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विश्वास की पदचाप है

फूल है गुलकन्द है  गुलकन्द जैसे आप है ह्रदय मे आनंद है  आनंद ही तो आप है स्नेह मे निश्छल है  निर्मल है निष्पाप है प्रतिमूर्ति है सौन्दर्य की  विश्वास की पदचाप है रिश्ते रुहानी हो गये है आजकल सपने सुहाने हो गये है आजकल दिल मे बसी है आपकी सुन्दर छवि पल पल रूलाती याद भी है आजकल

चिंगारिया थी पल रही

जिन्दगी बिन उमंगो के बीती चली जाती है मौत तो दबे पाँव चुप - चाप चली आती  है हम तो हालात की मुंडेर पर रखे हुये दिये है   हवाये सच्चाई की लौ को ही क्यो बुझाती है ? ढेरो थी मुश्किले , मुश्किलो से घिरा इन्सान था सीधा सच्चा था आदमी नही कोई शैतान था दिल मे थी चिंगारीया , चिंगारिया थी पल रही सपनो मे लगी आग थी , घर भी उसका वीरान था पसरा हुआ पाखंड है खोंखले ढकोसले है लोग बाहर से कुछ ओर भीतर से दोगले है आदर्शो की बाते करना अब हो गई फैशन बड़ी - बड़ी बाते बड़े - बड़े लोगो के चोंचले है

विश्वास होते रहे क्यो सशंकित है ?

याद तुम्हारी अाई हम क्या करे ? या तो मर मिटे या जमाने से डरे जबान कुछ बोलने से है डर रही चाहत सागर सी है इस दिल मे भरे सीने मे है अाग अौर उफनता लहू कठिनाईया अनगिनत है किससे कहू या तो चुप रहू अौर चुप - चाप सब सहू धोखे अौर विश्वासघात से बहता है लहू अास्थाये होती रही क्यो कलंकित है ? विश्वास होते रहे क्यो सशंकित है ? चाह कर भी हम अापको भूल नही पाते मेरे दिल रही छवि अापकी अंकित है अाज प्यारा सा गीत गाया है प्यार पुराना समीप अाया है बन गई जिन्दगी पहेलीनुमा प्यार पाकर इसे सुलझाया है

क्या भरोसे के लायक कोई अादमी है ?

जिन्दगी के हालात बहुत हुये विचित्र है दुश्मनो के रूप मे लगते यहा पर मित्र है हम जो समझे है जहाॅ तक अापको रेशमी रूमाल मे लिपटा हुअा एक इत्र है अाॅखो से अाॅसुअो की झडी अाज भी कायम है स्म्रतिया अापकी कितनी कोमल है मुलायम है जीवन मे हालात चाहे कितने भी बदल जाये अाप से होगी सुबह अाप ही पर होगी सायं है ठिठुरता अासमान अौर ठिठुरती जमीं है अाज मौसम मे छाई हुई कुछ नमी है बैचेन हुई भावनाये , अौर निकल गये अाॅसू क्या भरोसे के लायक कोई अादमी है ?

दर्द मे भींगा

दर्द मे भींगा हुआ है सर्दिला मौसम सर्द का मौसम हुआ है सर्द का मौसम झील के झिल - मिल किनारे लहरो की हल चल लहरो की हल - चल हिलाती ठंडी हवा पल पल प्यारा सा जीवन सजा ले ऐ मेरे हम - दम दर्द से घायल हुई है प्यार की पायल प्यार मे पागल समन्दर पागल हुई कोयल साज और  आवाज से ही सज गई सरगम

बहुत कुछ पाया है

आंसुओ की झील मे दिखा दर्द का साया है रोशनिया झिल - मिलाई - चाँद उग आया है जीवन मे कुछ खोया बहुत कुछ पाया है आसमान आस्था का सजाया है पाया है झील सी झील - मिलाई आँखों मे आशाये खिल - खिलाई होठो पर प्यार की भाषाये मंजिले मिल गई जब ख्यालो मे तुम आये मिली खुशियो खुश्बू , खुश्बू पल महकाये निराशा के भीतर भी आशायेहोती है जीवन की मस्ती को आशा संजोती है आशाये सावन है आशाये मधुबन है आशादम पर ही ज्योति है मोती है  

सस्ते थे दिन

--> --> सस्ते जमााने मे सस्ते थे दिन गाॅवो की पगडंडी पगडंडी रंगीन सावन न तरसा था अासमान बरसा था हल थे अौर बक्खर थे हाथो मे फरसा था भक्तो के कीर्तन थे , सब कीर्तन तल्लीन घने घने थे साये  स्नेहिल पल थे पाये लौरी अौर किस्से थे , किस्से थे अपनाये दादी की अाॅखो मे अाॅसू थे गमगीन

वेद की भुले ॠचाये

रिश्ते भी तो रिस रहे है , रिक्त होते जा रहे है गिद्ध नोंचे है घ्रणा के , घाव भी गहरा रहे है बढ रही है खाईया है सम्वाद सेतु ढा रहे है स्वर ठहरे द्वेष के ही सदभाव घटते जा रहे है वे अा रहे कही जा रहे उर स्पर्श न कर पा रहे है निष्ठुरता रहती ह्रदय मे ह्रदय को तरसा रहे है दूरिया बढती परस्पर परछाई बन पछता रहे है हर तरफ रूसवाईया है रूबाईयो को गा रहे है वेद की भुले ॠ चाये अब वे नचाये जा रहे है इतरा रहे गीत गा रहे घट छलछलाते जा रहे है ज्ञेय अौर अज्ञेय हेतु से सताये जा रहे है मूल्य बढते है अकारण कारण गिनाये जा रहे है तंत्र मारण अौर जारण से निवारण पा रहे है धर्म धारण कर रहे है कर्म से घबरा रहे है

भावो का दीप

रूप तेरा अाज है, कल ढल जायेगा तेरी मुठ्ठि से पल पल ,फिसल जायेगा तू कंचन काया को ,सम्हाल कर रखना अाईना तेरे रूप को ,निगल जायेगा दुर्भाग्य की लकीरे , बहुतेरो को रुलाती है कर्म की दीपिका , सौभाग्य को बुलाती है हे!मनुज परमार्थ कर , निस्वार्थ से पुरुषार्थ कर पुरुषार्थ से तकदीरे है , प्रारब्ध को हिलाती है रूप दीप शिखा मे ,जल जाता परवाना है प्रीत की दीप्ति मे ,मिट जाता दिवाना है भावो का दीप ,सबसे समीप होता है भावनाअो से जुडा, परवाना है दिवाना है

स्नेह

स्नेह जब ममत्व का रूप धारण करता है तो ममता कहलाता है स्नेह जब दया अौर अार्द्रता सौहार्द्रता का रूप धारण करता है तो करूणा कहलाता है स्नेह को जब पित्रत्व का अाकाश मिलता है तो अाश्रयदाता बन जाता है स्नेह को जब सम्वेदना का अाभास मिलता है तो गीत गजल साहित्यिक अाचार कालजयी विचार बन जाता है स्नेह किसी अजनबी से हो जाता है तो प्रीत प्यार बन जाता है ऐेसे प्रेम से व्यक्तित्व का निखार पा जाता है राधा से श्रीक्रष्ण से स्नेह अध्यात्मिक ऊॅचाईया पा जाता है माता के स्नेहिल स्पर्श पाकर शिशु अाहार दुलार पा जाता है पिता का स्नेहाशीष पाकर पुत्र सारा संसार पा जाता है बुजुर्गो की स्नेहिल स्पर्श की हौसलो को उडान प्रदान करता है इसलिये स्नेह के अलग - अलग भाव है स्नेह सिर्फ स्नेह नही अात्मा का अात्मा से लगाव है स्नेह शून्य जीवन मे अभाव ही अभाव है जहाॅ स्नेह है वहा समभाव है स्नेह विहीन समबन्धो रहता नही सदभाव है स्नेह के कई रूप है स्नेह की कही छाॅव है तो कही धूप है स्नेह कही बोलता है तो कानो मे मिश्री घोलता है स्नेह कही चुप - चुप रहता है संकेतो अौर अनुभूतियो अाॅखो से साॅसो से बोलता है मौन स्नेह

खिले रूप बन चाँद

रोशन मत कर रोशनी ,रोशन कर दे तम दीप पर्व दीपावली ,मन का  हर ले गम हाथ पैर है फ़ूल रहे ,फ़ूल रहे है गाल काया भी निर्लज्ज हुई ,नग्न देह विकराल भावो की भावांजलि ,मन मोहता तव रूप खिली -खिली हो चांदनी ,खिली -खिली हो धूप रूप चौदस में रूप भरा ,खिले रूप बन चाँद यम -नियम से रूप सजा ,संयम के बन्ध बाँध   दीप पर्व है देत रहा , तन - मन मे उल्लास चिंतन पावन बना रहे , जीवन हो मधुमास नारायण की क्रपा रहे , लक्ष्मी का वरदान सदा करु माॅ शारदे , तेरा ही गुणगान ​​​​​​​​​​​

दीवाली पर दीप कहे

दीपो में है दीप रहे ,मोती रहते सीप दीवाली पर दीप कहे ,मन का आँगन लीप रंगों की रंगावली , रंग बिरंगे दिन दीपो की दीपावली ,नभ तारे अनगिन तारे प्यारे चमक रहे ,चमकी हर दीवार दीपो से हुई दीप्त धरा ,तिमिर हटा हर बार नेह तरल में दीप जले ,बिखरी स्नेहिल गंध सत्य सनातन बने रहे ,रचे गद्य और छंद रिश्तो का इतिहास रहा ,रिश्तो का भूगोल रिश्तो में मधुमास रहा ,रिश्ते है अनमोल

प्रवाह

प्रवाह गति का द्योतक है प्रवाह का उज्जवल भावी है  वर्तमान रोचक है प्रवाह जल जीवन और पवन ने पाया है प्रवाहित होकर जल नदिया और निर्झर बन पाया है प्रवाहित जल में विद्युत ऊर्जा समाई है वैचारिक प्रवाह ने ही अलख चिंतन की जगाई है प्रवाह ही तो जीवन को नवीन दिशा दे पाता है गहन निशा की उदासी में उल्लास का शशि जग -मगाता है तरुणाई की ताकत और अनुभव ज्ञान भी प्रवाहित होते है प्रवाहित जीवन को दिशा देकर बीज रचना के बोते है दिशाए हमारे जीवन की दशा बदलती है सही दिशा पाकर ही तो जिंदगी सम्हलती है प्रवाह में जिंदगी पलती है ज्योत आशा की जलती है अभिलाषा की कलि विचारों के उपवन में खिलती है इसलिए प्रवाह को प्रवाहित होने दो अपनी गति से प्रवाह की सार्थकता है उत्त्थान और उन्नति से प्रवाह से से मिलेगे सभी को हल प्रवाह से प्रसारित होंगे पखेरू  फैलायेगे पंख सजायेगे कल प्रवाहित जल से है सिंचित भूमि  लहलहाया मरुथल प्रवाह चेतना का भाव है जड़ता के घने वन  में सक्रियता का गाँव है

रावण के है पीठ

--> राम शब्द मे ब्रह्म रमे , रामायण हरि धाम हनुमद अमृत दीजिये , जपे राम का नाम ।।१।। रावण बावन फीट हुआ , हुई व्यवस्था ढीठ राम राज तो नही मिला , रावण के है पीठ ।।२। मेघनाद सा पुत्र कहाँ , कहाँ  सिय सा प्रण रावण को भी मिले यहाँ  , राम क्रपा के क्षण ।।३।। अनुचर तो सब विचर रहे , लुप्त समर्पण भाव कलपुर्जो का युग रहा , कलयुग के है गाँव ।।४।। धरती भी बेहाल हुई , यह दंगो का खैल संग रावण के जले यहाँ , जल जंगल और रेल ।।५।। सीता सी मन आस रही , साँस  बसे रघुवीर रहे लक्ष्य भी लक्ष्मण सा , तो जगती तकदीर ।।६।।

कृष्ण कृपा मन राखिये

वचन व्यक्त विश्वास है , वचन रहा है न्यास         दुष्ट वचन दुख देत रहा , सत्य वचन मे व्यास      ||1|| वचन वाक्य विन्यास नही , वचन कर्म है धर्म           तृप्त  हुआ वचनाम्रत से , साधक कर सत्कर्म      ||2|| वचन पुरुष श्रीराम रहे , वचन वीर घनश्याम          बच नही पाया दुर्वचनो से , प्यारा सा इन्सान       ||3|| सद वचनों में गुण भरा , प्रवचन सुख नवनीत         सन्त ह्रदय सा राखिये , रख मन घट मे प्रीत   ||4|| कृष्णा  की जो लाज रखे ,कृष्ण वचन सा होय          कृष्ण कृपा मन राखिये , कृष्ण वचन को ढोय    ||5|| वचन विराजे ब्रह्म देव , वचन विराजे राम       वचनो पर जो प्राण तजे , राम पिता गये धाम      ||6||

आत्मीयता

आत्मीयता की उड़ान ऊँची उड़ान है आत्मीयता में आत्मा का रसास्वादन है कान्हा की प्रीत, राधा का स्नेह नील कंठ का विषपान है आत्मीयता में आत्मा का वंदन है मोह के माथे पर नेह का चन्दन है आत्मा का परमात्मा से स्नेहिल बंधन है आत्मीयता जहां होती है वहा स्वादिष्ट लगती सूखी रोटी है आत्मीयता के बिना भावो  की तृप्ति कहा होती है आत्मीयता शबरी के झूठे बैर है कान्हा के सम्मुख कैलो के छिलको में विदुर सवा सेर है आत्मीयता निराशा में जीवन की आशा है आत्मज्ञान है सच्चे ज्ञान की पिपासा है प्रियतम से मिलने से मिलने की उत्कट अभिलाषा है इसलिए जिसे भी चाहो उसे आत्मा में बसाओ आत्मा को आत्मा के करीब ले आओ असंख्य आत्माओं का समूह ही तो होता परमात्मा है कोटि कर्मो के बंधन से ही निकलती जीवात्मा है आत्मीयता की स्थापना से  ही तो सिध्दी होती है आत्मीय संबंधो की कीर्ति और प्रसिध्दी होती है जीवन में सिध्दी और प्रसिध्दी का होना अनिवार्य है आत्मीयता बनाए रखे आत्मीय सम्बन्ध स्वीकार्य है 

मरी हुई चेतना हवा हुई खिलाफ है

उमंग मे जीवन है , तरंग मे जीवन है रसो मे जीवन है , नसो मे जीवन है काया मे छाया है , छाया मे माया है माया से पाया है , प्यारा गीत गाया है तपन है थकन है गीतों की छूअन है  कही कही सुख है यथार्थ कुरूप है नया नया रूप है हुई छाँव धूप है अगन है दहन है थमी हुई पवन है विरह है मिलाप है रुदन है विलाप है मरी हुई चेतना हवा हुई खिलाफ है दमन है नमन है लुटा हुआ चमन है

भाव करे मन से सत्कार

शर्म भरी गालो की लाली मीठी गाली मीठा प्यार सज नही पाया बिन सजना के सजनी का कोमल श्रंगार होठो पर मुस्कान रहे तो पलको पर ठहरा हो प्यार गहरे बालो मे बिखरा है मादक , मस्ती का विस्तार सोच रही तन - मन यह धडकन मिलने के कब हो आसार धवल चाँदनी  चन्दा देखे नवल तृषा देखे उस पार निशा तो नित ही है होना कमल चन्द्रमा ले आकार पायलिया की रून - झुन सुन कर   गूंज उठी मन मे झंकार बादल से बरसे है नयना तरस रहे मन के सुख चैना सरिता तट केवट आ पहुचा , जल बिन नैया कैसे बहना उतर रही है भावो की टोली , भाव करे मन से सत्कार

क्रांती जन सम्वाद है

क्रांति मे रहते भगत सिंग , क्रांति होती आग है क्रांति मे होते उधम सिंग , जलियावाला बाग है क्रांति मे होती अमरता , क्रांति मे होता समर था क्रांतिकारी की हो पूजा , क्रांति बदले भाग है क्रांति से भ्रांति मिटे है निकले घर से नाग है माटी पर जो मर मिटा है , मिट्टी से अनुराग है क्रांति से मिटती है खाई , क्रांति ने गरिमा लौटाई क्रांति के आव्हान से ही , होते हम आजाद  है क्रांति से कल तू जिया था , मुक्ति का यह नाद है क्रांती की होती चिंगारी , क्रांती का चिराग है क्रान्ति ने बाँधी शिखा है क्रान्ति से जीना सीखा है क्रान्तिया होती रहेगी , क्रांती जन सम्वाद है

क्रांति

क्रांति में रहते भगत सिंग ,क्रांति होती आग है क्रांति होते उधम सिंग ,क्रांति से आजाद है क्रांति में तो अमरता है ,क्रांति से सब संवरता है क्रांति में है रागिनिया ,क्रान्ति ही युग राग है क्रांति में दीवानगी है ,क्रान्ति में है जिंदगी क्रांतिया भ्रान्ति को तोड़े ,भ्रान्ति में शर्मिंदगी क्रांति होती चेतना है स्वदेश की संवेदना है क्रांतिया जब हुई है ,मद मस्त होती बंदगी क्रांति का ही राग छेड़ो,क्रांति का फूंको बिगुल भ्रान्ति में मतिभ्रम रहता ,नीति होती ढुलमुल क्रान्ति से मुक्ति मिली है मुक्ति से शक्ति खिली है क्रांतिया चिंतन में रहती ,क्रांति करती अनुकूल 

तन्द्रा को तोड़ो

जटिलता को  तोड़ो कुटिलता को छोड़ो सरलता सहजता से कभी मुख न मोड़ो हरा हो भरा हो नही मन मरा हो करूणा हो मन मे दया से भरा हो तोड़ो  न जोड़ो मूच्र्छा को तोड़ो चवन्नी अठन्नी से पा लो करोड़ो दुखी हो सुखी हो नही बेरूखी हो नही मन मे तृष्णा  नही अधोमुखी हो तन्द्रा को तोड़ो उठो जागो दौ ड़ो हालात हाथ  नहीं खुद को  छोड़ो

बिंदी कुंकुम से गौरी

भारतीय भाषाओं में ,सब कुछ है संभव हिंदी मन का भाव है ,हिंदी है अनुभव  हिंदी में आश्रय मिले ,कविता अश्रुमय हिंदी में सब छंद मिले ,छंदों में चिन्मय  हिंदी में ही देश रहा ,हिंदी में परिवेश बिंदी कुंकुम से गौरी ,बदला चाहे वेश ह्रदय में जय हिंद रहा ,रहा हिंद अरविन्द हिंदी तुलसी जायसी ,हिंदी में गोविन्द 

वे अकड़े है तने है

--> मधुर मनोहर अनुभुतियो का पडा अकाल है कटु और कठोर अनुभुतिया बेमिशाल है अहंकार के विकार से वे अकड़े है तने है ओढ़ कर छद्म आवरण कुछ और  ही बने है काले कारनामो की खुली पोल उन्हे मलाल है हुई दुर्व्यवस्थाये , सुव्यवस्था हुई अब बौनी है बन्द और  हडताल से महंगाई हुई चौगुनी है फुल गये हाथ पैर जब हालात हुये विकराल है पक्ष विपक्ष खैलते रहे यहाँ आँख  मिचौनी है स्थगित रही बैठके अब चर्चाये कहा होनी है हुडदंग हंगामो के बीच होता रहा धमाल है बडबोले  अनियंत्रित बोल आजकल  वे बोले है कूपमन्डूक मानसिकता के भेद जिव्हा ने खोले है वाकपटुता पर केन्द्रित राजनैतिक इन्द्रजाल है

महंगी पड़ी मूकता है

--> स्नेह कहा रुकता है भेद कहा छुपता है महंगी पडी होशियारी , महंगी पडी मूकता है कोलाहल गति  को प्रगति को रोक ता है   अकैला एकांत में मन ही मन सोचता है छुपाये नही छुपी मानसिकता कुरुपता है मन ही मन कुढ़ते है , भाव कहा जुडते है सॅकरी हुई है गलिया , फुटपाथ सिकुडते है कायराना आचरण है पलायन  विमुखता है

मुक्ति के ही फूल झरे है

दे रहे शुभकामनाये शुभकामनाओं  से डरे है षडयंत्र है दुर्भावनाये जख्म होते अब हरे है झुठी है सम्वेदनाये वेदना लगती सही है वर्जनाओं की दिवारे वंचना ओं की बही है प्रीती को लुटते लुटेरे झुठ से किस्से भरे है मैला मन है मैला आँचल मैले मे मन तू चला चल भोले मन अब तक छला है छोड जग तू चल हिमाचल मंजिले पुकारती है मुक्ति के ही फूल झरे है

आकलन भी गलत ठहरे

आँखों में भरे आंसू ,बिखरे हुए सपने है परायापन छाया है ,कौन यहाँ अपने है आशाओं का आँचल ,बिछड़ गई छाया है फिर हमें चलना है ,स्वाद कई चखने है समय की कसौटी पर खरा कौन उतरा है स्वार्थ से भरे रिश्तो ,रिश्तो पे खतरा है इतना सब सहना है फिर भी यहाँ रहना है पैतरे पर पैतरा है जीवन हुआ कतरा है शब्द तो वही रहे, उनके कई आशय  है भावो के कई रूप ,दुराशय सदाशय है बिगडी हुई दशाये है,बहकी हुई दिशाये है आकलन भी गलत ठहरे उखड़े महाशय है बदरिया बारिश की कैसी यहाँ बहकी है मनोरम हुआ  मौसम ,बगिया भी महकी है झरते हुये झरने है,सरोवर जो भरने है शीतलता छाई है,निर्मलता चहकी है

सुगन्ध मे विस्तार है

रूप मे सौन्दर्य है रंग रूप मे संसार है स्पर्श मे आनंद  है ,आनंद  अपरम्पार है गन्ध मे अनुभूतिया है,सुगन्ध मे विस्तार है है रस भी रहस्यपूर्ण ,रस रंग की बौछार है सादगी मे ताजगी है ताजगी मे जिन्दगी दोस्ती की राह देती,दोस्ती और  बन्दगी दोस्ती विश्वास है,विश्वास ही संसार है जख्म दे न दोस्तो को दोस्ती दे जिन्दगी व्यक्ति मे है मान रहता,अभिव्यक्त स्वाभिमान है व्यक्तित्व मे निहीत रहे गुण,गुणवान ही इन्सान है चरित्र की परिपूर्णता ही ,ज्ञान की सम्पूर्णता है   चरित्र से परिपूर्ण ज्ञानी, गणमान्य है विद्वान है