूले होश
उतना ही आतंक करे, ऐसा जोश खरोश

दिखती दूर से एक नदी, दिखता है पाताल
मण्डवगढ़ की रूपमती , हरियाता एक ताल

महामारी में कौन लड़ा,कर लो तुम पड़ताल
सड़को पर है जाम लगा, वो करते हड़ताल

रविवार, 15 मार्च 2020

कोरोना वायरस

विश्व कोरोना वायरस के कारण
 शाकाहार की और बढ़ रहा है 
नमस्ते और नमस्कार के माध्यम से 
योगासन कर रहा है 
रोगों के संक्रमण का खतरा 
जब देश पर बढ़ने लगा है 
स्वच्छता आदोंलन का  रंग
 अब और भी अधिक चढ़ने लगा है 
अनियंत्रित जीवन शैली और 
अनुचित आहार विहार का ही तो यह परिणाम है 
एड्स स्वाईन फ्लू कोरोना तो हुए
 मुफ्त में बदनाम है 
यम नियम संयम और स्वदेशी उद्यम से 
नही फैलेगा कोई संक्रमण है 
अधिक मात्रा में आयातित  वस्तुओ से होता
 अर्थ व्यवस्था पर अतिक्रमण है 
अच्छा स्वास्थ्य पाने का 
बस एक यही तरीका है 
सीख लो अच्छे खान पान के गुर
 जीने का बस सही एक सलीका है 
अब छोड़ो कोरोना का रोना 
सब कुछ स्वच्छता से ही तो होना है
सम्यक आहार विहार से 
अपने आचरण को भिगोना है 
पवित्रता और दैवीय गुणो के बल पर 
करो आराधना  महकेगा जीवन का हर कोना है

शनिवार, 9 मार्च 2019

यहाँ जाग रहा है अणु अणु

यह कंकड़ पत्थर है शंकर 
  हर कण में रहते है विष्णु
  है संतुलन उनके भीतर
  कृष्णा की प्रियतम है वेणु 

  यह प्रीत रीत ही ऐसी है
  भावो से भगवन आये है
  मीरा की भक्ति प्रीत रही  
राधा ने  सचमुच पाये है
  भक्ति की जलती ज्योत रही  
यहाँ जाग रहा है अणु अणु

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

हलछठ

आत्मीय संसर्ग हुआ अंतर मन की प्रीत
जीवन मे आ जाओ न बन जाओ संगीत

आँचल तो आकाश हुआ जब आई हल छठ
सूरज से इस रोज मिले खिल गए है पनघट

इतना प्यारा सच्चा है सूरज तेरा प्यार
किरणों से तो रोज मिला जीवन को उपचार

निर्मल जल सी सांझ रहे बांझ रहे न कोय
दिनकर संग जो जाग रहा भाग्य उसी का होय 

पटना की है परम्परा नदियों के है तट
डूबते को भी प्यार मिला सूरज की हल छठ

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

भैय्या दूज

बहना का भाई रहा भैय्या की है दूज
 संघर्षो से जीत मिली बहना की सूझ बूझ

जीवन में कई बार मिले सुख दुख के संजोग
बहना से मिलता रहा भैया को सहयोग

उसका निश्छल प्रेम रहा  निर्मल है अनुराग
बहना जग की रीत रही होती घर का भाग  

मिट जाते सब दुख यहाँ कट जाते सब रो
बहना के आ जाने से समृध्दि के योग

रविवार, 24 जून 2018

सामने दिखती ढलान

हौसलो से घोसले है 

पंख भरते है उड़ान

जिंदगी बिकने को आई 

बनने लगे है जब मकान

रोटियों के वास्ते ही

 है बिछुड़ता हर शहर

पंथ के लंबे सफर पर 

लगने लगी है अब थकान

 

घाटियों पर है चढ़ाई 

लाद कर ढोते समान

चोटियों जिसने भी पाई 

दिल की दुनिया है वीरान

अब रही न महफिले है 

अब कही न फूल खिले है

गीत और संगीत रोता 

काव्य भी लेता विराम

 

हर तरफ तकरार आई 

जख्म के होते निशान

धूर्तता ने घेर ली है 

सादगी की अब दुकान

स्वार्थ से वह घेरता है 

अब नजर वह फेरता है

छल कपट का है अंधेरा 

सामने दिखती ढलान

 

 

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

दिलवर की मुस्कान

घर हो मंदिर प्यार रहे प्यारा सा परिवार
प्यार सदा अनमोल रहा भावो का उपहार
एक प्यारा सा भाव रहा प्यार सा एक बोध
मन के आँगन प्यार रहा प्यार भरा अनुरोध
मन व्याकुल है तृप्त नहीं मुझको तू पहचान
मन के मांगे नहीं मिली प्रियतम की मुस्कान
तन मन पागल प्यार रहा नहीं मिला है चैन
आँखे नभ् को ताक रही बीत गई कई रैन
मीठी कोमल प्यारी सी होती लब की शान
मोहे मुझको न्यारी सी दिलवर की मुस्कान
मधुरिम होता होठो पर शब्दों का श्रृंगार
अब न छेड़ो कड़वे बोल धधके मन अंगार
प्यारा सा संसार रहे मीठे हो हर बोल
तू अपने हर सपने को वचनो से ही तोल


मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

धन तेरस पर तुम भी सुन लो

निर्धन को न धन मिलता है 

धन के बिन कैसा त्यौहार

धन के बिन है मस्त फकीरा

 धन हेतु रौता बाजार

 

धन तेरस पर क्या क्या लाये 

 धन सच्चा होता व्यवहार

मन निर्धन तो कैसा धन है

 तन मन वारो बारम्बार

 

ऐसा वैसा कैसा कैसा

 कदम कदम पर पैसा

पैसो से है जुड़ता रिश्ता 

पैसो पर है दारोम दार

 

धन से न मिल पाया तन है

 धन देता केवल श्रृंगार

धन के पीछे सब है भागे

 धन से होती है तकरार 

 

धन पे तेरी नियत ठहरी 

मन से मन की है दीवार

तू खूब खैले धन से मैले 

धन न मिलता है हकदार

 

सपने तुम कितने भी बुन लो

 धन तेरस पर तुम भी सुन लो

खाया पिया नहीं पचाया 

धन से भोजन स्वल्पाहार

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

कब मिलेगी छाँव है

भंवर फूलो पर रहे है झील रहती नाव है
ताप देती गर्मिया है तप रहे सिर पाँव है
हो कहा पर प्रिय मेरे बोलती है आज टहनी
खो गई जग से शीतलता खोई खोई छाँव है 

जल में होती है शीतलता जल निर्मल भाव है
तृप्ति को वन वन भटके सूखते कूप गाँव है
हो कहा पर वत्स मेरे बोलती है आज मिटटी
कट गए है वृक्ष सारे और बिकती छाँव है 

हो गए अपकृत्य सारे लुप्त जल की आंव हैै
पक्षीगण बून्द बून्द तरसे रोज मिलते घाव है
गई कहा चंचल चिड़िया चहचहाती क्यों नही
गगन सेे अब आग बरसे कब मिलेगी छाँव है

रविवार, 31 जनवरी 2016

मानव सेवा का वन्दन है


सेवा का जिसमे भाव भरा 

करूणा का पाया चन्दन है
करुणा से पाई मानवता 
 मानव सेवा का वन्दन  है

तन दुर्बल होकर मरा मरा
 मन मूर्छित होकर डरा डरा
बचपन ने खोई कोमलता 
 फूटे सपनों के क्रंदन है

लिए  घाव गरीबी  हाथो मे
 बूढी माँ रहती लातो मे
झुग्गी रोती है रातो मे 
सपनों मे रहता नंदन  है 

सुख रहा सदा ही भावो में 
वह तृप्त रहा अभावो में
दुःख महलो में भी पलते है  
होते सुविधा में बंधन है



रविवार, 11 मई 2014

समझो वह प्यारी माता है

करुणा दीपक है द्वार धरा 
ज़ीवन मे जिसके प्यार भरा 
हम जिसे देख कर हर्षाये 
इस जग का सारा सुख पाये 
प्यारा से जिससे नाता है
 समझो वह प्यारी माता है 

तन मन का जिससे बन्धन है 
चरणोँ की  रज मे चन्दन है 
बेटे का मन जो पढ़ पाई 
वह कठिन वक्त से लड़ आई 
दिल  दर्द उसी  का पाता है 
समझो वह प्यारी माता है 

खुशिया आँखों मे छलकाए 
दुख देखे आँसु बरसाए 
मन जिसके प्यार मे पागल है 
जीवन मे पाया सम्बल है 
गीत उसके ही गुण गाता है 
समझो वह प्यारी माता है 

हम  हँस कर खेले बड़े हुये
मिटटी मे लथ-पथ खड़े हुये
आँचल से ममता बरसाए
होकर वत्सल माँ बहलाये
नटखट बचपन इतराता है
समझो वह प्यारी माता है 


सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

सखिया करती हास ठिठौली

जिव्हा  खोली कविता बोली 
कानो  में मिश्री  है घोली
जीवन का सूनापन हरती 
भाव  भरी शब्दो की  टोली

प्यार  भरी  भाषाए बोले
जो भी मन में सब कुछ खोले
लगता है इसमें अपनापन 
तट पनघट मुखरित यह हो ले
मादकता छाई है इसमें  
दिवानो कि यह हमजोली

कविता से प्यारा से बंधन 
करुणा से पाया है क्रंदन
वंदन चन्दन नंदन है वन 
सुरभित होता जाता जीवन
हाथो मेहंदी आँगन रोली 
सखिया करती हास ठिठौली 

काव्य सुधा अब क्यों न बरसे 
भाव धरातल नेह को तरसे 
 प्रीत गीत का पीकर प्याला
झुम झुम कर ये मन हरषे
 प्रिय तम मेरी कितनी भोली

 आँख मिचौली करे बड़ बोली

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

मन अमृत है विष मत घोलो

खुद को तोलो फिर कुछ बोलो 
मन अमृत है विष मत घोलो
जीवन तो वरदान है 

चन्दा तारा यह जग प्यारा 
जीवन सारा तू खुद हारा 
क्यों करता विषपान है?

भाव रंगीले नीले पीले
 चिंतन का वट  तट रेतीले 
करता क्यों अभिमान है ?

पल पल हर पल 
 कल  छल कल छल 
चंचल मन अविराम है 

टिम टिम टिम टिम 

 तारे टिम टिम
 रिम -झिम रिम झिम 
बारिश रिम झिम  कर लेना रस पान है 

राते  गहरी शाम सुनहरी 
दिन गुजरे और उषा ठहरी 
सुबह की  मुस्कान है  

शुक्रवार, 14 जून 2013

सुबह जग -मगाई है

नीले नीले आसमा पर, लालिमा छाई है 
सूरज की मेहनत ने, अरुणिमा पाई है 
पौरुष से किस्मत है, बजती शहनाई है
 संध्या ने सूरज की, तृष्णा  बुझाई  है 

अस्त हुये दिनकर ने ,शीतलता पाई है 
निशा के आँचल में ,निंदिया गहराई है 
खग -दल भी गुम सुम है, पवन सुखदायी है 
उग आई उषा  है ,सुबह जग -मगाई है 

प्रियतम की आँखों में, दिखती सच्चाई है 
प्यारा सा जीवन जल, मृदुलता पाई है 
भावनाये बहकी है ,मेहंदी रंग लाई  है 
प्रीती से जीवन है ,हुई ईर्ष्या पराई है 

भर आई आँखे है, गम की गहराई है 
गागर में सागर है ,सरिता तट आई है 
भावो के आँगन में ,पाया है अपनापन 
सपनो में अपनों की ,झलकिया पाई है 


हँसते हँसते मिट जाते हैं

अब भाव नही होते दर्पण  जो आँखो से दिख जाते है  न रही  चेतना चिन्गारी  अब कलमकार बिक जाते है  कोई स्वार्थ साथ आबाद रहा  तलवे सत्ता के चाट रहा...