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तेरी परछाई है

भींगे हुए सपनो ने  ओढ़ी रजाई है बीती हुई यादों की  तस्वीर सजाई है सोई हुई रातो ने  निदिया लगाई है गीतों की ये धुन है  जुगनू की रुन झुन है सीने में धड़कन है  तेरी परछाई है उगता हुआ सूरज है  डूबता हुआ तारा है  सींचा गया उपवन  अब कांटो से हारा है खुशियों की लालिमा  किसने चुराई है  लूटी हुई बस्ती है  बिखरा अंधियारा है

शीश पर नील गगन

शिव से रति है काँप रही ,काँपे देव अनंग जप तप और पुरुषार्थ कर, शिव का कर ले संग शिव के चरणों भू मण्डल शीश पर नील गगन बादल से है गरज रही शिव जी की गर्जन शिव के शिखर गंग बही ,धरते हर दम ध्यान शुध्द बने प्रबुध्द बने , योगी और हनुमान शिव शम्भु को जपा करो बोलो हरदम ओम पुलकित होती देह रही झंकृत है हर रोम मन शिव का अनुरक्त हुआ शिव व्यापे इस देह  शिव जी हर दम बांट रहे निर्मल निश्छल स्नेह शिव सेवक भी पूज्य रहे , पूजित है परिवार पल प्रतिपल है पूज्य रहा श्रध्दा का सोमवार

काँपे दुष्ट अधम

शिव के हाथों नाद रहा डमरू की डम डम भूत भावी कल नाच रहे काँपे दुष्ट अधम शिव ओघड़ के रूप रहे ,लम्बोदर के अज रूप तो क्षण भंगुर रहा रूप के मद को तज उनके हाथों काल रहा होता तीक्ष्ण त्रिशूल सब ग्रंथो का सार यही शिव ही सबके मूल कालो में महाकाल रहे भोलो के है नाथ दुष्टों को न क्षम्य करे कमजोरों के साथ शिव जी पर है बिल्व चढ़े पाये धतुरा भांग पा लेते  जल दूध दही सादा अनुष्ठान शिव शम्भू की थाह नही ,वे मानस के हंस उनसे ही तू प्रीत लगा कट जायेगे दंश शिव अनुभव के नेत्र रहे अनहद के वे ज्ञान सच्चाई की ताकत से होगी कब पहचान जिनका होता कोई नही उनके तो भगवान शिव निर्धन के मित्र रहे सज्जन के सम्मान हृदय में न बैर रहे रख कर्मो में आग शिव के मस्तक नीर बहा गर्दन में है नाग

कौड़ी की भी देह नही

ज्यो ज्यो जलती ज्योत रही महका है परिवेश पावन सुरभित पवन बही अनुभूति होती विशेष अनुभव से तू जान रहा कर अनुभव का मान  अनुभवी से सूत्र मिले , बन जाते हर काम हर दर्पण में झांक रहा ताक रहा है रूप मद यौवन का गया नही पद कुर्सी की भूख खुद ही पर है जोर रहा खुद को कर बलवान खुद में ही जो दोष दिखे उनकी कर पहचान तुझमे तेरे देव रहे खुद पर कर विश्वास कौड़ी की भी देह नही बन जाती जब लाश

लिपटे देह भभूत

जैसा जिसका भाव रहा वैसे है भगवान शिव ज्योतिर्मय रूप रहे ज्योति का आव्हान  सोमवार हर वार रहे मन से हटे विकार  शिव जी के इस मास में सत्य वचन स्वीकार शिव जी तो अवधूत रहे उनके भैरव भूत नागों के वे नाथ रहे लिपटे देह भभूत जीने का आधार रहा शिव जी का परिवार वे बंधु है मात पिता सबके तारण हार शिव जी सबके पूज्य रहे क्या दानव क्या देव भस्मासुर वर मांग गया रावण के महादेव शिव जी से संतोष मिला पाया है प्रसाद संकेतो से बात करे शब्द परे सम्वाद शिव संजीवन बाँट रहे ,करते रोग निदान मृत्युंजय महामंत्र रहा,जीवन का वरदान शिव का सत्संकल्प रहा हो सबका कल्याण सज्जनता के साथ रहे,बीज ,नींव से निर्माण

जीवन का संजय

पूजा व्रत से नही मिला कोई भी वरदान जिसके सच्चे भाव रहे उसका है भगवान पल पल ढलती रात गई दिन ढलती धूप प्रतिपल जीवन बीत रहा,धुंधला होता रूप जीवन से क्यो हार गया विष का करके पान कितने थे अरमान भरे कैसा था इंसान जीवन है चल चित्र नही क्यो करता अभिनय तुझको हर पल देख रहा  जीवन का संजय तन मन को है बांच रहा जांच रहा कण कण जैसा दिखता रूप यहां दिखलाता दर्पण

कितने सारे ठूठ

जिसके जितने रंग रहे वह उतना बदरंग वह वैसा ही बना यहाँ जिसका जैसा संग कितने थे अंदाज नये कितना फैला झूठ मैला कुचला एक कमल कितने सारे ठूठ धन पाकर न तृप्त हुआ ये कैसा अभिशाप  जीवन का रस चला गया ढोता हर दम पाप गुणहीन अब गुणवंत बने थे कोरे व्याख्यान अब कौड़ी के भाव बिकी हीरे की एक खान उनको तो वरदान मिला ,मिला हमे है शाप तू अपनी परछाई को नाप सके तो नाप

माना तुझको न मिला आसमान है

निरंतर परिश्रम कर देह को तपाया है  गर्म लू में झुलस कर पसीना बहाया है  माना तुझको न मिला आसमान है  पर चिरागों ने हौसला तुझसे पाया है सिर्फ जीना ही नही पाने कई मुकाम है  जिंदगी उगती सुबह ढलती हुई शाम है हर किनारे ने कभी मझदार को पाया है पला मझदार के बीच  बड़ा  इंसान है तिमिर को चीर कर है रोशनी जहा आती प्रतिभाए परिष्कृत हो वहा है चमचमाती अंधेरे हौसलो को कभी हरा नही सकते तमस में दीप टोली ही सदा है जगमगाती

तिमिर पीकर जो आया सफलता पाता

निरंतर चलने का नाम जीवन है  ध्येय से मिलने का नाम जीवन है  क्यो ? उदास बैठे हो मेरे भाई परस्पर मिलने का नाम जीवन है निरन्तर कर्मरत रह जो जी पाया है  मीठी मुस्कान का पल उसने पाया है थका है क्यो ? राही इस मुकाम पर  पूरा आसमान पैरो तले आया है  कठिन है राह पर चुप रहा नही जाता  रहा भीतर है जो दर्द सहा नही जाता झूठे सपनो को हम नही जिया करते है तिमिर पीकर जो आया सफलता पाता निरन्तर चीर जिसने बढ़ाया है  कान्हा चित्त में मेरे आया है  रही जहां भी कही करुणा है  मैंने घनश्याम को वही पाया है

स्वदेशी से जीत गया मेरा वीर जवान

धोखे से हर युध्द लड़ा ,अब आये दुर्दिन स्वदेशी से हार गया, चीनी ड्रैगन जिन्न सीमाए अब रिक्त हुई लौट गया शैतान स्वदेशी से जीत गया मेरा वीर जवान स्वदेशी का मंत्र चला,दुश्मन की न खैर सीमाए सुनसान हुई गरज रहा है शेर सीमा से है भाग खड़ा उखड़ गये है टेंट स्वदेशी से हांफ रही ,चीनी तोपे टैंक स्वदेशी से शुध्द हुए ,पाये हमने बुध्द हिंसक तेवर चला गया टला अभी है युध्द एक देश परतंत्र  रहा एक देश गणतंत्र एकमेव जब राष्ट्र रहा स्वदेशी का मन्त्र